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अभी भी बहुत कुछ हैं

अभी भी बहुत कुछ हैं।जो मला गया,वह घागा।जो घिसा गया,वह हीरा। जो गूथा गया,वह माला।जो काटा गया,वह मूर्त।जो तपाया गया, वह सोना।जो जलायी गई,वह बाती।जो नकारा गया,वह राम।जो लूटी गई,वह सीता।जो पीटी गई,वह तलवार।जो चुनी गई,वह ईमारत।जो भगाई गई,वह गंगा। जो बिन पाव चले,वह लक्ष्मी।जिसकी कोई थाह नहीं,वह सागर।



मधुमाला चट्टोपाध्याय : सेंटिनल जनजाति ने जब पहली बार तीर- धनुष छोड़ ख़ुशी से किया एक बाहरी का स्वागत - Madhumala Chattopadhyay

मधुमाला चट्टोपाध्याय (Madhumala Chattopadhyay), सेंटिनल जनजाति की ज़मीन पर कदम रखना मतलब मौत को सीधा न्यौता , ऐसी जनजाति से दोस्ती का रिश्ता कायम करने वाली पहली महिला Madhum



महिलाओं के लिए ये कैसी लड़ाई जिसे महिलाओं का ही समर्थन नहीं

महिलाओं के लिए ये कैसी लड़ाई जिसे महिलाओं का हीसमर्थन नहीं मनुष्य की आस्था ही वो शक्ति होती है जो उसे विषम से विषम परिस्थितियों से लड़कर विजयश्री हासिल करने की शक्ति देती है। जब उस आस्था पर ही प्रहार करने के प्रयास किए जाते हैं, तो प्रयास्कर्ता स्वयं आग से खेल रहा होता है।क्योंकि वह यह भूल जाता है कि



शाह, श्रीमती माला राज्‍यलक्ष्‍मी - लोकसभा सदस्य

निर्वाचन क्षेत्र -टिहरी गढ़वाल (उत्तराखंड)दल का नाम -भारतीय जनता पार्टी ( भा.ज.पा.)ईमेल -malarajyalaxmi[DOT]shah[AT]sansad[DOT]nic[DOT]in malarajyalaxmishah[AT]gmail[DOT]comजन्म की तारीख -23/08/1950उच्चतम योग्यता -वरिष्‍ठ माध्‍यमिकशैक्षिक और व्यावसायिक योग्यता -इंटरमीडिएट कॉन्वेंट ऑफ जीसस



"रूपमाला/मदन छंद"

"रूपमाला/मदन छंद"आप बचपन में कहाँ थे आज है क्या हालदेख जाओ गाँव आकर खो गए हैं ताल।हर नहर सूखी मिलेगी बाग वन आधारपेड़ जामुन का खड़ा है बैठ कौआ हार।।-१हो सके तो देख लेना बंद सारे द्वारझाँकती मानों चुड़ैली डर गई दीवार।खो गई गुच्छे की चाभी झुक गए है लोगनेवला मुड़ मुड़ के देखे कर र



“हाइकु” माला मनका

“हाइकु”आसन माँ काझूमती है काँवरमाला मनका॥-१ सुंदर शोभा भक्त भाव निराली पूजा की थाली॥-२ शक्ति पूजन चैत्र की नवरात्रिवंदन मातृ॥-३ क्षमा याचना हितकर चाहना माँ सुनयना॥-४ सुख सुविधा रूपवती प्रतिभा मातु सुचिता॥-५ महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



"चम्पकमाला छंद"

विधान~ [भगण मगण सगण गुरु] ( २११ २२२ ११२ २) 10 वर्ण , ४ चरण, दो-दो चरण सम तुकांत"चम्पकमाला छंद"घाट बिना नौका कित जाएहाट बिना सौदा कित छाए।बात नही तो राहत कैसी भाव नही तो चाहत कैसी।।लोभ नचाये नावत माथा मोह बुलाये लाभन साथा।भार उठाए मानव धीरा साधु बनाए साधक हीरा.. महातम म





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