व्यक्तित्व निर्माण :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से समस्त विश्व में भारत को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था | यह सर्वोच्च स्थान हमारे देश भारत को ऐसे ही नहीं मिल गया था बल्कि इसके पीछे भारत की आध्यात्मिकता , वैज्ञानिकता एवं संस्कृति / संस्कार का महत्वपूर्ण योगदान था | हमारे देश भारत में प्रारंभ से ही व्यक्ति की अपेक्षा व्यक्तित्व का आदर्श ग्रहण



आवश्यकता आविष्कार की जननी है :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मनुष्य की इच्छायें एवं आवश्यकतायें अनन्त हैं | जब से मनुष्य इस धराधाम पर आया तब से ही यह दोनों चीजें विद्यमान हैं | एक सुंदर एवं व्यवस्थित जीवन जीने के लिए मनुष्य को नित्य नये आविष्कार करने पड़े , जहाँ जैसी आवश्यकता मनुष्य को प्रतीत हुई वहाँ वैसे आविष्कार मनुष्य करता चला गया | अपने इन्हीं आविष्कार



आज की संतानें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में मनुष्य जन्म लेने के बाद विवाहोपरांत मनुष्य की सबसे बड़ी कामना होती है संतान उत्पन्न करना | जब घर में पुत्र का जन्म होता है तो माता-पिता स्वयं को धन्य मानते हैं | हमारे शास्त्रों में भी लिखा है :- "अपुत्रस्तो गतिर्नास्ति" अर्थात जिसके यहां पुत्र नहीं होता उसकी सद्गति नहीं होती | संतान क



प्रायश्चित :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर की बनायी इस सृष्टि में जीव चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करता है | अनेक जन्मों के किये हुए सत्कर्मों के फलस्वरूप जीव को यह दुर्लभ मानवयोनि प्राप्त होती है | जहाँ शेष सभी योनियों को भोगयोनि कहा गया है वहीं मानवयोनि को कर्मयोनि की संज्ञा दी गयी | इस शरीर को प्राप्त करके मनुष्य अपने कर्मों के माध



कविता खुशबू का झोंका

कविता खुशबू का झोंका---------------------------- कविता खुशबू का झोंका, कविता है रिमझिम सावन कविता है प्रेम की खुशबू, कविता है रण में गर्जन कविता श्वासों की गति है, कविता है दिल की धड़कन हॅंसना रोना मुस्काना, कवितामय सबका जीवन कविता प्रेयसी से मिलन है, कविता अधरों पर चुंबन कविता महकाती सबको, कविता



जीवन में समभाव :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*यह समस्त सृष्टि निरन्तर चलायमान है ! जो कल था वह आज नहीं है जो आज है वह कल नहीं रहेगा | कल इसी धरती पर राम कृष्ण आदि महान पुरुषों ने जन्म लिया था जो कि आज नहीं हैं ! आज हम सब इस धरती पर जीवन यापन कर रहे हैं कल हम भी नहीं रहेंगे ! हमारी आने वाली पीढ़ियां इस धरती पर विचरण करेंगी | जहाँ कल नदियाँ थीं



माता पिता एवं गुर :;--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में तैंतीस करोड़ देवी देवताओं की मान्यता है | इन देवी - देवताओं को शायद ही किसी ने देखा हो , ये कल्पना भी हो सकते हैं | देवता वही है जिसमें कोई दोष न हो , जो सदैव सकारात्मकता के साथ अपने आश्रितों के लिए कल्याणकारी हो | शायद हमारे मनीषियों ने इसीलिए इस धराधाम पर तीन जीवित एवं जागृत देवताओ



स्वार्थ एवं भावनायें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर परमात्मा की सर्वोत्कृष्ट रचना मनुष्य को मानी गई है | जन्म लेने के बाद मनुष्य ने धीरे धीरे अपना विकास किया और एक समाज का निर्माण किया | परिवार से निकलकर समाज में अपना विस्तार करने वाला मनुष्य अपने संपूर्ण जीवन काल में अनेक प्रकार के रिश्ते बनाता है | इन रिश्तो में प्रमुख होती है मनुष्य



सफलता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन पाकर के प्रत्येक व्यक्ति सफल होना चाहता है | जीवन के सभी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की इच्छा रखने वाला मनुष्य अपने उद्योग , प्रबल भाग्य एवं पारिवारिक सदस्यों तथा गुरुजनों के दिशा निर्देशन में सफलता प्राप्त करता है | परंतु मनुष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह कितना सकारात्मक



वाणी का संयम :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मनुष्य जीवन में संयम का बहुत ही ज्यादा महत्त्व है | ईश्वर ने मनुष्य की अनुपम कृति की है | सुंदर अंग - उपांग बनाये मधुर मधुर बोलने के लिए मधुर वाणी प्रदान की | वाणी का वरदान मनुष्य को ईश्वर द्वारा इस उद्देश्य से प्रदान किया है कि वह जो कुछ भी बोले उसके पहले गहन चिंतन कर ले तत्पश्चात वाणी के माध्यम स



