कहर से कवि हताश

"कवि हताश"अजीब बात है!हैरतअंगेज माहौल है!!सांसत आई विकराल, अजीबोगरीब हालात है!!!जब भयंकर दमघोंटू प्रदुषण था!ठेलमठेल- उमस भरी- दम घुटता था!!खुले में दुषित वायु फेफड़ों को भरता था!आज जब अजुबा भाइरस आया!सड़कों पर हटात् सन्नाटा छाया!!दिल्ली महानगर तक सुधर सँवर गया!आज सभी छुटभइये- युवा व वृद्ध घर में द



रुख़्सत

ये जो लोग मेरी मौत पर आजचर्चा फरमा रहे हैंऊपर से अफ़सोस जदा हैंपर अन्दर से सिर्फ एक रस्मनिभा रहे हैंमैं क्यों मरा कैसे मराक्या रहा कारन मरने कापूछ पूछ के बेवजह की फिक्रजता रहे हैंमैं अभी जिंदा हो जाऊँतो कितने मेरे साथ बैठेंगेवो जो मेरे र



युवा रचनाकार आलोक कौशिक की संक्षिप्त जीवनी

आलोक कौशिक एक युवा रचनाकार एवं पत्रकार हैं। इनका जन्म 20 जून 1989 को एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम पुण्यानंद ठाकुर एवं माता का नाम सुधा देवी है। मूलतः बिहार राज्य अन्तर्गत अररिया जिले के फतेहपुर गांव निवासी आलोक कौशिक ने स्नातकोत्तर (अंग्रेजी साहित्य) तक की पढाई बेगूसराय (बिहार) से की



युवा रचनाकार आलोक कौशिक की संक्षिप्त जीवनी

आलोक कौशिक एक युवा रचनाकार एवं पत्रकार हैं। इनका जन्म 20 जून 1989 को एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम पुण्यानंद ठाकुर एवं माता का नाम सुधा देवी है। मूलतः बिहार राज्य अन्तर्गत अररिया जिले के फतेहपुर गांव निवासी आलोक कौशिक ने स्नातकोत्तर (अंग्रेजी साहित्य) तक की पढाई बेगूसराय (बिहार) से की



निहारता हूँ शून्य

काँच के पीछे सिमटतेहुए मन ही मनथिरक रहे अंतर केघुँघरूसमर्पण या ख़ौफ़ के शब्दोंमें निहारता हूँ शून्यनिरन्तर....निरन्तर... झरते शब्दों की हँसी निष्कासितनिस्पन्द हैदो पलों की छाया मेंनिहारता हूँ शून्यनिरन्तर....निरन्तर... अहं का लम्बा अंतरालअज्ञात दिशाओं में गुमसमझौता



संघर्ष पथ

2012 से दो वर्ष पूर्व यानी 2017 तक हर साल, मैं किसी न किसी एग्जाम के फाइनल राउंड तक पहुंचता था और फिर बाहर हो जाता था। फाइनल लिस्ट में हमेशा कुछ नंबरों से रह जाता था, हर बार।जब मैं कोई एग्जाम पास नहीं कर पाया, मुझे लगा मैं हार गया हूं। कुंठित हो गया और कुछ समय पश्चात दुख और अवसाद से घिर गया। अवसाद च



Hindi love poetry based on sentiments- मेरा श्रृंगार तुमसे ;अर्चना की रचना

प्रेम में स्त्री की भावना को दर्शाती हिंदी कविता मेरा श्रृंगार तुमसे दर्पण के सामने खड़ी होकर, जब भी खुद को सँवारती हूँ उस दर्पण में तुमको साथ देख,अचरज में पड़ जाती हूँशरमाकर कजरारी नज़रें नीचे झुक जाती हैं पर कनखियों से तुमको ही देखा करती हैं यूं आँखों ही आँखों में पूछ लेती



वो तीन घंटे....

वो तीन घंटे....उनने तो मुझे मौत का द्वार दिखा ही दिया था... लेकिन आज पांच: साल बाद भी जिंदा हूं!यह हकीकत है.... हममें से कइयों की जिंदगी में ऐसा भी होता है जब हम किसी व्यक्ति या समूह के जाल में फंस गये होते हैं.एक ऐसा किस्सा मेरे साथ भी हुआ है जब मुझे जीते जी मारने का प्रयास किया गया. यह कोई हादसा न



"Archana Ki Rachna" A Hindi Poetry Blog based based on life. : Preview "धुंध "

तुझ में उलझा हूँ इस कदर केअब कुछ भी सुलझता नहीं हर तरफ एक धुंध सी हैजो तेरे जातेकदमो से उठी है इसमें जीने की घुटनको मैं बयां कर सकता नहींहर जरिया बंद कर दियातुझ तक पहुंचने कापर एक तेरे ख्यालको कोई दरवाज़ारोक पाता नहींमैं जानता हूँ के तून आएगा अब कभीमेरा हाल भी पूछने क



