मुक्तक

मुक्तक

सच अभी भी मरा नहीं है , झूठ भी पर डरा नहीं है | यह भी सच है आदमी अब ,पूर्व जैसा खरा नहीं है |



मुक्तक

"मुक्तक" चढ़ा धनुष पर बाण धनुर्धर, धरा धन्य हरियाली है।इंच इंच पर उगे धुरंधर, करती माँ रखवाली है।मुंड लिए माँ काली दौड़ी, शिव की महिमा है न्यारी नित्य प्रचंड विक्षिप्त समंदर, गुफा गुफा विकराली है।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



मुक्तक

आप व आप के पूरे परिवार को मुबारक हो फागुन की होली......."मुक्तकमुरली की बोली और राधा की झोली।गोपी का झुंड और ग्वाला की टोली।कान्हा की अदाएं व नंद जी का द्वार-पनघट का प्यार और लाला की ठिठोली।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



मुक्तक

महिला दिवस पर हार्दिक बधाई"मुक्तक"कण पराग सी कोमली, वनिता मन मुस्कान।खंजन जस आतुर नयन, माता मोह मिलान।सुख-दुख की सहभागिनी, रखती आँचल स्नेह-जगत सृष्टि परिचायिनी, देवी सकल विधान।।-1गौतम जो सम्मान से, करता महिला गान।लक्ष्मी उसके घर बसे, करे विश्व बहुमान।महिला है तो महल है, बिन महिला घर सून-घर-घर की यह



मुक्तक

स्वागतम अभिनंदन"मुक्तक"साहसी अभिनंदन है, अभिनंदन वर्तमान।वापस आया लाल जब, तबसे हुआ गुमान।युद्ध बिना बंदी हुआ, भारत माँ का वीर-स्वागत आगत शेर का, चौतरफा बहुमान।।-1एक बार तो दिल दुखा, सुनकर बात बिछोह।कैसे यह सब हो गया, अभिनंदन से मोह।डिगा नहीं विश्वास था, आशा थी बलवान-आया माँ की गोद में, लालन निर्भय ओ



मुक्तकाव्य

"मुक्त काव्य"हाथी सीधे चल रहाघोड़ा तिरछी चालऊँट अढाई घर बढ़ेगरजा हिन्द महानशह-मात के खेल मेंपाक वजीर बेभान।।लड़े सिपाही जान लगाकरपीछे-पीछे प्यादा चाकरचेस वेष अरु केश कामत कर अब गुणगानगिरते पड़ते जी रहेकर्म करो नादान।।इक दूजे को मात-शहजीत- हार विद्यमानपाक आज चिंतित हुआपुलवामा बलवानकौरव देख गांडीव पार्थ क



मुक्तक

"मुक्तक"गया समय अब युद्ध का, लड़ा रहे सब छद्म।नहीं किसी के पास अब, सत्य बोलती नज्म।सूखे सब कंकाल हैं, दौड़ रहे हैं तेज-दौलत के संसार में, कहाँ पुरानी बज्म।।-1नाम समर का ले रहे, कायर अरु कमजोर।चुपके से चलते डगर, मानो कोई चोर।घात लगा कर वार कर, छुप जाते हैं खोह-पीछे से हमला करें, और मचाएं शोर।।-2महातम म



"चौपाई मुक्तक" वन-वन घूमे थे रघुराई, जब रावण ने सिया चुराई। रावण वधकर कोशल राई, जहँ मंदिर तहँ मस्जिद पाई।

"चौपाई मुक्तक"वन-वन घूमे थे रघुराई, जब रावण ने सिया चुराई।रावण वधकर कोशल राई, जहँ मंदिर तहँ मस्जिद पाई।आज न्याय माँगत रघुवीरा, सुनो लखन वन वृक्ष अधिरा-कैकेई ममता विसराई, अवध नगर हति कागा जाई।।-1अग्नि परीक्षा सिया हजारों, मड़ई वन श्रीराम सहारो।सुनो सपूतों राम सहारो, जस



"मुक्तक"

"मुक्तक"मंदिर रहा सारथी, अर्थ लगाते लोग।क्या लिख्खा है बात में, होगा कोई ढोंग।कौन पढ़े किताब को, सबके अपने रूप-कोई कहता सार है, कोई कहता रोग।।-1मंदिर परम राम का, सब करते सम्मान।पढ़ना लिखना बाँचना, रखना सुंदर ज्ञान।मत पढ़ना मेरे सनम, पहरा स्वारथ गीत-चहरों पर आती नहीं, बे-मौसम मुस्कान।।-2महातम मिश्र, गौत



"मुक्तक"

"मुक्तक" नहीं सहन होता अब दिग को दूषित प्यारे वानी। हनुमान को किस आधार पर बाँट रहा रे प्रानी।जना अंजनी से पूछो ममता कोई जाति नहीं-नहीं किसी के बस होता जन्म मरण तीरे पानी।।-1मानव कहते हो अपने को करते दिग नादानी।भक्त और भगवान विधाता हरि नाता वरदानी।गज ऐरावत कामधेनु जहँ पीपल पूजे जाते-लिए जन्म भारत मे



"मुक्तक" देखिए तो कैसे वो हालात बने हैं। क्या पटरियों पै सिर रख आघात बने हैं।

"मुक्तक" देखिए तो कैसे वो हालात बने हैं।क्या पटरियों पै सिर रख आघात बने हैं।रावण का जलाना भी नासूर बन गया-दृश्य आँखों में जख़्म जल प्रपात बने हैं।।-1देखन आए जो रावण सन्निपात बने हैं।कुलदीपक थे घर के अब रात बने हैं।त्योहारों में ये मातम सा क्यूँ हो गया-क्या रावण के मन के सौगात बने हैं।।-2महातम मिश्र,



