मुक्तक



मुक्तक विधान

'मुक्तक चार पंक्तियाँ भार सम,मुक्तक का सिद्धांत lपंक्ति तृतीयं मुक्तता , तजि सामंत पदांत llव्यंग्य और वक्रोक्ति में , साधें शेर सदृश्य lपंक्ति तृतीयं सार है , निष्कर्षं परिदृश्य llराजकिशोर मिश्र राज प्रतापगढ़ी



दौलत

दौलतजो दिया है गैरों को वोही काम आ साथ जाएगा।राजा का बेटा ताज पहन याद नहीं कर पायेगा।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



दौलत

दौलतजो दिया है गैरों को वोही काम आ साथ जाएगा।राजा का बेटा ताज पहन याद नहीं कर पायेगा।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



चाँद और सूरज

'चाँद' को लख- मन को बहुत हीं सुकून मिलता है।'सूरज' को लख कर पत्थर भी पिधल बह जाता है।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



वक़्त पड़ने पे बिछाने के काम आता हूँ

मैं जमाने को हंसाने के काम आता हूँ .किसी का दर्द मिटाने के काम आता हूँ .मुझको अखबार पुराना समझ के फेंको न यूँ .वक़्त पड़ने पे बिछाने के काम आता हूँ .



मुक्तक

"मुक्तक"बादल कहता सुन सखे, मैं भी हूँ मजबूर।दिया है तुमने जानकर, मुझे रोग नासूर।अपनी सुविधा के लिए, करते क्यों उत्पात-कुछ भी सड़ा गला रहें, करो प्लास्टिक दूर।।मैं अंबुद विख्यात हूँ, बरसाने को नीर।बोया जो वह काट लो, वापस करता पीर।पर्यावरण सुधार अब, हरे पेड़ मत छेद-व्यथित चाँद तारे व्यथित, व्यथितम गगन स



शरद ऋतु

🌹सिंहावलोकनी दोहा मुक्तक🌹"""""""""""""""""""""""शरद ऋतु करे आगमन, मन होए उल्लास ।जूही की खुशबू उड़े, पिया मिलन की आस।।आस किसी की मैं करूँ , जो ना आएं पास ।नित देखू राह उसकी, जाता अब विश्वास ।।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹व्यंजना आनंद ✍



मुक्तक

मात्रिक- - 16 मात्रा भार🌷मुक्तक🌷 """"""""""""हम रुठे है वो भी रुठी। किस्मत देखों कैसे छूटी । जाने कहाँ गये प्यारे दिन, करते थे हम बातें मीठी।।ऐसे नहीं प्रेम होता है। समर्पण से क्रोध खोता है। ऐसे नहीं टीकती दोस्ती, वो दोस्त हमेशा रोता है।।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹व्यंजना आनंद ✍



मुक्तक

"मुक्तक"नौनिहाल का गजब रूप चंहका मन मोरा।बहुत सलोने गात अघात देखि निज छोरा।सुंदर-सुंदर हाथ साथ गूँजें किलकारी-माँ की ममता के आँचल में उछरे पोरा।।पोरी भी है साथ निहारे वीरन अपना।बापू की आँखों ने देखा सच्चा सपना।कुदरत के खलिहान का खुला पिटारा-ठुमुक चाल बलराम कृष्ण है जग से न्यारा।।महातम मिश्र, गौतम गो



मुक्तकाव्य, वो जाग रहा है

"मुक्तकाव्य"वो जाग रहा हैहमारी सुखनिद्रा के लिएअमन चैन के लिएसीमा की चौहद्दी के लिएऔर आप! अपनी ही जुगलबंदी अलाप रहें हैंनिकलिए बाहर और देखिए सूरज अपनी जगह पर हैचाँद! अपनी रोशनी से नहला रहा हैबर्फ की चादरों पर वीर सैनिक गुनगुना रहा हैकश्मीर से कन्याकुमारी तक आवाज जा रही हैजय हिंद की हुंकार से पड़ोसी ब



सोचा न था

सोचा न था !एक रोज़ इस मोड़ से गुजरना पड़ेगा, जिंदगी को मौत से यूँ लड़ना पड़ेगा,चलते चलते लड़खड़ायेंगे पग राहो में गिरते गिरते खुद ही सम्भलना पड़ेगा !!!डी के निवातिया