परिवार :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सम्पूर्ण विश्व में भारत ही ऐसा देश है जहाँ से "वसुधैव कुटुम्बकम्" का उद्घोष हुआ | हमारे मनीषियों ने ऐसा उद्घोष यदि किया तो उसके पीछे प्रमुख कारण यह था कि मानव जीवन में कुटुम्ब अर्थात परिवार का महत्त्वपूर्ण व विशिष्ट स्थान है | देवी - देवताओं से लेकर ऋषि - मुनियों तक एवं राजा - महाराजाओं से लेकर असु



आपसी मतभेद :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमात्मा द्वारा सृजित यह सृष्टि बड़ी ही विचित्र है | ईश्वर ने चौरासी लाख योनियों की रचना की ! पशु , पक्षी , मनुष्य , जलचर आदि जीवों का सृजन किया | कहने को तो यह सभी एक जैसे हैं परंतु विचित्रता यही है कि एक मनुष्य का चेहरा दूसरे मनुष्य से नहीं मिलता है | असंख्य प्रकार के जीव हैं , एक ही योनि के होन



सत्य :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य अनेक प्रकार के घटनाक्रम से होते हुए जीवन की यात्रा पूरी करता है | कभी - कभी मनुष्य की जीवनयात्रा में ऐसा भी पड़ाव आता है कि वह किंकर्तव्यविमूढ़ सा होकर विचलित होने लगता है | यहीं पर मनुष्य यदि सत्यशील व दृढ़प्रतिज्ञ नहीं है तो वह अपने सकारात्मक मार्गों का त्याग



समाज के प्रति दायित्व :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनकर स्थापित हुआ | अपने विकासक्रम में मनुष्य समाज में रहकर के , सामाजिक संगठन बनाकर निरंतर प्रगति की दिशा में अग्रसर रहा | किसी भी समाज में संगठन के प्रति मनुष्य का दायित्व एवं उसकी भूमिका इस बात पर निर्भर करती है कि मनुष्य के अंदर इस जीवन रूपी उद्यान को सुग



वेदरीति/लोकरीति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल में जब इस सृष्टि में मनुष्य का प्रादुर्भाव हुआ तो उनको जीवन जीने के लिए वेदों का सहारा लेना पड़ा | सर्वप्रथम हमारे सप्तऋषियों ने वेद की रचनाओं से मनुष्य के जीवन जीने में सहयोगी नीतियों / रीतियों का प्रतिपादन किया जिन्हें "वेदरीति" का नाम दिया गया | फिर धीरे धीरे धराधाम पर मनुष्य का विस्तार ह



होलिकादहन :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*भारतीय संस्कृति में समय-समय पर त्यौहार एवं पर्वों का आगमन होता रहता है | यह त्यौहार भारतीय संस्कृति की दिव्यता तो दर्शाते ही हैं साथ ही सामाजिकता एवं वैज्ञानिकता को भी अपने आप में समेटे हुए हैं | विभिन्न त्यौहारों में होली का अपना एक अलग एवं महत्त्वपूर्ण स्थान है | होली मनाने के एक दिन पूर्व "होलि



एक तपोवन है गृहस्थी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में मानव जीवन को चार आश्रमों के माध्यम से प्रतिपादित किया गया है | ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ एवं सन्यास | सनातन धर्म में आश्रम व्यवस्था विशेष महत्व रखती है | यही आश्रम व्यवस्था मनुष्य के क्रमिक विकास के चार सोपान हैं , जिनमें धर्म , अर्थ , काम एवं मोक्ष आदि पुरुषार्थ चतुष्टय के समन



आस्तिक व नास्तिक :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि के आदिकाल से इस धरा धाम पर मानव जाति दो खंडों में विभाजित मिलती है | पहला खंड है आस्तिक जो ईश्वर को मानता है और दूसरे खंड को नास्तिक कहा जाता है जो परमसत्ता को मानने से इंकार कर देता है | नास्तिक कौन है ? किसे नास्तिक कहा जा सकता है ? यह प्रश्न बहुत ही जटिल है | क्योंकि आज तक वास्तविक नास्त



नीति व नियम :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से इस धराधाम का पालन राजा - महाराजाओं के द्वारा होता आया है | किसी भी राजा के सफल होने के पीछे मुख्य रहस्य होता था उसकी नीतियाँ | अनेक नीतिज्ञ सलाहकारों से घिरा राजा राजनीति , कूटनीति एवं राष्ट्रनीति पर चर्चा करके ही अपने सारे कार्य सम्पादित किया करता था | कब , किस समय , कौन सा निर्णय लेना ह



भितरघाती :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारा देश भारत सदैव से एक सशक्त राष्ट्र रहा है | हमारा इतिहास बताता है कि हमारे देश भारत में अनेक ऐसे सम्राट हुए हैं जिन्होंने संपूर्ण पृथ्वी पर शासन किया है | पृथ्वी ही नहीं उन्होंने स्वर्ग तक की यात्रा करके वहाँ भी इन्द्रपद को सुशोभित करके शासन किया है | हमारे देश का इतिहास बहुत ही गौरवशाली रहा ह



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