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क्या-क्या नहीं करता है पेड़ दिनभर...

दिनकर की धूप पाकर भोजन बनाता है पेड़ दिनभर,लक्ष्यहीन अतरंगित असम्पृक्त को भटकन से उबारता है पेड़ दिनभर। चतुर्दिक फैली ज़हरीली हवा निगलता है पेड़ दिनभर, मुफ़्त मयस्सर प्राणवायु उगलता है पेड़ दिनभर। नीले शून्य में बादलों को दिलभर रिझाता है पेड़ दिनभर, आते-जाते थके-हारे परि



देशज गीतिका, ई उभरल पसीना भर लिलार हो गइल

देशज गीतिका. मात्रा - भार 22, समान्त - आर, पदांत- हो गइल जे पतुरिया के अँचरा उघार हो गइल माथ ओकरा अंहरिया सवार हो गइल दुईज़ चंदा नियन उग जे बिहरत रहे उ अमावस के जइसन भेंकार हो गइल॥ मन बिगड़लस जे आपना बना ना सकल ओकर जिनगी व रहिया पहार हो गइल॥ दूर से निम्मन लागेला झ





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