क्या-क्या नहीं करता है पेड़ दिनभर...

दिनकर की धूप पाकर भोजन बनाता है पेड़ दिनभर,लक्ष्यहीन अतरंगित असम्पृक्त को भटकन से उबारता है पेड़ दिनभर। चतुर्दिक फैली ज़हरीली हवा निगलता है पेड़ दिनभर, मुफ़्त मयस्सर प्राणवायु उगलता है पेड़ दिनभर। नीले शून्य में बादलों को दिलभर रिझाता है पेड़ दिनभर, आते-जाते थके-हारे परि



देश और समाज के विकास में महिलाओं का योगदान अहम्

-स्वाति आनंदनारी ईश्वर की उत्कृष्ट सृष्टि है । कहते है कि नारी को देवी का रूप मन जाता है।देश के सम्पूर्ण विकास में इस देवी की भागीदारी अनिवार्य है। किसी भी समाज या देश के विकास में नारी का योगदान महत्वपूर्ण होता है। किसी भी राष्ट्रनिर्माण या समाज के विकास में जब तक न



जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से ही भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता संपूर्ण विश्व को दिशा निर्देश देती रही है | हमारे मनीषियों ने माता -;पिता एवं जन्मभूमि की महत्ता को बताते हुए लिखा है :- "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" अर्थात :- अपनी माता और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी महान है | हमारे सनातन धर्म के धर्मग्रंथों एवं व



नारी का सम्मान :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि की संकल्पना , उन्नति एवं विकास का आधार आदिकाल से नारी ही रही है | सृष्टि का आधार होने के कारण नारी को विधाता की अद्वितीय रचना कहा गया है | नारी समाज, संस्कृति और साहित्य का महत्वपूर्ण अंग है | सृष्टि के आरंभ से ही सृष्टि के निमार्ण और संचालन में नारी की अहम भूमिका रही है | मानव जाति की सभ्य



प्रकृति , पर्यावरण एवं मनुष्य :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से मनुष्य का सम्बन्ध प्रकृति एवं पर्यावरण से रहा है | घने जंगलों में प्रकृति की गोद में ही बैठकर ऋषियों ने तपस्या करके लोककल्याणक वरदान प्राप्त किये तो इसी प्रकृति की गोद में बैठकर हमारे पूर्वज महापुरुषों ने मनुष्य को सरल एवं सुगम जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करने वाले ग्रंथों की रचना की | प्र



प्रकृति का असंतुलन :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमपिता परमात्मा ने मनुष्य की सृष्टि करने के पहले उसकी आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए सुंदर प्रकृति की रचना की | धरती , आकाश की रचना करने के बाद मनुष्य के जीवन से जुड़े अग्नि , जल एवं वायु की रचना करके मनुष्य को एक सुंदर जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त किया | इस धरती पर ऊंचे - ऊंचे पहाड़ तो बनाये ही साथ



ज्ञान का अहंकार :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस सृष्टि का सर्वोच्च प्राणी मनुष्य जन्म लेने के बाद निरंतर प्रगतिशील रहा है | मनुष्य ने सफलता के कई मानदंडों को स्थापित किया , परंतु जब जब मनुष्य ने अपने बल , कौशल या ज्ञान को माध्यम बनाकर के कुछ सफलता अर्जित की है तो उसमें एक दुर्गुण चुपके से उत्पन्न हो जाता है जिसे वह स्वयं नहीं जान पाता उस दुर्



गृहस्थ जीवन का रहस्य :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से ही सामाजिक व्यवस्था के दो स्तंभ थे - वर्ण और आश्रम | मनुष्य की प्रकृति-गुण, कर्म और स्वभाव-के आधार पर मानवमात्र का वर्गीकरण चार वर्णो में हुआ था | व्यक्तिगत संस्कार के लिए उसके जीवन का विभाजन चार आश्रमों में किया गया था | ये चार आश्रम थे- (१) ब्रह्मचर्य, (२) गृहस्थाश्रम, (३) वानप्रस्थ और



दृढ़ संकल्प :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

दृढ़ संकल्प इस धरा धाम पर मानवयोनि में जन्म लेने के बाद मनुष्य जीवन में अनेकों कार्य संपन्न करना चाहता , इसके लिए मनुष्य कार्य को प्रारंभ भी करता है परंतु अपने लक्ष्य तक कुछ ही लोग पहुंच पाते हैं | इसका कारण मनुष्य में अदम्य उत्साह एवं अपने कार्य के प्रति निरंतरता तथा सतत प्रयास का अभाव होना ही कहा



आत्ममुग्धता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

आत्ममुग्धता इस धराधाम पर जन्म लेने के बाद मनुष्य अनेक प्रकार के शत्रुओं एवं मित्रों से घिर जाता है इसमें से कुछ सांसारिक शत्रु एवं मित्र होते हैं तो कुछ आंतरिक | आंतरिक शत्रुओं में जहाँ हमारे शास्त्रों ने काम , क्रोध , मद , लोभ आदि को मनुष्य का शत्रु कहा गया है वहीं शास्त्रों में वर्णित षडरिपुओं के