"मुक्तक" हार-जीत के द्वंद में, लड़ते रहे अनेक। किसे मिली जयमाल यह, सबने खोया नेक।

"मुक्तक" हार-जीत के द्वंद में, लड़ते रहे अनेक।किसे मिली जयमाल यह, सबने खोया नेक।बर्छी भाला फेंक दो, विषधर हुई उड़ान-महँगे खर्च सता रहे, छोड़ो युद्ध विवेक।।-1हार-जीत किसको फली, ऊसर हुई जमीन।युग बीता विश्वास का, साथी हुआ मशीन।बटन सटन है साथ में, लगा न देना हाथ-यंत्र- यंत्र में तार है, जुड़ मत जान नगीन।।-2



"मुक्तक,"

"मुक्तक" हार-जीत के द्वंद में, लड़ते मनुज अनेक।किसे मिली जयमाल यह, सबने खोया नेक।बर्छी भाला फेंक दो, विषधर हुई उड़ान-पीड़ा सतत सता रहीं, छोड़ो युद्ध विवेक।।-1हार-जीत किसको फली, ऊसर हुई जमीन।युग बीता विश्वास का, साथी हुआ मशीन।बटन सटन दुख दर्द को, लगा न देना हाथ-यंत्र- यंत्र में तार है, जुड़ते जान नगीन।।-2



"मुक्तक"

"मुक्तक"युग बीता बीता पहर, लेकर अपना मान।हाथी घोड़ा पालकी, थे सुंदर पहचान।अश्व नश्ल विश्वास की, नाल चाक-चौबंद-राणा सा मालिक कहाँ, कहाँ चेतकी शान।।-1घोड़ा सरपट भागता, हाथी झूमे द्वार।राजमहल के शान थे, धनुष बाण तलवार।चाँवर काँवर पागड़ी, राज चाक- चौबंद-स्मृतियों में अब शेष हैं, प्रिय सुंदर उपहार।।-2महातम



"मुक्तक"

बाल-दिवस पर प्रस्तुति"मुक्तक"काश आज मन बच्चा होता खूब मनाता बाल दिवस।पटरी लेकर पढ़ने जाता और नहाता ताल दिवस।राह खेत के फूले सरसों चना मटर विच खो जाता-बूढ़ी दादी के आँचल में सुध-बुध देता डाल दिवस।।-1गैया के पीछे लग जाता बन बछवा की चाल दिवस।तितली के पर को रंग देता हो जाता खुशहाल दिवस।बिना भार के गुरु शर



"मुक्तक"

रूप चौदस/छोटी दीपावली की सभी को हार्दिक बधाई एवं मंगल शुभकामना"मुक्तक"जलाते दीप हैं मिलकर भगाने के लिए तामस।बनाते बातियाँ हम सब जलाने के लिए तामस।सजाते दीप मालिका दिखाने के लिए ताकत-मगर अंधेर छुप जाती जिलाने के लिए तामस।।-1विजय आसान कब होती खुली तलवार चलती है।फिजाओं की तपिश लेकर गली तकरार पलती है।सु



"मुक्तक"

"मुक्तक"दीपक दीपक से कहे, कैसे हो तुम दीप।माटी तो सबकी सगी, तुम क्यों जुदा प्रदीप।रोज रोज मैं भी जलूँ, आज जले तुम साथ-क्या जानू क्या राज है, क्यों तुम हुए समीप।।-1धूमधाम बाजार में, चमक रहे घरबारचाक लिए कुम्हार है, माटी महक अपारतरह-तरह के दीप हैं, भिन्न-भिन्न लौ रंगबिकता कोई बिन कहे, कहाँ चटक त्यौहार



"मुक्तक"

आप का दिन मंगलमय हो,"मुक्तक"चढ़ा लिए तुम बाण धनुर्धर, अभी धरा हरियाली है।इंच इंच पर उगे धुरंधर, किसने की रखवाली है।मुंड लिए माँ काली दौड़ी, शिव की महिमा न्यारी है-नित्य प्रचंड विक्षिप्त समंदर, गुफा गुफा विकराली है।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



"मुक्तक"

"मुक्तक"सत्य समर्पित है सदा, लेकर मानक मान।जगह कहाँ कोई बची, जहाँ नहीं गुणगान।झूठा भी चलता रहा, पाकर अपनी राह-झूठ-मूठ का सत्य कब, पाता है बहुमान।।-1सही अर्थ में देख लें, लाल रंग का खैर।झूठ सगा होता नहीं, और सगा नहीं गैर।सत्य कभी होती नहीं, आपस की तकरार-झूठ कान को भर गया, खूँट बढ़ा गया बैर।।-2महातम मि



"छंद मुक्तक"

छंद- कीर्ति (वर्णिक) छंद विधान - स स स ग मापनी- 112 112 112 2"आप सभी महानुभावों को पावन विजयादशमी की हार्दिक बधाई""मुक्तक"मुरली बजती मधुमाषा हरि को भजती अभिलाषा रचती कविता अनुराधाछलकें गगरी परिहाषा।।-1घर में छलिया घुस आयायशुदा ममता भरमायागलियाँ खुश हैं गिरधारीबजती मुरली सुख छाया।।-2मथुरा जनमे वनवा



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