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राष्ट्रीय एकता दिवस (31 अक्टूबर)

..... इंसानियत ही सबसे पहले धर्म है, इसके बाद ही पन्ना खोलो गीता और कुरान का......"जय हिन्द"



बदल गया सुखदुआ समाज

किन्नर से बने सुखदुआ | SUKHDUA SAMAJहारमोनल इनबायलेंस के कारण आयी एक बीमारी की वजह से हमारा समाज हमेशा ही उन्हें कौतुहल से देखता आया है। सैंकड़ो-हजारोंं वर्षों से उपेक्षित इस समाज को किन्नर, हिजड़ा, छकका और भी न जाने किन-किन नामों से पुकारा जाता रहा लेकिन डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने 14 नवंब



मैं तेरे साथ जी न सका ,अकेला मर तो सकता हूँ

मैं तेरे साथ जी नहीं सका, अकेलामर तो सकता हूँ डॉ शोभा भारद्वाज रिसेटेलमेंट कालोनी के छोटेप्लाट में बने चार मंजिला घर में हा –हाकार मचा था उस घर के जवान बेटे ने फांसीलगा ली थी घर का कमाऊ बेटा तीन भाई पाँच बहनों का भाई अंधे पिता ,बीमार माँ कासहारा जिसने भी सुना हैरान रह गया फांसी के बाद लम्बी गर्दन



सविता

सविता अपने बचपन की सारी खुशीयों को अपने माँबाप के साथ नही बाँट पाई। गाँव को समझ नही पाई, चाँद तारों की छाव में उनकीठंडक को भाँप नही पाई, चन्द सवाल ही पूछ पाती कि चंदा मामा कितनीदूर है? गोरी कलाइयों में बंधे दूधिया तागे कमजोर पड़ गए थे| पैरो में पड़ी पाज़ेब की खनक छनक से अपने नानी नाना के दिल को मोहने ल



"गीतिका" छा रही कितनी बलाएँ क्या बताएँ साथियों द्वंद के बाजार में क्या क्या सुनाएँ साथियों

छन्द- सीता (मापनीयुक्त वर्णिक) वर्णिक मापनी - 2122 2122 2122 212 अथवा लगावली- गालगागा गालगागा गालगागा गालगा पारंपरिक सूत्र - राजभा ताराज मातारा यमाता राजभा (अर्थात र त म य र)"गीतिका" छा रही कैसी बलाएँ क्या बताएँ साथियोंद्वंद के बाजार मे



रहीम के २० प्रसिद्ध दोहे सार सहित - Rahim ke dohe in Hindi

दोहा :- दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं। जान परत हैं काक पिक, रितु बसंत के नाहिं॥अर्थ :- रहीम कहते हैं कि कौआ और कोयल का रंग एक समान कला होता हैं. जिस कारण जब तक उनकी आवाज़ सुनाई न दे दोनों में भेद कर पाना बेहद कठिन है परन्तु जब बसंत ऋतु आती है तो कोयल की मधुर आवाज़ से दोनों में का अंतर स्प



जातियां और आज का भारत

आज के भारत में जातियां अस्तित्वहीन हो चुकी है। परन्तु राजनीति बांटने और वोट बैंक बनाने के लिये आज भी इसका भरपूर प्रचार कर रही हैं। इसे रोका जाना चाहिये। भारत सरकार को अब सरकारी फार्मों आदी से जाति का कॉलम हटा देना चाहिये। इसके स्थान पर केवल वर्ग जैसे - साम



पाकिस्तानी प्रधान मंत्री इमरान खान की भारत के प्रति विदेश नीति

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान , भारत के प्रति विदेश नीति डॉ शोभा भारद्वाज पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की भारत के प्रति विदेश नीति ने वैसी ही करवटें बदलीं जैसीपकिस्तान के हुक्मरानों की आदत रही है चुनावी भाषणों में उनका भारत के प्रति रुखआक्रामक था लेकिन चुनाव में जीत के बाद अपने भाषण



भूख ?

भूख ? डॉ शोभा भारद्वाज भारत विकास शील देश है, राजधानी दिल्ली में चर्चा है तीन बच्चियाँ मर गयी पोस्ट मार्टम करने वाले डाक्टर ने कहा उनके पेट में अन्न का दाना भी नहीं था कुपोषण की शिकार आभा रहित बच्चियाँ सूख गयीं थी उनके शव देख कर ऐसा लगता था जैसे आठ दिन से कुछ खाया नही



“गीतिका”हर मौसम के सुबह शाम से इक मुलाक़ात रही है

समांत- अही पदांत- है मात्रा भार-२९ १६ १३ पर यति “गीतिका”हर मौसम के सुबह शाम से इक मुलाक़ात रही है सूरज अपनी चाल चले तो दिन और रात सही है भोर कभी जल्दी आ जाती तब शाम शहर सजाती रात कभी दिल दुखा बहकती वक्त की बात यही है॥हरियाली हर ऋतु को भाती जब पथ पुष्प मुसुकाते गुंजन करते



