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मुस्कुराहट भाग-४

कल्पना को फिर सपने की वह लाल साड़ी और कुर्ता याद आया। कल्पना ने धीर से काम की दुनिया से छुट्टी ली मंगलवार की। आज कल्पना ने अपनी मामी को फोन करके रोहतक आने के लिए कह दिया। वह अपने आस पास के तीन चार बाजार में गयी। कल्पना साड़ी, कुर्ता पजामा पसंद करना चाहती थी। यह चाह धीर और सपना के लिए थी। नवरात्



कविता

बदल रहा है रूप प्रकृति का बदल रहा पैगाम. खून के प्यासे घूम रहे शठ धरती के आवाम. -----------टुकड़ों में बँट जगह-जगह पर लोग लगाते नारा. -----------अगुवा उसी को चुनते सब जो होता ठग हत्यारा. किसी को कुछ भी कहते निर्भय मुँह में नहीं लगाम. बदल रहा है रूप प्रकृति का बदल रहा





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