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अभी तो सूरज उगा है

अभी तो सूरज उगा है डॉ शोभा भारद्वाज ‘न्यूज नेशन चैनल’ के लिये दीपक चौरसिया जीनें मोदी जी का 10 मई को इंटरव्यू लिया पांचवें चरण के चुनाव हो चुके थे केवलदो चरण बाकी थे |इंटरव्यू में विभिन्नविषयों पर मोदी जी से प्रश्न पूछे गये उन्होंने अपने द्वारा लिखित कविता की कुछपंक्तियाँ भी सुनाई विषय ‘अभी तो सू



खिली बसंती धुप "

खिली बसंती धुप "खिल उठी बसंती धुप फिजा भरी अंगड़ाई चली हवा सुगन्धित ऐसी प्रिये जब -जब मुस्कायी | रूप बदल नित नवीन श्रृंगार ले रौनक लाई अधरों मुस्कान रहा प्रिये जब ली अंगड़ाई | | मन मलिन कभी हुआ सम्मुख तब तुम आई खिली बसंती धुप नई प्रिये मन मुख मुस्कायी | हृदय ागुंजित स्वर बेला मंगल- बुद्धि ठकुराई



न दैन्यं न पलायनम्

ओजस्वी औरसंवेदनशील कवि, महान राजनीतिज्ञ श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्मदिवस परउभिन की दो रचनाओं के साथ समर्पित हैं श्रद्धा सुमन – इस महान युग पुरुष को… न दैन्यं न पलायनम्कर्तव्य के पुनीत पथ को हमने स्वेद से सींचा है, कभी-कभी अपने अश्रु और प्राणों का अर्ध्य भी दिया है |किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में



“गीत” सुंदर शब्द खिले रचना प्रिय॥

छंद - मोदक (वार्णिक) शिल्प विधान --भगण ×४ मापनी २११ २११ २११ २११“गीत” भाव लिखो जब आप सभी जन मान गुमान विचार लियो मन ठेस लगे न कलेश भरे जियसुंदर शब्द खिले रचना प्रिय॥गागर सागर चातक नागरपातरि देह सबे गुण आगर सावध बोल हिया न लगे उठ आपुहि आप पिया न चले रुठ॥ गौतम पाहुन आय गया



यह हैं दुनिया के 10 सबसे खूबसूरत पक्षी, मन खुश हो जायेगा तस्वीरें देख कर

WILDLIFE KE SUNDAR PAKSHIइंसानी रचना से ज्यादा रचनात्मक और खूबसूरत प्रकृति की रचना है जैसे नदी, पहाड़, फल, फुल, पशु-पक्षी आदि। यह सौंदर्य का वह स्वरूप है जिसे देखने मात्र से ही मन प्रसन्न हो उठता है और शांति का अनुभव होता है। इनके आकार, रंग, ध्वनी, स्वरूप को देख कर मानो ऐसा लगता है जैसे इन्हे प्रकृति



“गज़ल”जा मेरी रचना तू जा, मेले में जा के आ कभी

“गज़ल”जा मेरी रचना तू जा, मेले में जा के आ कभी घेरे रहती क्यूँ कलम को, गुल खिला के आ कभीपूछ लेना हाल उनका, जो मिले किरदार तुझको देख आना घर दुबारा, मिल मिला के आ कभी॥शब्द वो अनमोल थे, जो अर्थ को अर्था सके सुर भुनाने के लिए, डफली हिला के आ कभी॥छंद कह सकती नहीं तो, मुक्त हो



कवयित्री विशेषांक हेतु रचनाएँ आमंत्रित

*कवयित्री विशेषांक* के लिए रचनाएँ आमंत्रित------



"शून्य" 'आत्म विचारों का दैनिक संग्रह' "मृत्यु"

"मृत्यु" "नवीन जीव संरचना की उत्पत्ति का उद्देश्य ,प्रकृति के परिवर्तन का सन्देश जो सारभौमिक सत्य है"



सामने ही सवेरा था

वो रात घनी थी, चारों तरफ़ अंधेरा था निराशा की सर्द स्याही​ में, रास्ता घनेरा था वक्त के बेदर्द थपेड़ों से, बिख़रा मेरा बसेरा था ना बिखरे मेरे सपने, ना टूटा मेरा हौसला समेट