मुक्तक

"मुक्तक"सूक्ष्म निरीक्षण से हुए, कोटि कोटि सत्काम।जल के भीतर जीव प्रिय, नभचर थलचर आम।मित्र जीव रक्षा करें, बैरी लेते प्राण-रुधिर सभी का एक सा, अलग अलग है नाम।।लघु के लक्ष्य अभेद हैं, लिए साहसी तीर।चावल पय जब भी मिले, पके माधुरी खीर।कटहल पक मीठा हुआ, लिए नुकीले छाल-काले तिल के शक्ति को, कब समझे बेपीर



मुक्तक

"मुक्तक"गैरों ने भी रख लिया, जबसे मुँह में राम।शुद्ध आत्मा हो गई, मिला उचित अभिराम।जिह्वा रसमय हो गई, वाणी हुई सुशील-देह गेह दोनों सुखी, राघव चित आराम।।दर्शन कर अवधेश के, तरे बहुत से लोग।राम जानकी मार्ग पर, काया रहे निरोग।निर्भय होकर चल पड़ो, अंधेरी हो रात-मंजिल मिल जाती सुबह, भागे तम का रोग।।महातम म



मुक्तकाव्य

मुंशी जी को सादर नमन"मुक्त काव्य"ऐसे थे मुंशी प्रेमचंद जीधनपत राय श्रीवास्तव श्रीकलम हथियार बनीशब्द बने तलवारआव भगत से तरवतरभावना के अवतार।।दो बैलों की जोड़ीनमक का दरोगाईदगाह का मेलाचिमटा हुआ हमसफरगबन गोदान और कफनप्रेम पंचमी प्रेम प्रसून प्रेम प्रतिमाकन्यादान प्रेम प्रतिज्ञा बहते अश्रुधार।।सरल शब्दों



मुक्तक

शीर्षक --- बिजली, सौदामनी, शया, घनप्रिया, ऐरावती, बीजुरी, चंचला, क्षणप्रभा, चपला, इन्द्र्वज्र, घनवल्ली, दामिनी, ताडित, विद्युत"मुक्तक"तुझे देख सौदामिनी, डर जाता मन नेक।तू चमके आकाश में, डरती डगर प्रत्येक।यहाँ गिरी कि वहाँ गिरी, सदमे में हैं लोग-सता रही इंसान को, चपला चिंता एक।।लहराती नागिन सरिस, कात



मुक्तकाव्य

"मुक्तकाव्य"कुछ कहना चाहता है गगनबिजली की अदा में है मगनउमड़ता है घुमड़ता भी हैटपकता और तड़फता भी हैलगता है रो रहा है अपनी अस्मिता खो रहा हैसुनते सभी हैं पर कहाँ है मननकुछ कहना चाहता है गगन।।कौन कर रहा है दमनसभी की चाह है अमनकोई छुपकर रोता हैकोई हृदय में बीज बोता हैलगता है जमीन खिसक रहीबिना ईंधन आग धधक



मुक्तक

शीर्षक -दीवार,भीत,दीवाल"मुक्तक"किधर बनी दीवार है खोद रहे क्यूँ भीत।बहुत पुरानी नीव है, मिली जुली है रीत।छत छप्पर चित एक सा, एक सरीखा सोच-कलह सुलह सर्वत्र सम, घर साधक मनमीत।।नई नई दीवार है, दरक न जाए भीत।कौआ अपने ताव में, गाए कोयल गीत।दोनों की अपनी अदा, रूप रंग कुल एक-एक भुवन नभ एक है, इतर राग क्यों



मुक्तक

मुक्तकमेरे ख्याल की मखमली चादर पर आएं तो कभी सुकून प्रेम का गहना है रहबर आजमाएं तो कभी इंतजार पर मौन रहता है दिल आँखें झूठ न बोलेमौसम की हवा में मौसमी लाकर इतराएं तो कभी ।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



मुक्तक

"मुक्तक"बहुत मजे से हो रहे, घृणित कर्म दुष्कर्म।करने वाले पातकी, जान न पाते मर्म।दुनिया कहती है इसे, बहुत बड़ा अपराध-संत पुजारी कह गए, पापी का क्या धर्म।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



मुक्तक

सच अभी भी मरा नहीं है , झूठ भी पर डरा नहीं है | यह भी सच है आदमी अब ,पूर्व जैसा खरा नहीं है |



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