ज्ञान :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद जीव को देव दुर्लभ मानव शरीर प्राप्त होता है | इस शरीर को पाकर के मनुष्य की प्रथम प्राथमिकता होती है स्वयं को एवं अपने समाज को जानने की , उसके लिए मनुष्य को आवश्यकता होती है ज्ञान की | बिना ज्ञान प्राप्त किये मनुष्य का जीवन व्यर्थ है | ज्ञान प्राप्त कर लेना महत्व



खरमास

*सनातन धर्म के संस्कार , संस्कृति एवं वैज्ञानिकता सर्वविदित है | सनातन धर्म के महर्षियों ने जो भी नीति नियम बनाये हैं उनमें गणित से लेकर विज्ञान तक समस्त सूत्र स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं | सनातन धर्म के संस्कार रहे हैं कि मनुष्य जब गुरु के यहां जाता था तब वह सेवक बनकर जाता था | इस पृथ्वी पर एकछत्र शासन



श्रेष्ठता का भ्रम :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि का सृजन करने वाली आदिशक्ति भगवती महामाया , जिसकी सत्ता में चराचर जगत पल रहा है ! ऐसी कृपालु / दयालु आदिमाता को मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार विभिन्न नामों से जानता है | स्वयं महामाया ने उद्घोष किया है कि :- मैं ही ब्रह्मा , विष्णु एवं शिव हूँ | वही आदिशक्ति जहां जैसी आवश्यकता पड़ती है वहां



भूतों से बात करने वाले इस शख्स की रहस्यमयी तरीके से हुई थी मौत, आज जक नहीं सुलझी ये गुत्थी, क्यों ?......

ज़िंदगी से ज्यादा वो मौत का सच जानना चाहता था. मौत के बाद की सच्चाई पता लगाना चाहता था. मुर्दों को ढूंढना उसका शौक़ था. मुर्दों से बात करना उसका शग़ल. अनजान और अदृश्य लोगों की पहेली बुझाना उसका पेशा. लेकिन अब खुद उसी की मौत एक पहेली बन गई थी.ये कहानी है गौरव तिवारी की। अपनी महारत, खास मशीन और कैमरे



अरणि - मन्थन :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारे देश के महर्षियों / महापुरुषों ने देवताओं की पूजा का विधान तो बताया ही है साथ ही देवी - देवताओं की पूजा करने का माध्यम बनाया प्रकृति को | अनेकों वृक्ष एवं वनस्पतियाँ अनुष्ठानादि में विशेष महत्त्व रखते हैं | हमारे यहाँ अरण्यों (जंगलों) का उल्लेख खूब हुआ है | पुराण , वेद , महाभारत , रामायण से ले



माँगें भगवान को :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से इस धराधाम पर भगवान की तपस्या करके भगवान से वरदान मांगने की परंपरा रही है | लोग कठिन से कठिन तपस्या करके अपने शरीर को तपा करके ईश्वर को प्रकट करके उनसे मनचाहा वरदान मांगते थे | वरदान पाकर के जहां आसुरी प्रवृति के लोग विध्वंसक हो जाते हैं वहीं दिव्य आत्मायें लोक कल्याणक कार्य करती हैं | भग



सतसंग की दिव्यता :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

!! भगवत्कृपा हि केवलम् !! *इस धरा धाम पर जन्म लेने के बाद मनुष्य का परम उद्देश्य होता है भगवत्प्राप्ति , परंतु भगवान की कृपा के साथ साथ मनुष्य को माया भी चारों ओर से घेरे रहती है | मनुष्य के द्वारा आदिकाल से भगवान को प्राप्त करने के लिए अनेकों उद्योग किए जाते रहे हैं | हमारे धर्म ग्रंथों में भ



विनाश एवं सृजन :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

!! भगवत्कृपा हि केवलम् !! *परमपिता परमात्मा की अद्भुत सृष्टि में विनाश एवं सृजनजन अनवरत चलता रहता है | सतयुग से प्रारंभ हुआ सृजन समय-समय पर पुरानी सृजित वस्तुओं , सभ्यताओं एवं राष्ट्रों का विनाश कर के नई वस्तुओं , नई सभ्यता , नए-नए राष्ट्रों का सृजन परमात्मा के द्वारा किया जाता रहा है | कलियु



ब्राह्मणत्व :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

!! भगवत्कृपा हि केवलम् !! *सकल सृष्टि में चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ मनुष्य को माना गया है | कालांतर में चार वर्ण बन गये | इन चारों वर्णों में हमारे पुराणों ने ब्राम्हण को सर्वश्रेष्ठ कहा है | ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ अपने त्याग एवं तपस्या से हुआ है | त्यागमय जीवन एवं तपस्या के बल पर ब्रह्म