एक सपना

जिंदगी तू बता दे, ये सपने तो है पर रास्ता कहाजब गले मौत के लगने ही है , तो दर्द से मुलाकात न करा जख्म तो बहुत है पर , मरहम लागू कौन सा ये लहू की लाली को भी मिट जाना, फिर क्यों सुरमे से है, सजना सवारना इस मुकद्दर ने भी



प्याज

ख्याल होगा। प्याज के दाम दोबारा बढ़े थे। पांच रुपए में एक यसे आंसू झरे थे। तभी निम्न लिखित रचना कल्पना में आयी थी। पढ़ें।एक कवि नेसम्पादक को अकेला पायाइधर-उधर देखाकिसी को ईर्द-गिर्द न पाझट कक्ष मेें घुस आयासम्पादक ने सर उठायाअवांछित तत्व को सामने देखबुरा सा मुंह बनाया



अभी तो सूरज उगा है

अभी तो सूरज उगा है डॉ शोभा भारद्वाज ‘न्यूज नेशन चैनल’ के लिये दीपक चौरसिया जीनें मोदी जी का 10 मई को इंटरव्यू लिया पांचवें चरण के चुनाव हो चुके थे केवलदो चरण बाकी थे |इंटरव्यू में विभिन्नविषयों पर मोदी जी से प्रश्न पूछे गये उन्होंने अपने द्वारा लिखित कविता की कुछपंक्तियाँ भी सुनाई विषय ‘अभी तो सू



खिली बसंती धुप "

खिली बसंती धुप "खिल उठी बसंती धुप फिजा भरी अंगड़ाई चली हवा सुगन्धित ऐसी प्रिये जब -जब मुस्कायी | रूप बदल नित नवीन श्रृंगार ले रौनक लाई अधरों मुस्कान रहा प्रिये जब ली अंगड़ाई | | मन मलिन कभी हुआ सम्मुख तब तुम आई खिली बसंती धुप नई प्रिये मन मुख मुस्कायी | हृदय ागुंजित स्वर बेला मंगल- बुद्धि ठकुराई



न दैन्यं न पलायनम्

ओजस्वी औरसंवेदनशील कवि, महान राजनीतिज्ञ श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्मदिवस परउभिन की दो रचनाओं के साथ समर्पित हैं श्रद्धा सुमन – इस महान युग पुरुष को… न दैन्यं न पलायनम्कर्तव्य के पुनीत पथ को हमने स्वेद से सींचा है, कभी-कभी अपने अश्रु और प्राणों का अर्ध्य भी दिया है |किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में



“गीत” सुंदर शब्द खिले रचना प्रिय॥

छंद - मोदक (वार्णिक) शिल्प विधान --भगण ×४ मापनी २११ २११ २११ २११“गीत” भाव लिखो जब आप सभी जन मान गुमान विचार लियो मन ठेस लगे न कलेश भरे जियसुंदर शब्द खिले रचना प्रिय॥गागर सागर चातक नागरपातरि देह सबे गुण आगर सावध बोल हिया न लगे उठ आपुहि आप पिया न चले रुठ॥ गौतम पाहुन आय गया



यह हैं दुनिया के 10 सबसे खूबसूरत पक्षी, मन खुश हो जायेगा तस्वीरें देख कर

WILDLIFE KE SUNDAR PAKSHIइंसानी रचना से ज्यादा रचनात्मक और खूबसूरत प्रकृति की रचना है जैसे नदी, पहाड़, फल, फुल, पशु-पक्षी आदि। यह सौंदर्य का वह स्वरूप है जिसे देखने मात्र से ही मन प्रसन्न हो उठता है और शांति का अनुभव होता है। इनके आकार, रंग, ध्वनी, स्वरूप को देख कर मानो ऐसा लगता है जैसे इन्हे प्रकृति



“गज़ल”जा मेरी रचना तू जा, मेले में जा के आ कभी

“गज़ल”जा मेरी रचना तू जा, मेले में जा के आ कभी घेरे रहती क्यूँ कलम को, गुल खिला के आ कभीपूछ लेना हाल उनका, जो मिले किरदार तुझको देख आना घर दुबारा, मिल मिला के आ कभी॥शब्द वो अनमोल थे, जो अर्थ को अर्था सके सुर भुनाने के लिए, डफली हिला के आ कभी॥छंद कह सकती नहीं तो, मुक्त हो



कवयित्री विशेषांक हेतु रचनाएँ आमंत्रित

*कवयित्री विशेषांक* के लिए रचनाएँ आमंत्रित------



"शून्य" 'आत्म विचारों का दैनिक संग्रह' "मृत्यु"

"मृत्यु" "नवीन जीव संरचना की उत्पत्ति का उद्देश्य ,प्रकृति के परिवर्तन का सन्देश जो सारभौमिक सत्य है"



सामने ही सवेरा था

वो रात घनी थी, चारों तरफ़ अंधेरा था निराशा की सर्द स्याही​ में, रास्ता घनेरा था वक्त के बेदर्द थपेड़ों से, बिख़रा मेरा बसेरा था ना बिखरे मेरे सपने, ना टूटा मेरा हौसला समेट



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