मुहब्बत

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"गीतिका" भुला बैठे हमारे प्यार और इजहार के वो दिन नहीं अब याद आते है मुहब्बत प्यार के वो दिन

मापनी- 1222 1222 1222 1222, समांत- आर, पदांत- के वो दिन"गीतिका" भुला बैठे हमारे प्यार और इजहार के वो दिननहीं अब याद आते है मुहब्बत प्यार के वो दिनलिखा था खत तुम्हारे नाम का वो खो गया शायदकहीं पर शब्द बिखरे हैं कहीं मनुहार के वो दिन।।उठाती हूँ उन्हें जब भी फिसल कर दूर हो जातेबहारों को हँसा कर छुप गए



रंग

झूठ पलता हो पालनों में जहाँ, सच की उनसे क्या उम्मीद करे, खेलते होली जो नफ़रत घुले पानी से, रंगो की वहां क्या उम्मीद करे. दिखता है रंग अपना ही खूबसूरत, उनसे दूसरे रंगों की क्या तारीफ़ करे. मज़हब में भी जो ढूंढते नफ़रत, उनसे इश्क ओ म



फ़लसफ़ा ए मुहब्बत

फ़लसफ़ा-ए - मुहब्बत में मज़हब नहीं होता, खुदा तो होता है, पर कारोबार नहीं होता. नाम ले के खुदा का जो फैलाते है नफ़रत,खुद उनका घर कभी आबाद नहीं होता. (आलिम)





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