संस्कारों का महत्व :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद एक मनुष्य को पूर्ण मनुष्य बनने के लिए उसके हृदय में दया , करुणा , आर्जव , मार्दव ,सरलता , शील , प्रतिभा , न्याय , ज्ञान , परोपकार , सहिष्णुता , प्रीति , रचनाधर्मिता , सहकार , प्रकृतिप्रेम , राष्ट्रप्रेम एवं अपने मह



पर्यावरण संरक्षण :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि का मूल है प्रकृति इसके बिना जीव का कोई अस्तित्व नहीं है | प्रकृति अग्नि , जल , पृथ्वी , वायु एवं अंतरिक्ष से अर्थात पंचमहाभूते मिलकर बनी है जिसे पर्यावरण भी कहा जाता है | पर्यावरण का संरक्षण आदिकाल से करने का निर्देश हमें प्राप्त होता रहा है | हमारे देश भारत की संस्कृति का विकास वेदों से हुआ



सुशीलो मातृपुण्येन :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य अनेक प्रकार के क्रियाकलाप करता रहता है , अपने क्रियाकलाप एवं कर्मों के आधार पर मनुष्य को यहां सम्मान एवं अपमान प्राप्त होता है | कोई भी संतान संस्कारी तभी हो सकती है जब उसके माता-पिता में भी संस्कार हो | सबसे बड़ा संस्कार है सुशील होना | संतान सुशील तभी हो सकती



सलाह लेते रहें सम्मान देते रहें :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन को सुचारू ढंग से जीने के लिए जहां अनेक प्रकार की आवश्यक आवश्यकता होती है वही समाज एवं परिवार में सामंजस्य बनाए रखने के लिए मनुष्य को एक दूसरे से सलाह परामर्श लेते हुए दूसरों का सम्मान भी करना चाहिए | ऐसा करने पर कभी भी आत्मीयता मे कमी नहीं आती | जहां परिवार में परामर्श नहीं होता है उसी पर



विचित्र अहसास

बिचित्र अहसास डॉ शोभा भारद्वाज जीवन में कई बार बेहद रोमांचक घटित होता है . ईरान के खुर्दिस्तान प्रांत की राजधानी सन्नंदाज के आखिरी छोर के अस्पताल में मेरे पति डाक्टर एवं इंचार्ज थे बेहद ख़ूबसूरत घाटी थी .उन दिनों वहाँ ईरान इराक में युद्ध चलता रहता था ,कभी रुक जाता फि



पाकिस्तान आज के युग में भी कुफ्र काफिर की मानसिकता से ग्रस्त है

पाकिस्तान आज केयुग में कुफ्र काफिर की मानसिकता से ग्रस्त है डॉ शोभा भारद्वाज मजहब के नाम पर पकिस्तान का निर्माण हुआ थायहाँ अल्पसंख्यको को पाकिस्तान में निरंतरनिशाना बनाया जाता रहा है .इस्लाम के सभीअनुयायी मुसलमान कहलाते हैं हैं लेकिन फिरभी वह कई पंथों में बंटे हैं अलग – अलग पन्थ के मुस्लिम भी सुर



आंग्ल नववर्ष :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म एवं उसकी मान्यताएं इतनी दिव्य रही हैं कि वर्ष का प्रत्येक दिन , महीना एवं वर्षारंभ सब कुछ प्रकृति के अनुसार मनाए जाने की परंपरा सनातन धर्म में देखी जा सकती है | जब प्रकृति अपना श्रृंगार कर रही होती है तब सनातन धर्म का नव वर्ष मनाया जाता है | बारह महीनों में चैत्र माह को मधुमास कहा गया है



प्रश्न नहीं ,अब परिभाषा बदलनी होगी !

चाहतीहूँ ,उकेरना ,औरत के समग्र रूपको, इस असीमित आकाश में !जिसके विशालहृदय में जज़्बातों का अथाह सागर,जैसे संपूर्ण सृष्टि कीभावनाओं का प्रतिबिंब !उसकेव्यक्तित्व कीगहराई में कुछ रंग बिखर गए हैं । कहींव्यथा है ,कहीं मानसिक यंत्रणा तो कहींआत्म हीनता की टीस लिए!सदियोंसे आज



न्याय के लिए क्या मरना ज़रूरी है ....?

यह कौन -सा विकास हो रहा है ...? जहाँ ,गलत को सही ,और ,सही को दबा देने का प्रयास हो रहा है !वे कहते हैं ,साक्षरता बढ़ रही है । समाज की कुंठित सोच तो आज भी पनप रही है ।औरत आज भी है ,मात्र हाड़ -माँस की कहानी , शरीर की भूख मिटा , जिसे रौंद कर मिटा देने में है आसानी!हाँ ,यह लोकतंत्र है ...!अंधा क़ानून सबूत



जानिए कब नहीं करते लोग मदद

हमें अपनी ज़िंदगी की जिम्मेदारियां खुद हीउठानी पड़ती है, लेकिन मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो ऐसे में ये कहना कि वो हीअकेले सारे काम कर सकता है तो ये कहना गलत ही होगा। एक दूसरे के सहयोग से ही समाजआगे बढ़ता है लेकिन कब लोग मदद करने से मुंह फेर लेते है इसका उदाहरण बचपन