कुछ तो लोग कहेंगे

जब किसी को अपने में कोई खूबी नज़र नहीं आती तब वो दुसरो में बुराई खोजता है. ऐसे लोगो की जिंदगी दुसरो में बुराई ढूंढ़ने और बुराई करने में ही गुज़र जाती है, और एक रोज़ जब वो दुनिया छोड़ देते है तो लोग भी उसको याद करना छोड़ देते है. रहीम ने कहा है " बुर



11 जुलाई विश्व जनसंख्या दिवस और भारत

11 जुलाई विश्व जनसंख्या दिवस और भारत डॉ शोभा भारद्वाज विश्व में 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है |जिस तेजी से अनियमित रूप से जनसंख्या की वृद्धि हो रही है जबकि सार्थक जनसंख्या की वृद्धि कम है चिंता का विषय है देश का विकास गरीब बिमार, अस्वस्थ और बेरोजगारों क



एक बूँद की कहानी है...

एक बून्द की कहानी है... एक बून्द की ज़ुबानी है .. इस रामझिम बारिश की हर एक बून्द की बस यही निशानी है ... गिरती है ज़मीन पर तोह एक तड़पती प्यास को बुझाती है... पड़ती है तन पर तोह ... एक ख़ुशी का एहसास जगाती है... केहती है सबसे की बेवजह न दूषित करो मुझे मेरी लीला भी न्यारी ह



2017 में यह बड़ी हस्तियाँ गिरी मुँह के बल

आज बात करते है उन बड़ी हस्तियां की जिनके लिए रहा यह साल रहा बेहद खराबसाल 2017 को खत्म हुए कुछ दिन हो गए हैं, यह साल किसी के लिए अच्छा था तो किसी के लिए बुरा। बहुत लोग इस साल ज़मीन से उठ कर आसमान पर जा बैठे, वहीं कुछ हस्तियां एसी भी हैं जो



“गज़ल” ननद बैरन चिढ़ाती रही रात भर॥

“गज़ल” प्यार तुमसे जताती रही रात भरजाग सपने सजाती रही रात भर तुम न आए बहुत बेसहुर से लगेमौन महफिल नचाती रही रात भर॥ बेरहम थी शमा आग बढ़ती गई लौ जली को बुझाती रही रात भर॥ तक रही थी लिए पीर परछाइयाँधुन्ध छायी हटाती रही रात भर॥ ठंड लगने लगी जब बदन पे मिरे थक खिलौना सुलाती रही रात भर॥ भोर हँसने लगी शोर डँ



“गज़ल” डालियाँ थी जल रही खग बे सहारा कर गई॥

“गज़ल”उस हवा से क्या कहूँ जो छल दुबारा कर गई रुक जला डाले महल औ दर किनारा कर गई रोशनी से वो नहाकर जब चली अपनी डगर देख लेती गर कभी उजड़े हुये इस चमन को तक न पाती रूह नजारा जो खरारा कर गई॥ उस पहर को क्या हुआ क्या पूछ पाती नजर सेहकबका कर पलट जाती छत उघारा कर गई॥ आज भी जो गंध ह



लेख-- व्यवस्था की टूटी चारपाई, मीडिया और हमारा समाज

संविधान में मीडिया को लोकतंत्र को चौथा स्तम्भ माना जाता है। इस लिहाज से मीडिया का समाज के प्रति उत्तरदायित्व और जिम्मदरियाँ बढ़ जाती हैं। मगर क्या वर्तमान वैश्विक दौर में जब कमाई का जरिया बनकर मीडिया रह गया है। वह समाज के प्रति अपने दायित्वों का सफल निर्वहन कर पा रहा है। उत्तर न में ही मिलेगा, क्योंक



जनता तो भगवान बनाती है साहब लेकिन शैतान आप

जनता तो भगवान बनाती है साहब लेकिन शैतान आप 13 मई 2002 को एक हताश और मजबूर लड़की, डरी सहमी सी देश के प्रधानमंत्री को एक गुमनाम ख़त लिखती है। आखिर देश का आम आदमी उन्हीं की तरफ तो आस से देखता है जब वह हर जगह से हार जाता है। निसंदेह इस पत्र की जानकारी उनके कार्याल



लेख-- बाबा न राम के हुए , न रहीम के

आज की नजाकत में धर्म पर हावी विज्ञान है। फ़िर भी धर्मांधता का चश्मा समाज पर चढ़ा है। सत्ता का तख़्त सजाती जनमानस है। जनमानस और सियासी रणबाकुरों की फ़ौज लिपटी एक बाबा के चरणों में है। आज देश में न्यू इंडिया का तासा पीटा जा रहा है, क्या न्यू इंडिया में जनमानस धर्मांधता का दामन ओढ़कर और सत्ता बाबाओं की जूती



स्त्री का अपमान मतलब पतन का आगाज

बाबाओं का संसार एक स्वेटर के सामान है. एक धागा क्या टूटा, पूरा स्वेटर ही उधड़ गया. फिर चाहे आसाराम हो या रामपाल या फिर राम रहीम. सिर्फ एक क्लू मिलते ही सारा तिलिस्म भरभरा कर गिर पड़ा. ये भारतीय न्याय व्यवस्था है, जिसमे दोषी के बचने की कोई गुंजाइश नहीं है. हां इतना जरूर



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