वसंत की याद

वसंत की याद✒️ अक्षुण्ण यौवन की सरिता में,पानी का बढ़ आनाकमल-कमलिनी रास रचायें,खग का गाना गाना;याद किया जब बैठ शैल पर,तालाबों के तीरेमौसम ने ली हिचकी उठकर,नंदनवन में धीरे।नाद लगाई पैंजनियों ने,चिट्ठी की जस पातीझनक-झनक से रति शरमायी,तितली गाना गाती;जगमग-जगमग दमक उठा जब,रवि किंशुक कुसुमों सामानस, आभामं



"गीतिका" अभी है आँधियों की ऋतु रुको बाहार हो जाना घुमाओ मत हवाओं को अजी किरदार हो जाना

मापनी-1222 1222 1222 1222, समान्त- आर का स्वर, पदांत- हो जाना"गीतिका"अभी है आँधियों की ऋतु रुको बाहार हो जानाघुमाओ मत हवाओं को अजी किरदार हो जानावहाँ देखों गिरे हैं ढ़ेर पर ले पर कई पंछीउठाओ तो तनिक उनको सनम खुद्दार हो जाना।।कवायत से बने है जो महल अब जा उन्हें देखोभिगाकर कौन रह पाया नजर इकरार हो जाना



"गीतिका" उग आई ऋतु है चाहत की मत लाना दिल में शामत की

मापनी- 22 22 22 22, समान्त- अत, पदांत- की"गीतिका"उग आई ऋतु है चाहत कीमत लाना दिल में शामत कीदेखो कितनी सुंदर गलियाँ खुश्बू देती हैं राहत की।। जब कोई लगता दीवाना तब मन होता है बसाहत की।।दो दिल का मिलना खेल नहींपढ़ना लिखना है कहावत की।।माना की दिल तो मजनू हैपर मत चल डगर गुनाहत की।।देखो कलियाँ चंचल ह



“गीत” ऋतु बसंती रूठ कर जाने लगी

छंद- आनंदवर्धक (मापनीयुक्त) मापनी- २१२२ २१२२ २१२“गीत”ऋतु बसंती रूठ कर जाने लगी कंठ कोयल राग बिखराने लगीदेख री किसका बुलावा आ गया छाँव भी तप आग बरसाने लगी मोह लेती थी छलक छवि छाँव की लुप्त होती जा रही प्रति गाँव कीगा रहे थे गीत गुंजन सावनी अब कहाँ रंगत दिवाली ठाँव की॥हो च



“मुक्तक” ऋतु बसंत मदमस्त पल रीति प्रीति अनुसार॥

“मुक्तक”रे प्रीतम मधुमास की छवि छटा एकाधिकार। डाल रंग या छोड़ दें फागुन को स्वीकार। पिया रहूँगी पाश में मत फेरों तुम नैन- खुली किवाड़ी साजना पर मेरे अधिकार॥-१साजन शिर सिंदूर है दे रहा सर्वाधिकार। होली में गोरी चली छटा रंग उपहार। कोरे कोरे गाल पर मल प्रिय लाल गुलाल।



"ऋतु की सौगत जाड़ा गर्मी बरसात"

"ऋतु की सौगत जाड़ा गर्मी बरसात"समय समय की बात है शायद यही तो ऋतुओं की सौगात है। गर्मी जाड़ा और बरसात हमारे साथ साथ है पर हम भूल जाते हैं प्रकृति के तासीर को और मनमानी करने से बाज नही आते। कभी तो हम इतने गरम हो जाते हैं कि शरीर के वस्त्र तक उतार फेंफते है और जब भीगते हैं तो



ऋतुराज

फिजाओं ने फिर, ओस की चादर है फैलाई, संसृति के कण-कण पर, नव-वधु सी है तरुणाई, जित देखो तित डाली, नव-कोपल चटक आई, ऋतुराज के स्वागत की, वृहद हुई तैयारी..... नव-वधु सी नव-श्रृंगार, कर रही ये वसुंधरा, जीर्



ऋतु बदली नहीं आप की साथियाँ॥ गजल

“गज़ल”आप के पास है आप की साखियाँ मत समझना इन्हें आप की दासियाँगैर होना इन्हें खूब आता सनम माप लीजे हुई आप की वादियाँ॥कुछ बुँदें पिघलती हैं बरफ की जमी पर दगा दे गई आप की खामियाँ॥दो कदम तुम बढ़ो दो कदम मैं बढूँइस कदम पर झुलाओ न तुम चाभियाँ॥मान लो मेरे मन को न बहमी बुझो देख



आफत की बारिश ☔

चेन्नई,कश्मीर और अब गुड़गाव(गुरु ग्राम) बाढ़ की चपेट में आकर अस्त-व्यस्त हो चुके हैं।अभी तक गाँव की अनियोजित बसावट और नदी के जलस्तर में अप्रत्याशित वृद्धि को ही बाढ़ का मुख्य कारण माना जाता था।अब राजधानी क्षेत्र के महानगर में बाढ़ ने सारे पुराने मिथक तोड़ दिये।विकास के नाम पर





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