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"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी। अकुलात जिया मन लागत का छड़ राजन काहुँ गए बहरी।

दुर्मिल सवैया ( वर्णिक )शिल्प - आठ सगण, सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा 112 112 112 112 112 112 112 112, दुर्मिल सवैया छंद लघु से शुरू होता है ।छंद मे चारों पंक्तियों में तुकांत होता है"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी।अकुलात



"छंद मुक्त गीतात्मक काव्य" जी करता है जाकर जी लू बोल सखी क्या यह विष पी लू

"छंद मुक्त गीतात्मक काव्य"जी करता है जाकर जी लूबोल सखी क्या यह विष पी लूहोठ गुलाबी अपना सी लूताल तलैया झील विहारकिस्मत का है घर परिवारसाजन से रूठा संवादआतंक अत्याचार व्यविचारहंस ढो रहा अपना भारकैसा- कैसा जग व्यवहारजी करता है जाकर जी लूबोल सखी क्या यह विष पी लूहोठ गुलाबी अपना सी लू।।सूखी खेती डूबे बा



"मुक्त काव्य" जी करता है जाकर जी लू , बोल सखी क्या यह विष पी लू

"मुक्तकाव्य" जी करता है जाकर जीलूबोल सखी क्या यहविष पी लूहोठ गुलाबी अपना सीलूताल तलैया झीलविहारसुख संसार घरपरिवारसाजन से रूठा संवादआतंक अत्याचारव्यविचारहंस ढो रहा अपनाभारकैसा- कैसा जगव्यवहारहोठ गुलाबी अपना सीलूबोल सखी क्या यहविष पी लू॥ डूबी खेती डूबेबाँधझील बन गई जीवन साधसड़क पकड़ती जबरफ्तारहो जाता जी



"गीत"शीतल झरना बहता पानी फूलों सजी बहार सखीकितना दृश्य मनोरम लगता बगिया है गुलजार सखी

"गीत"शीतल झरना बहता पानी फूलों सजी बहार सखीकितना दृश्य मनोरम लगता बगिया है गुलजार सखीमौसम झूम रहा मतवाला मनमयूर नर्तकी बनानीले पीले लाल बसंती प्रिय रंगो का बाग घनानाचे मोर मयूरी देखे लेकर नैनो में प्यार सखीशीतल झरना बहता पानी फूलों सजी बहार सखी।।ओढ़े चूनर गाती कजरी देख



“गीतिका” नयनन में श्याम री रोरी सखी

मापनी- ११११ २२२२ २२१२समांत- ओरी, पदांत- सखी “गीतिका”उपवन में राधिका गोरी सखी सुधबुध खो कान्हा होरी सखीजिनमन मुरली बड़ी प्यारी हुई मधुबन में नाचती भोरी सखी॥चितवन तुम भी तिन्ह झाँकी झरो सखियन में मालती मोरी सखी॥अब तुम से की कहूँ गति आपनी बिरहन जिय बाँधती डोरी सखी॥लखत ठगी



लघुकथा- सखी रे मोरा नैहर छूटा जाए

लघुकथा- सखी रे, मोरा नैहर छूटा जाए फूल लोढ़ने की डलिया हर सुबह, बसंती के हाथों में उछल- ककूदकर अपने आप ही आ जाती है मानों उसके नित्य के दैनिक कर्म में यह एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर समाहित हो गई है। उसकी दादी की पूजा में ताजे फूलों का भगवान के शर पर चढ़ना पूरे परिवार के लिए एक



कहानी...... सखी रे, मोरा नैहर छूटा जाय

कहानी...... "सखी रे, मोरा नैहर छूटा जाय" फूल लोढ़ने की डलिया हर सुबह, बसंती के हाथों में उछल- ककूदकर अपने आप ही आ जाती है मानों उसके नित्य के दैनिक कर्म में यह एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर समाहित हो गई है। उसकी दादी की पूजा में ताजे फूलों का भगवान के शर पर चढ़ना पूरे परिवार के



“मुक्तक” सैयां गए परदेश सखी सुन

“मुक्तक” सैयां गए परदेश सखी सुन इतर लगाए गणवेश सखी सुन केहि विधि जतन करूँ रंग अंगा चिठिया न लिखे उपदेश सखी सुन॥-1 डगर विदेशी प्रथमेश सखी सुन सुंदर सजना जिग्नेश सखी सुन छोड़ि गए मोही मोह मोहाए रूपक ललना लवलेस सखी सुन॥-2 महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



सखी री मोरे पिया कौन विरमाये?- एस. कमलवंशी

सखी री मोरे पिया कौन विरमाये? कर कर सबहिं जतन मैं हारी, अँखियन दीप जलाये, सखी री मोरे पिया कौन विरमाये... अब की कह कें बीतीं अरसें, केहिं कों जे लागी बरसें, मो सों कहते संग न छुरियो, आप ही भये पराये, सखी री मोरे पिया कौन विरमाये... गाँव की



16 सितम्बर 2015

यादें

गुमसुम सी तुम थी,एक शाम यूँ ही तुम्हे देखा बारिश की बूँदों से,तुम भींगी जा रही थी।था तुम्हे दूर जाना अपने निकेतन को,यह देख कवि का दिल हुआ विभोर और करने लगा शोर,खा जाके हे सखी! ये लो रेनकोट धारण करो इसे,था रेनकोट बढ़ा,सखी को रेनकोट पहनना याद है।



16 सितम्बर 2015

यादें

गुमसुम सी तुम थी,एक शाम यूँ ही तुम्हे देखा बारिश की बूँदों से,तुम भींगी जा रही थी।था तुम्हे दूर जाना अपने निकेतन को,यह देख कवि का दिल हुआ विभोर और करने लगा शोर,खा जाके हे सखी! ये लो रेनकोट धारण करो इसे,था रेनकोट बढ़ा,सखी को रेनकोट पहनना याद है।



सखी री...

कुछ भूली बिसरी यादें कुछ खट्टे-मीठे पल वो हंसी के ठहाके वो बिन रुके बातें याद आती है सखी री और आँखें हो जाती हैं नम होठों पे होती है मुस्कान और दिल में ये ख़्वाहिश की फिर से हो मिलना तुमसे कभी किसी मोड़ पर फिर से बिताएँ संग खूबसूरत से कुछ पल





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