मुक्त

"मुक्त काव्य" जीवन शरण जीवन मरण है अटल सच दिनकर किरण

शीर्षक- जीवन, मरण ,मोक्ष ,अटल और सत्य"मुक्त काव्य" जीवन शरण जीवन मरणहै अटल सच दिनकर किरणमाया भरम तारक मरणवन घूमता स्वर्णिम हिरणमातु सीता का हरणक्या देख पाया राम नेजिसके लिए जीवन लियादर-बदर नित भ्रमणन कियाचोला बदलता रह गयाक्या रोक पाया चाँद नेउस चाँदनी का पथ छरणऋतु साथ आती पतझड़ीफिर शाख पर किसकी कड़ी



मरा जा रहा हूँ

""""" """""मरा जा रहा हूँ (हास्य)""""" """' ************************* प्रिय मुझसे तेरा यूँ मुंह का फुलाना, नखरे दिखाना यूँ रूठ के सो जाना, गजब ढा रहा है, गजब ढा रहा है। न हँसना तनिक भी न सजना सवरना, न आँखें दिखाना न लड़ना झगड़ना, गजब ढा रहा है, गजब ढा रहा है। ओ तिरछी नजर से न मुझको रिझाना, न कसमों



"मुक्तक,"

"मुक्तक" हार-जीत के द्वंद में, लड़ते मनुज अनेक।किसे मिली जयमाल यह, सबने खोया नेक।बर्छी भाला फेंक दो, विषधर हुई उड़ान-पीड़ा सतत सता रहीं, छोड़ो युद्ध विवेक।।-1हार-जीत किसको फली, ऊसर हुई जमीन।युग बीता विश्वास का, साथी हुआ मशीन।बटन सटन दुख दर्द को, लगा न देना हाथ-यंत्र- यंत्र में तार है, जुड़ते जान नगीन।।-2



"मुक्तक"

"मुक्तक"युग बीता बीता पहर, लेकर अपना मान।हाथी घोड़ा पालकी, थे सुंदर पहचान।अश्व नश्ल विश्वास की, नाल चाक-चौबंद-राणा सा मालिक कहाँ, कहाँ चेतकी शान।।-1घोड़ा सरपट भागता, हाथी झूमे द्वार।राजमहल के शान थे, धनुष बाण तलवार।चाँवर काँवर पागड़ी, राज चाक- चौबंद-स्मृतियों में अब शेष हैं, प्रिय सुंदर उपहार।।-2महातम



"छंद मुक्त गीतात्मक काव्य" जी करता है जाकर जी लू बोल सखी क्या यह विष पी लू

"छंद मुक्त गीतात्मक काव्य"जी करता है जाकर जी लूबोल सखी क्या यह विष पी लूहोठ गुलाबी अपना सी लूताल तलैया झील विहारकिस्मत का है घर परिवारसाजन से रूठा संवादआतंक अत्याचार व्यविचारहंस ढो रहा अपना भारकैसा- कैसा जग व्यवहारजी करता है जाकर जी लूबोल सखी क्या यह विष पी लूहोठ गुलाबी अपना सी लू।।सूखी खेती डूबे बा



"मुक्तक"

बाल-दिवस पर प्रस्तुति"मुक्तक"काश आज मन बच्चा होता खूब मनाता बाल दिवस।पटरी लेकर पढ़ने जाता और नहाता ताल दिवस।राह खेत के फूले सरसों चना मटर विच खो जाता-बूढ़ी दादी के आँचल में सुध-बुध देता डाल दिवस।।-1गैया के पीछे लग जाता बन बछवा की चाल दिवस।तितली के पर को रंग देता हो जाता खुशहाल दिवस।बिना भार के गुरु शर



"मुक्तक"

