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आँख में उम्र कैद

आँख में उम्र कैद बल्ब की रोशनी लकड़ी की मेज मे पड़ रही थी, मेज के ऊपर एक किताब जिसके मुख्यप्रष्ठ मे उभरता शब्द शहर की तरफ ले गया शहर नदी के किनारे बसा परछाई को उसके पानी मे पाता हैं| दिन की रोशनी और रात की रोशनी मे अलग-अलग दिखता| इन दोनों की परछाई मे एक बस्ती शामिल थी जिसकी परछाई नदी मे डूबी रहती|



नदी तुम माँ क्यों हो...?

नदी तुम माँ क्यों हो...?सभ्यता की वाहक क्यों हो...?आज ज़ार-ज़ार रोती क्यों हो...? बात पुराने ज़माने की है जब गूगल जीपीएसस्मार्ट फोन कृत्रिम उपग्रह पृथ्वी के नक़्शे दिशासूचक यंत्र आदि नहीं थे एक आदमीअपने झुण्ड से जंगल की भूलभुलैया-सी पगडं



अमेरिकन राष्ट्रपति ट्रम्प एवं उत्तरी कोरियन तानाशाह किम जोंग

अमेरिकन राष्ट्रपति ट्रम्प एवं उत्तरी कोरिया के तानाशाह किम जोंग डॉ शोभा भारद्वाज नदी के दो किनारे मिलना असम्भव है लेकिन राजनीति में सब कुछ सम्भव | लगभग एक



बर्फ़

सुदूर पर्वत परबर्फ़ पिघलेगीप्राचीनकाल से बहतीनिर्मल नदिया में बहेगीअच्छे दिन कीबाट जोहतेकिसान के लिएसौग़ात बन जायेगीप्यासे जानवरों कागला तर करेगीभोले पंछियों कीजलक्रीड़ा मेंविस्तार करेगीलू के थपेड़ों की तासीरख़ुशनुमा करेगीएक बूढ़ा प्यासा अकड़ी



“गज़ल” नदी का किनारा टपकता रहा है॥

“गज़ल”कभी आदमी पल निरखता रहा हैकिराए के घर पर मचलता रहा हैउठा के रखा लाद जिसको नगर में तराजू झुका घट पकड़ता रहा है।।नई है नजाकत निहारे नजर को सजाकर खिलौना सिहरता रहा है।।मदारी चितेरा बनाया वखत को तमाशे दिखाकर सुलगता रहा है।।नचाता बंदरिया जमूरा बनाकर नए छोर नखरा उठाता रहा है



मुश्किल रहा है वो

खोया है कितना, कितना हासिल रहा है वोअब सोचता हूँ कितना मुश्किल रहा है वोजिसने अता किये हैं ग़म ज़िन्दगी के मुझकोखुशियों में मेरी हरदम शामिल रहा है वोक्या फैसला करेगा निर्दोष के वो हक़ मेंमुंसिफ बना है मेरा कातिल रहा है वोपहुँचेगा हकीकत तक दीदार कब सनम कासपनों के मुसाफिर की मंज़िल रहा है वोकैसे यक़ीन



ख़ुदकुशी करते रहे

यूँ मुसलसल ज़िन्दगी से मसख़री करते रहेज़िन्दगी भर आरज़ू-ए-ज़िन्दगी करते रहे एक मुद्दत से हक़ीक़त में नहीं आये यहाँ ख्वाब कि गलियों में जो आवारगी करते रहे बड़बड़ाना अक्स अपना आईने में देखकर इस तरह ज़ाहिर वो अपनी बेबसी करते रहे रोकने कि कोशिशें तो खूब कि पलकों ने पर इश्क़ में पागल थे आंसू ख़ुदकुशी करते रहे आ गया



वक़्त बिताया जा सकता है

यूँ भी दर्द-ए-ग़ैर बंटाया जा सकता हैआंसू अपनी आँख में लाया जा सकता हैखुद को अलग करोगे कैसे, दर्द से बोलोदाग, ज़ख्म का भले मिटाया जा सकता हैमेरी हसरत का हर गुलशन खिला हुआ हैफिर कोई तूफ़ान बुलाया जा सकता हैअश्क़ सरापा ख़्वाब मेरे कहते हैं मुझसेग़म की रेत पे बदन सुखाया जा



शामिल रहा है वो

खोया है कितना, कितना हासिल रहा है वोअब सोचता हूँ कितना मुश्किल रहा है वोजिसने अता किये हैं ग़म ज़िन्दगी के मुझकोखुशियों में मेरी हरदम शामिल रहा है वोक्या फैसला करेगा निर्दोष के वो हक़ मेंमुंसिफ बना है मेरा कातिल रहा है वोपहुँचेगा हकीकत



तुम्हारे हिज़्र में

गिर रही है आँख से शबनम तुम्हारे हिज़्र में एक ही बस एक ही मौसम तुम्हारे हिज़्र में क़तरे-क़तरे में शरारों सी बिछी है चांदनी बन गयी है हर ख़ुशी मातम तुम्हारे हिज़्र में आईना-ओ-



"देशज गीत, मोरे ननदी के भैया

"देशज गीत" जेठ दुपहरिया छँहाइ ल, मोरे ननदी के भैया...... ननदी के भैया मोरे ननदी के भैया......जेठ दुपहरिया मनाई ल,.....मोरे ननदी के भैया.... ननदी के भैया मोरे सासू के छैया जेठ जेठानी के नटखट बलैया पसिजल पसीना सुखाइ ल,........ मोरे ननदी के भैया........1 दूर हुए मोसे मा



नदी और समंदर

नदी को लगता हैकितना आसान हैसमंदर होनाअपनी गहराइयों के साथझूलते रहना मौजों परन शैलों से टकरानान शूलों से गुजरनान पर्वतों की कठोर छातियों को चीरकररास्ता बनानापर नदी नहीं जानती हैसमंदर की बेचैनी कोउसकी तड़प और उसकी प्यास कोकितना मुश्किल होता हैखारेपन के साथ एक पल भी जीनासमंदर हमेशा रहता हैप्यासाऔर भटकता



मन कहे कहे आवारा बन जा ...



नदी

सुधी साथियो,'बाघ' देखा है कभी आपने...? ज़रूर देखा होगा; और बहुत मुमकिन है कि कभी 'बाघ' शीर्षक की कविता का भी रस लिया हो ! अगर 'हाँ' तो अवश्य आपने डाo केदारनाथ सिंह की रचना पढ़ी होगी । 'बाघ' आपकी वो कविता है जो मील का पत्थर मानी जाती है । बहमुखी प्रतिभा के साहित्यकार डाo केदारनाथ सिंह सन 1934 में बलिया





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