पुरुषत्व

छोटी को दुर्गा मानकर पुजते हो ,बड़ी को रंभा की दृष्टि से देखते हो | समाज मे रहकर ही समाज की ,मर्यादा को लुटते हो | .... अगर भाई पुरुष ही हो ????? तो फिर क्यो पुरुषत्व पर थुकते हो |....



लक्षय :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन बड़ा विचित्र है , संपूर्ण जीवन काल में मनुष्य सफलता एवं असफलता के बीच झूलता रहता है | इस जीवन में सफलता उसे ही प्राप्त होती है जो अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ होता है | अनेक बाधाएं आने पर भी जो अपने लक्ष्य को नहीं भूलता एवं उसके प्रति अपनी दृढ़ता बनाए रहता है वह एक दिन अवश्य सफल होता है |



ये ठहराव जरूरी था - कोरोना काल पर चिंतन

कितने सालों से देख रहे थे , अलसुबह भारी - भरकम बस्ते लादे- टाई- बेल्ट से लैस , चमड़े के भारी जूतों के साथ आकर्षक नीट -क्लीन ड्रेस में सजा -- विद्यालयों की तरफ भागता रुआंसा बचपन --- तो नम्बरों की दौड़ और प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिले की धुन में- आधे सोये- आधे जागते किशोर



कोई नंगा तन न देखा जाएगा(ग़ज़ल)

कोई नंगा तन न देखा जाएगाऔर द्रवित मन न देखा जाएगागूंजती हैं कानो में किलकारियांसूना सा आँगन न देखा जाएगाहोटलों में चाय कॉफी शॉप परचीखता बचपन न देखा जाएगाउम्र से पहले जो बूढ़े हो गएउनसे अब यौवन न देखा जाएगारोज़ दिल की वेदना में डूबतीआँखों का अनशन न देखा जाएगा



गृहस्थाश्रम :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस सृष्टि को चलायमान करने के लिए ब्रह्मा जी ने कई बार नर सृष्टि की परंतु वह तब तक नहीं गतिनान हुई जब तक नारी का सृजन नहीं किया ! नर नारी के जोड़े के सृजन के बाद ही यह सृष्टि विस्तारित हो पाई | मनुष्य के जीवन में पत्नी (नारी) का क्या महत्त्व है यह इसी बात से स्पष्ट हो जाता है कि जब ब्रह्मा जी बिना प



निन्दा को सहजता से स्वीकारें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन विभिन्न विचित्रताओं से भरा हुआ है | पूरे जीवन काल में मनुष्य के साथ उसके मिलने वाले , परिवार वाले या सगे संबंधी अनेक प्रकार के व्यवहार करते हैं | यदि उसकी प्रशंसा होती है एक समय ऐसा भी आता है कि उसके कृत्यों की निंदा भी होती है | ऐसी परिस्थितियां प्राय: सबके सामने आती है परंतु लोग अपनी नि



होली :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*होली का त्यौहार हमारे देश का प्रमुख त्यौहार है | विविधता में एकता का दिव्य संदेश होली के त्यौहार में छुपा हुआ है | जिस प्रकार कई रंग मिलकर एक नया रंग बनाते हैं उसी प्रकार लोग आपसी भेदभाव भुलाकर आपस में मिल जाते हैं | होली का त्यौहार मात्र हमारे देश भारत में ही नहीं आती संपूर्ण विश्व में पूर्ण हर्ष



होलिका दहन :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारा देश भारत पर्व एवं त्योहारों का देश है , यहां वर्षपर्यंत पर्व एवं त्योहार मनाए जाते रहते हैं | सबसे विशेष बात यह हैं कि सनातन धर्म के प्रत्येक त्यौहार एवं पर्वों में मानवता के लिए एक दिव्य संदेश छुपा होता है | इन्हीं त्योहारों में प्रमुख है रंगों का त्योहार होली | होली के दिन अनेक प्रकार के रं



वरिष्ठजनों के जीने की स्थितियाँ बदलने को समर्पित एक सामाजिक उपक्रम

भारत के दो टीयर और तीन टियर शहरों में वरिष्ठ नागरिकों को मेडिकल एवं केयर सेवाओं के लिए एक विश्वसनीय सेवा डीएलएस एल्डर सपोर्ट सर्विसेज के नाम से उपलब्ध है। यह एक सामाजिक उपक्रम है, जो सेवा भाव और जनकल्याण पर आधारित है। यह एक अभियान है, जो प्रत्येक वरिष्ठ नागरिक को चाहे वह



परिवार का निर्माण :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*किसी भी समाज और राष्ट्र का निर्माण मनुष्य के समूह से मिलकर होता है और मनुष्य का निर्माण परिवार में होता है | परिवार समाज की प्रथम इकाई है | जिस प्रकार परिवार का परिवेश होता है मनुष्य उसी प्रकार बन जाता है इसीलिए परिवार निर्माण की दिशा में एक विकासशील व्यक्तित्व का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित होना चा