रूप चौदस/छोटी दीपावली की सभी को हार्दिक बधाई एवं मंगल शुभकामना"मुक्तक"जलाते दीप हैं मिलकर भगाने के लिए तामस।बनाते बातियाँ हम सब जलाने के लिए तामस।सजाते दीप मालिका दिखाने के लिए ताकत-मगर अंधेर छुप जाती जिलाने के लिए तामस।।-1विजय आसान कब होती खुली तलवार चलती है।फिजाओं की तपिश लेकर गली तकरार पलती है।सु



"मुक्तक"

"मुक्तक"दीपक दीपक से कहे, कैसे हो तुम दीप।माटी तो सबकी सगी, तुम क्यों जुदा प्रदीप।रोज रोज मैं भी जलूँ, आज जले तुम साथ-क्या जानू क्या राज है, क्यों तुम हुए समीप।।-1धूमधाम बाजार में, चमक रहे घरबारचाक लिए कुम्हार है, माटी महक अपारतरह-तरह के दीप हैं, भिन्न-भिन्न लौ रंगबिकता कोई बिन कहे, कहाँ चटक त्यौहार



"मुक्तक"

आप का दिन मंगलमय हो,"मुक्तक"चढ़ा लिए तुम बाण धनुर्धर, अभी धरा हरियाली है।इंच इंच पर उगे धुरंधर, किसने की रखवाली है।मुंड लिए माँ काली दौड़ी, शिव की महिमा न्यारी है-नित्य प्रचंड विक्षिप्त समंदर, गुफा गुफा विकराली है।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



"मुक्तक"

"मुक्तक"सत्य समर्पित है सदा, लेकर मानक मान।जगह कहाँ कोई बची, जहाँ नहीं गुणगान।झूठा भी चलता रहा, पाकर अपनी राह-झूठ-मूठ का सत्य कब, पाता है बहुमान।।-1सही अर्थ में देख लें, लाल रंग का खैर।झूठ सगा होता नहीं, और सगा नहीं गैर।सत्य कभी होती नहीं, आपस की तकरार-झूठ कान को भर गया, खूँट बढ़ा गया बैर।।-2महातम मि



https://ptvktiwari.blogspot.com/2018/10/24-2018.htmlसौभाग्य,धन,ऋण मुक्ति, सुयोग्य वर -अश्वनी माह -शरद / रास पूनम 24 अक्टूबर 2018

सौभाग्य,धन,ऋण मुक्ति, सुयोग्य वर -अश्वनी माह -शरद / रास पूनम 24 अक्टूबर 2018 सौभाग्य,धन,ऋण मुक्ति, सुयोग्य वर -अश्वनी माह -शरद / रास पूनम 24 अक्टूबर 2018 पंड



"छंद मुक्तक"

छंद- कीर्ति (वर्णिक) छंद विधान - स स स ग मापनी- 112 112 112 2"आप सभी महानुभावों को पावन विजयादशमी की हार्दिक बधाई""मुक्तक"मुरली बजती मधुमाषा हरि को भजती अभिलाषा रचती कविता अनुराधाछलकें गगरी परिहाषा।।-1घर में छलिया घुस आयायशुदा ममता भरमायागलियाँ खुश हैं गिरधारीबजती मुरली सुख छाया।।-2मथुरा जनमे वनवा



"मुक्तक"

"मुक्तक" कितना मुश्किल कितना निश्छल, होता बचपन गैर बिना।जीवन होता पावन मंदिर, मूरत सगपन बैर बिना।किसकी धरती किसका बादल, बरसाते नभ उत्पात लिए-बच्चों की हर अदा निराली, लड़ते- भिड़ते खैर बिना।।-1प्रत्येक दीवारें परिचित हैं, इनकी पहचान निराली।जग की अंजानी गलियारी, है सूरत भोली-भाली।हँसती रहती महफ़िल इनकी,



"मुक्त काव्य"