कविता

पहने खद्दर मुख में पान.सस्मित कर अपना गुणगान. जेब में रख सारा विभाग--- रख हर बाधा का समाधान. हर अधिकारी से मिलने को-- ----------------अपनाते हो हर हथकंडा. -----------------धन्य हो हे चौराहे के पंडा. चौकी थाना विकास खंड. या कहीं से कोई मिला



कविता

होकर पीत पाँवड़े झरते. -----रग-रग में कटु पीड़ा भरते ------. तीर चुभा करके तुषार तन--- देकर दंश प्रताणित करते. खड़े विपिन एकाकीपन का होता है आभास. जब पतझड़ का करके अवसान.--आयेगा जीवन मधुमास . कली कोपलें की हरियाली -----तरु पिहकेगी कोयल काली .-



हास्य-व्यंग रचना.....

हास्य-व्यंग रचना.....“खुश्बुदार पैंट” सूट बूट टाई वाई लगाकर हैट कैट दिखाते हुए निकले जनाब अपना फैट सुबह सुबह किचकिच है पीच सड़क पर लबालब लोटे की लटकन भरी मलक पर पानी का गिरना भी तो आम बात है गुदगुदी दबाये बैठे हुए तमाम हाथ हैं चुक गई उनकी नजर भीगी जमीन पर गि



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अपनी सोई हुई रचनात्मक क्षमता को जगाएं एवं नवीन सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ें।'सफलता सूत्र' में अपनी रचनाएं प्रकाशित कराएं एवं पारिश्रमिक पाएं.➤ सबरंग के लिए आप ज्ञानवर्द्धक, रोचक, मनोरंजक, ज्ञान-विज्ञान, स्वास्थ्य, कला, संगीत, अध्यात्म, सफलता, साहित्य, कहानी, कविता, लघुकथा,



कविता

दर्पण टूटा, टुकड़ा बिखरा-- सबने देखा. पर हृद का टुकड़ा-- कौन देखता.साक्षी देकर सौगंध लिया- जीवन भर साथ निभाने का. हर व्यथा झेल आँसू पीकर-- संग जीने का मर जाने का. पतझड़ में झरा, हरित उपवन- सबने देखा. उजड़ा हिय-उपवन- कौन देखता. तड़पन की पीड़ा सस्म



“ रामलाल को आज ही मरना था ”

 सुबह के 10 बजे थे , किस्सा ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था , तभी उसका फ़ोन बजा ... उसके एक दूर के रिश्तेदार रामलाल जी जोकिशायद 89 वसंत देख चुके थेनही रहे थे . और किस्सा को ऑफिस के बजाय वंहा जाना पड़ा .किस्सा जब वंहा पंहुचा तो देखा घर बहार बरमादे से लेकर सड़कतक ” रंगमहल टेंट हॉउस “ से आई लाल रंग की कुर्सिय



क्रासिंग की परिचित बाला !

नीर भरे नयनों का प्याला, रुधी ज़बान, पैरों में छाला,अपलक देख रही क्रासिंग पे,कोई सेठ, कोई ठेठ, कोई बनता हुआ दिवाला,क्या आज मिल सकेगा मुझे पेट भर निवाला?एक आम आदमी का आम सच, सोच रही,सुस्त सी, कुछ पस्त सी, सिसकी लिए सकुचा रही,इक दबी आवाज़ में, अपनी दुआ का मोल मांग रही....अनायास पड़ी जो दृष्टि मेरी, उस भा



जिन्दा - रहना है, जरुरी इसलिए...

जिन्दा रहना है, जरुरी-इसलिए कि मरने का हमें कोई-हक़ ही नहीं है---- किसलिए, मरते है लोग-स्वयं ही, कैसे मान लिया, उन सबने, कि, मरना ही सही है------------(२) चिर-निद्रा की गोद वो, सुख़ से सोने जो चले-------- इससे पहले सोच ले, कल, इसी तरह, उनका, कोई प्रिय



सीकचे

बहुत अच्छे है वे लोग जो सीकचो में है उनके हाथो और पैरो में बेड़िया है उन्हें पता है वे किस जुर्म की सजा भुगत रहे है .......पर वोजिनके सीकचे दिखाई नहीं देते और न ही दिखाई देती है उनके हाथो और पैरो की बेड़ियाउन्हें नहीं पता की उनकी सजा किस जुर्म की है......ता उम्र यही ढूँढती रहती है और उम्र कट जाती है .





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