तू कविता हैं मुझ बंजारे की

तू कविता हैं मुझ बंजारे की, सुबह की लाली, शाम के अँधियारे की, वक्त के कोल्हू पे रखी, ईख के गठियारे की, हर पल में बनी स्थिर, नदियों के किनारे की, सूरज की, धरती की, टमटमाते चाँद सितारे की, हान तू कविता है मुझ बंजारे की। तू कविता हैं मुझ बंजारे की, रुके हुए साज पर, चुप्पी के इशारे की, इस रंगीन समा में



एक वृक्ष सौ पुत्र समान :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से ही मनुष्य एवं प्रकृति का अटूट सम्बन्ध रहा है | सृष्टि के प्रारम्भ से ही मनुष्य प्रकृति की गोद में फलता - फूलती रहा है | प्रकृति ईश्वर की शक्ति का क्षेत्र है | इस धरती का आभूषण कही जाने वाली प्रकृति की महत्ता समझते हुए हमारे महापुरुषों ने इसके संरक्षण के लिए सनातन धर्म के लगभग सभी ग्रंथों



दुराग्रही :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में ब्रह्मा जी ने अलोकिक सृष्टि की है | यदि उन्हों ने दुख बनाया तो सुख की रचना भी की है | दिन - रात , साधु - असाधु , पाप - पुण्य आदि सब कुछ इस सृष्टि में मिलेगा | मनुष्य जन्म लेकर एक ही परिवार में रहते हुए भी भिन्न विचारधाराओं का अनुगामी हो जाता है | जिस परिवार में रावण जैसा दुर्दान्त विचा



श्रद्धा एवं विश्वास :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन अनेक विचित्रताओं से भरा हुआ है | मनुष्य की इच्छा इतनी प्रबल होती है कि वह इस संसार में उपलब्ध समस्त ज्ञान , सम्पदायें एवं पद प्राप्त कर लेना चाहता है | अपने दृढ़ इच्छाशक्ति एवं किसी भी विषय में श्रद्धा एवं विश्वास के बल पर मनुष्य ने सब कुछ प्राप्त भी किया है | मानव जीवन में श्रद्धा एवं वि



मनुष्य एवं प्रकृति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमपिता परमात्मा ने सुंदर सृष्टि का सृजन किया | ऊँचे - ऊँचे पहाड़ , पहाड़ों पर जीवनदायिनी औषधियाँ , गहरे समुद्र , समुद्र में अनेकानेक रत्नों की खान उत्पन्न करके धरती को हरित - शस्य श्यामला बनाने के लिए भिन्न - भिन्न प्रजाति के पेड़ पौधों का सृजन किया | प्राकृतिक संतुलन बना रहे इसलिए समयानुकूल ऋतुएं



समूह या संगठन का महत्त्व :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*जबसे इस धराधाम पर मानव की सृष्टि हुई तबसे ही मनुष्य ने समूह एवं संगठन को महत्त्व दिया है | या यूँ भी कहा जा सकता है कि मनुष्य के विकास में समूह व संगठन का विशेष योगदान रहा है | आदिकाल में जब न तो घर थे और न ही जीवन को सरल बनाने के इतने साधन तब मनुष्य समूह बनाकर रहते हुए एक - दूसरे के सुख - दु:ख में



बदल गया सुखदुआ समाज

किन्नर से बने सुखदुआ | SUKHDUA SAMAJहारमोनल इनबायलेंस के कारण आयी एक बीमारी की वजह से हमारा समाज हमेशा ही उन्हें कौतुहल से देखता आया है। सैंकड़ो-हजारोंं वर्षों से उपेक्षित इस समाज को किन्नर, हिजड़ा, छकका और भी न जाने किन-किन नामों से पुकारा जाता रहा लेकिन डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने 14 नवंब



मनुष्य का चरित्र :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमपिता परमात्मा की सृष्टि जितनी अनुपम एवं अनूठी है उतनी ही विचित्र भी है | इन्हीं विचित्रताओं में सबसे विचित्र है मनुष्य का जीवन | यद्यपि समस्त मानव जाति की रचना परमात्मा ने एक समान की है परंतु सबका अपना सौंदर्य है , अपना वजूद है , अपनी रंगत है , अपना स्वरूप है , अपनी विशेषता है व अपनी उपयोगिता ह



विद्वान कौन ?? :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से इस धराधाम पर विद्वानों की पूजा होती रही है | एक पण्डित / विद्वान को किसी भी देश के राजा की अपेक्षा अधिक सम्मान प्राप्त होता है कहा भी गया है :- "स्वदेशो पूज्यते राजा , विद्वान सर्वत्र पूज्यते" राजा की पूजा वहीं तक होती है जहाँ तक लोग यह जामते हैं कि वह राजा है परंतु एक विद्वान अपनी विद्वत



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