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"गज़ल" हँसा कर रुलाते बड़ी सादगी से खिलौना छुपाते बड़ी सादगी से

वज़्न---122 122 122 122✍️अर्कान-- फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन✍️ क़ाफ़िया— आते स्वर की बंदिश) ✍️रदीफ़ --- बड़ी सादगी से "गज़ल"हँसा कर रुलाते बड़ी सादगी सेखिलौना छुपाते बड़ी सादगी सेहवा में निशाना लगाते हो तुम क्यों पखेरू उड़ाते बड़ी सादगी से।।परिंदों के घर चहचहाती खुशी हैगुलिस्ताँ खिलाते बड़ी सादगी से।।शिकारी कहू



"गज़ल" रुला कर हँसाते बड़ी सादगी से

क़ाफ़िया— ई स्वर कीबंदिश, रदीफ़- सादगी से"गज़ल" रुला कर हँसाते बड़ी सादगी सेगुलिस्तां खिलातेअजी सादगी सेहवा में निशानालगाने के माहिरपखेरू उड़ाते दबीसादगी से।।परिंदों के घर मेंनहीं मादगी परहिला डाल देते मिलीसादगी से।।शिकारी कहूँ याअनारी कहूँ तुम सजाते हो महफ़िलदिली सादगी से।।लपक जा रहे थे उड़ेथे फलक कोबिना



जब से मैंने गाँव क्या छोड़ा | मैं, लेखनी और जिंदगी

जब से मैंने गाँव क्या छोड़ा शहर में ठिकाना खोजा पता नहीं जब से मैंने गाँव क्या छोड़ा | मैं, लेखनी और जिंदगी





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