"मुक्त काव्य"चाह की राह हैगोकुल निर्वाह हैयमुना कछारीरात अंधियारीजेल पहरेदारीदेवकी विचारीकृष्ण बलिहारीलीला अपार हैचाह की राह है।।गाँव गिरांव हैधन का आभाव हैमाया मोह भारीखेत और क्यारीसाधक नर-नारीरक्षित फुलवारीबाढ़ की बीमारीपानी अथाह हैचाह की राह है।।संतुष्टि बिहान है प्यासा किसान हैबरखा बयारीनैन कजरार



"मुक्त काव्य"

"मुक्त काव्य"सजाती रही सँवारती रहीगुजारती रही जिंदगीबाढ़ के सफ़र मेंबिहान बहे पल-पल।।गाती गुनगुनाती रहीसपने सजाती रहीचलाती नाव जिंदगीठहर छाँव बाढ़ मेंगुजरान हुआ गल-गल।।रोज-रोज भीग रहीजिंदगी को सींच रहीलहरों से खेल-खेलबिखर गया घाट डूब अश्रुधार छल-छल।।तिनका-तिनका फेंक रहीडूबते को देख रहीमसरूफ थी जिंदगीजल



"मुक्तक"

छंद- वाचिक सोमराजी (मापनीयुक्त मात्रिक) मापनी- लगागा लगागा, 122 122 "सोमराजी छंद" मुक्तकसिया राम माया। मृगा हेम भाया। छलावा दिखावा- सदा कष्ट पाया॥-1तजो काम धामा। भजो राम नामा। सदा कृष्ण माधो- पुकारें सुदामा॥-2मिले द्वारिका में। सुखी पादुका में। चुराते चना को-- सुदामा सखा में॥-3लुटाता नहीं मैं। स



"मुक्तक"

“मुक्तक”कतरा-कतरा माँ तेरा है। पुतरा पुतरा माँ तेरा है।शीश निछावर करते वीरा- सुंदर अँचरा माँ तेरा है।।गर्वित होते लाल हजारों। सीमा प्रहरी नायक यारो। दुश्मन के छक्के छुट जाते- नमन शहीद धन्य दिग चारो।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



"मुक्त काव्य" जी करता है जाकर जी लू , बोल सखी क्या यह विष पी लू

"मुक्तकाव्य" जी करता है जाकर जीलूबोल सखी क्या यहविष पी लूहोठ गुलाबी अपना सीलूताल तलैया झीलविहारसुख संसार घरपरिवारसाजन से रूठा संवादआतंक अत्याचारव्यविचारहंस ढो रहा अपनाभारकैसा- कैसा जगव्यवहारहोठ गुलाबी अपना सीलूबोल सखी क्या यहविष पी लू॥ डूबी खेती डूबेबाँधझील बन गई जीवन साधसड़क पकड़ती जबरफ्तारहो जाता जी



“मुक्तक” हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह।

हिन्दी दिवस के सुअवसर पर आप सभी को दिल से बधाई सह शुभकामना, प्रस्तुत है मुक्तक....... ॐ जय माँ शारदा......!“मुक्तक”हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह। अपनी भाषा को मिला, संवैधानिक छाँह।चौदह तारिख खिल गया, दे दर्जा सम्मान- धूम-धाम से मन रहा, प्रिय त्यौहारी चाह॥-1बहुत बधाई आप को, देशज मीठी बोल। सगरी



“छंद मुक्त काव्य“ (मैं इक किसान हूँ)

“छंद मुक्त काव्य“(मैं इक किसान हूँ) किस बिना पै कह दूँकि मैं इक किसान हूँजोतता हूँ खेत, पलीत करता हूँ मिट्टी छिड़कता हूँ जहरीलेरसायन घास पर जीव-जंतुओं का जीनाहराम करता हूँ गाय का दूध पीताहूँ गोबर से परहेज है गैस को जलाता हूँपर ईधन बचाता हूँ अन्न उपजाता हूँगीत नया गाता हूँ आत्महत्या के लिएहैवान बन जा



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