निवाला

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वो अँधेरे से उजाला माँग बैठा, बहुत भूखा था निबाला मांग बैठा|

मेरी याद दिल से भुलाओगे  कैसे,गिराकर नज़र से उठाओगे कैसे|सुलगने ना दो ज़िन्दगी को ज्यादा,चिरागों से घर को बचाओगे  कैसे  



गजल --गर्म बाजार

कोई मस्जिद का, लेके हवाला चला ,कोई सर पे उठा के, शिवाला चला ।उनकी झोली भरी ,सब वतन लूट गया ,जब सियासत में, रश्में घोटाला चला ।भूख और प्यास का,गर्म बाज़ार है ,यारों वनवास को,फिर निवाला चला ।झूठ अमृत की चुस्की लगाता रहा,सच की महफ़िल में तो,विष का प्याला चला ।धूल और धुंध की,चादरें तन गईं ,मुल्क से दूर सच





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