सिंदूर

"सिंदुर''ब्रह्मरंध नियंत्रण सिंदूर कापारा करता है।सुहागन का जीवनतनाव मुक्त करता है।।अनिद्रा मुक्त कर श्नायु तंत्र कोचैतन्य रखता है।।🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩परंपरा, धर्म जब ताखे पर रख डालाब्रह्मरंध्र का क्या दे फिर मित्र हवालानींद गई-सुख-चैन गया- झेलें तुर्राचित्त चंचल- स्वप्नों की हलचल 🌊🌊🌊🌊🌊🌊



माता पिता :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन देवता , दानव , यक्ष , गंधर्व आदि सबसे ही श्रेष्ठ कहा गया है | इस मानव जीवन को सभी योनियों में श्रेष्ठ इसलिए कहा गया है क्योंकि मनुष्य के समान कोई दूसरी योनि है ही नहीं | यह दुर्लभ मानव शरीर हमें माता-पिता के सहयोग से प्राप्त होता है यदि माता-पिता का सहयोग ना होता तो शायद यह दुर्लभ मानव



कैसा ये सभ्य समाज

इन्सानियत को हमने रुलाया है आज डर ने मुकाम दिल में बनाया है मंदिर से अधिक मधुशालाएं हैं ऐसा बदलाव अपने देश में आया है ये वस्त्रहीन सभ्यता अपने देश की नहीं पर्दा ही आज ,लाज पर से उठाया है बेकारी ,भूंख प्यास ने सबको रुलाया है भारत में यह कैसा अच्छा दिन आया है साहित्य से क्यों दूर हैं आज की पीढ़ियां इस



शिक्षक दिवस :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारा देश भारत विविधताओं का देश रहा है यहाँ समय समय पर समाज के सम्मानित पदों पर पदासीन महान आत्माओं को सम्मान देने के निमित्त एक विशेष दिवस मनाने की परम्परा रही है | इसी क्रम में आज अर्थात ५ सितम्बर को पूर्व राष्ट्रपति डा० सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती "शिक्षक दिवस" के रूप में सम्पूर्ण भारत में मना



पुत्र एवं पुत्री :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार को गतिशील करने के लिए ब्रह्मा जी ने नर नारी का जोड़ा उत्पन्न करके मैथुनी सृष्टि की जिससे कि मानव की वंशबेल इस धराधाम पर विस्तारित हुई ! आदिकाल से ही एक धारणा मनुष्य के हृदय में बैठ गयी कि पुत्र होना आवश्यक है ! इतिहास / पुराण में अनेकों कथानक प्राप्त होते हैं जहाँ लोगों ने पुत्र प्राप्ति क



त्याग की मूर्ति नारी एवं हलछठ :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि की संकल्पना की थी इसलिए इसे पुरुष प्रधान समाज कहा जाने लगा परंतु ब्रह्मा जी जैसे आदि पुरुष भी बिना नारी का सृजन किये इस सृष्टि को गतिमान नहीं कर पाये | नारी त्याग , तपस्या एवं समर्पण की प्रतिमूर्ति बनकर इस धरा धाम पर अवतरित हुई | सनातन धर्म में प्रतिदिन कोई न कोई पर्व एवं त्



ममता का कर्ज उसने चुका दिया ?

ममता का कर्ज उसने चुका दिया ?डॉ शोभा भारद्वाज मैं इस संसमरण का निष्कर्ष नहीं निकाल सकी कुछ वर्ष पुरानी बात है मुस्लिम समाज के रोजे चल रहे थे ईद को अभी एक हफ्ता शेष था इन दिनों बाजारों की रौनक निराली होती हैं महिलाओं बच्चों के नये डिजाइन के रेडीमेड कपड़े आर्टिफिशियल ज्वेलरी चूड़ियां झूमर और न जाने क्



सदाचरण :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में व्रत , पूजन आदि करते रहने के विधान बताए गए हैं | उन सब का फल प्राप्त करने के लिए लोग तरह - तरह के अनुष्ठान करते हैं | इन अनुष्ठानों का एक ही उद्देश्य होता है -- परमात्मा की उपासना या परमात्मा को प्राप्त करने का उपाय कहा जा सकता है | यह सारे व्रत , सारे अनुष्ठान करने पर भी उसका फल मा



दस्तक

दस्तकफिर वही शोर .....बाहर भी और अंदर भी ....!अंतः करण में गूँजते शब्द दस्तक देने लगे ।विद्यालय में नए सत्र के कार्यों के लिए सबके नाम घोषित किए जा रहे थे ।अध्यापकों की भीड़ में बैठी …..कान अपने नाम को सुनने को आतुर थे ,मगर..... नाम, कहीं नहीं.....!क्यों...? बहुत से सवाल मन में आ रहे थे । आस -पास बह



समाज सुधारक राजा राममोहन राय

समाज सुधारक राजा राम मोहन रायडॉ० शोभा भारद्वाजचिता से अर्श तकवैदिक काल के प्रारम्भ से अनेक महान स्त्रियाँ पुरुषों के समान विद्वान रही हैं | कन्या को विवाह के लिए वर चुनने की पूरी स्वतन्त्रता थी यहाँ तक परिवार एवं पति की सहमती से नियोग द्वारा उत्पन्न सन्तान को कुल का नाम मिलता था युवक युवती की सहमती



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