धार्मिकता

*हमारा देश भारत सामाजिक के साथ - साथ धार्मिक देश भी है | प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को धार्मिक दिखाना भी चाहता है | परंतु एक धार्मिक को किस तरह होना चाहिए इस पर विचार नहीं करना चाहता है | हमारे महापुरुषों ने बताया है कि धार्मिक ग्रंथों की शिक्षाओं और उसके चरित्रों को केवल उसके शाब्दिक अर्थों में नहीं ले



11 जनवरी 2019

खुशी के तीन राज़।

हम सभी जानते हैं कि पैसा खुशी नहीं खरीद सकता है ... लेकिन कई बार हम ऐसा कार्य करते हैं जैसे कि हम थोड़े अधिक पैसे के साथ खुश हैं। हम अमीर बनने के लिए इच्छुक हैं (जब हम जानते हैं कि अमीर खुश नहीं हैं या तो); हमें उस नवीनतम गैजेट या शैली को प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। हम अधिक पैसा कमा



शिक्षा एवं विद्या :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर मनुष्य के अतिरिक्त अनेक जीव हैं , और सब में जीवन है | मक्खी , मच्छर , कीड़े - मकोड़े , मेंढक , मछली आदि में भी जीवन है | एक कछुआ एवं चिड़िया भी अपना जीवन जीते हैं , परंतु उनको हम सभी निम्न स्तर का मानते हैं | क्योंकि उनमें एक ही कमी है कि उनमें ज्ञान नहीं है | इन सभी प्राणियों में सर्



मृत्युलोक :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर जन्म लेकर के मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक आने को क्रियाकलाप संपादित करता रहता है एवं अपने क्रियाकलापों के द्वारा समाज में स्थापित होता है | कभी-कभी ऐसा होता है कि मनुष्य जन्म लेने के तुरंत बाद मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और कभी कभी युवावस्था में उसकी मृत्यु हो जाती है | ऐसी स्



ब्रह्म :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर जन्म लेने के बाद मनुष्य जीवन भर सहज जिज्ञासु बनकर जीवन व्यतीत करता है | मनुष्य समय-समय पर यह जानना चाहता है कि वह कौन है ? कहां से आया है ? और उसको इस सृष्टि में भेजने वाला वह परमात्मा कैसा होगा ? कोई उसे ब्रह्म कहता है कोई परब्रह्म कहता है ! अनेक नामों से उस अदृश्य शक्ति को लोग पूजते



तपस्या का मर्म :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में तपस्या का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है | किसी भी अभीष्ट को प्राप्त करने के लिए उसका लक्ष्य करके तपस्या करने का वर्णन पुराणों में जगह जगह पर प्राप्त होता है | तपस्या करके हमारे पूर्वजों ने मनचाहे वरदान प्राप्त किए हैं | तपस्या का वह महत्व है , तपस्या के बल पर ब्रह्माजी सृजन , विष्णु ज



शौचालय का प्रेत भाग - २

उस समय जोग्शवरी रेल्वे स्टेशन मे प्लेटफार्म के आगे की तरफ से उसके कुछ मध्य भाग तक कम रोशनी हुआ क



शौचालय का प्रेत भाग - १

ये घटना सन् २०१३ की है, मैं तब मुँबई के Posh Area लोखंडवाला के पास



ज्ञान :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन काल से हमारा देश भारत ज्ञान का भंडार एवं ज्ञानियों की उदयस्थली रहा है | संपूर्ण विश्व में कुछ ना कुछ शिक्षा हमारे देश भारत से अवश्य ग्रहण की , क्योंकि संपूर्ण विश्व सबसे प्राचीन सभ्यता हमारी ही रही है | दुर्लभ से दुर्लभ ज्ञान सनातन परंपरा में ही देखने को मिलते हैं , इन्हीं का अनुसरण करके विश्



जीवन एक यात्रा :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*जीवन एक यात्रा है | इस संसार में मानव - पशु यहाँ तक कि सभी जड़ चेतन इस जीवन यात्रा के यात्री भर हैं | जिसने अपने कर्मों के अनुसार जितनी पूंजी इकट्ठा की है उसको उसी पूंजी के अनुरूप ही दूरी तय करने भर को टिकट प्राप्त होता है | इस जीवन यात्रा में हम खूब आनंद लेते हैं | हमें इस यात्रा में कहीं नदियां घ



साँच बराबर तप नहीं :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में तप या तपस्या का बहुत महत्व है | प्राचीनकाल में ऋषियों-महर्षियों-राजाओं आदि ने कठिन से कठिनतम तपस्या करके लोककल्याण का मार्ग प्रशस्त किया है | गोस्वामी तुलसीदास जी ने तो तपस्या के महत्व को दर्शाते हुए कहा है कि :- तप के ही बल पर ब्रह्मा जी सृष्टि, विष्णु जी पालन एवं शंकर जी संहार करते



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