धर्मपत्नी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि के आदिकाल में ब्रह्मा जी ने मैथुनी सृष्टि करते हुए नर नारी का जोड़ा उत्पन्न किया , जिनके समागम से सन्तानोत्पत्ति हुई और सृष्टि गतिशील हुई | मानव जीवन में सन्तान उत्पन्न करके पितृऋण से उऋण हेने की परम्परा रही है | सन्तान उत्पन्न करने के लिए पुरुष एवं नारी वैवाहिक सम्बन्ध में बंधकर पति - पत्नी



गोत्र :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म इतना दिव्य एवं महान है कि इसकी प्रत्येक मान्यताएं अपने आप में अलौकिक हैं | जिस प्रकार सनातन की प्रत्येक मान्यता समस्त मानव जाति के लिए कल्याणकारी है उसी प्रकार सनातन धर्म में व्यक्ति की पहचान कराने के लिए गोत्र की व्यवस्था बनाई गई थी | सनातन धर्म में गोत्र



परिवर्तन :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परिवर्तन सृष्टि एवं प्रकृति का नियम है | यहां समय के साथ सब कुछ परिवर्तित होता रहता है | जिस प्रकार समय-समय पर ऋतुएं परिवर्तित होकर मनुष्य को जीवन जीने में सहायक होती है उसी प्रकार समय अनुकूल परिवर्तन स्वयं में मनुष्य को भी कर लेना चाहिए | जो समय के अनुसार परिवर्तन नहीं कर पाता है वह अपने जीवन में



नीतेश अजनबी

🚗 दहेज लेना कोई गुनाह नही* 💰आज के वर्तमान सत्र में दहेज लेना कोई गुनाह नहीं क्योंकि कन्या पक्ष के हमेशा यह सोचते हैं कि मेरी बेटी को ससुराल में कोई काम न करना पड़े और मेरी बेटी की शादी ऐसे घर में हो जहां पर नौकर नौकरानी कार्यरत हों और मेरी बेटी बैठकर हुकूमत चलाए अब इस क्रिया में लड़की पक्ष के गरीब



आध्यात्मिक शिक्षा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारा देश भारत आदिकाल से "वसुधैव कुटुम्बकम्" को आधार मानकर "विश्व बन्धुत्व" की भावना का पोषक रहा है | मानव जीवन में भाव एवं भावना का विशेष महत्त्व होता है | मनुष्य में भावों का जन्म उसके पालन - पोषण (परिवेश) एवं शिक्षा के आधार पर होता है | भारतीय शिक्षा पद्धति इतनी दिव्य रही है कि इसी शिक्षा एवं ज्



महिला मताधिकार की जनक : कामिनी रॉय (बांग्ला : য়ামিন রায়)

जी हां, कामिनी रॉय जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए अपना पूरा जीवन ही समर्पित कर दिया था । आज 12 अक्टूबर को उनकी 155वीं जयंती है । कामिनी पहली ऐसी महिला हैं जिन्होंने ब्रिटिश इंडिया में ऑनर्स में ग्रेजुएशन की थी । कामिनी एक एक्टिविष्ट, शिक्षाविद् होने के साथ ही एक



जाने चले जाते हैं कहाँ ......

जाने चले जाते हैं कहाँ ,दुनिया से जाने वाले, जाने चले जाते हैं कहाँ कैसे ढूढ़े कोई उनको ,नहीं क़दमों के निशां अक्सर मैं भी यही सोचती हूँ आखिर दुनिया



स्वतंत्रता एवं मर्यादा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से धरा धाम पर नर और नारी सृष्टि के विकास में कदम से कदम मिलाकर एक साथ चलें | स्त्री एवं पुरुष को समान रूप से अधिकार प्राप्त था | यदि इतिहास का अवलोकन किया जाय तो नारी के ऊपर कभी भी अनावश्यक दबाव या कोई प्रतिबंध लगता हुआ नहीं प्रतीत होता है | प्राचीन समय में नारी का जितना सम्मान हमारे देश भार



प्रेम :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस असार संसार का वर्णन महापुरुषों , लेखकों एवं कवियों ने अपनी दिव्य लेखनी से दिव्यात्मक भाव देकर किया है | इन महान आत्माओं की रचनाओं में भिन्नता एवं विरोधाभास भी देखने को मिलता है | यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो अनेक विरोधों के बाद भी इस असार संसार का सार लगभग सबने एक ही बताया है वह है :- प्रे



मर्यादा :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर मनुष्य का प्रादुरुभाव मैथुनीसृष्टि के द्वारा हुआ | यहाँ आकर मनुष्य विवाह बन्धन में बंधकर सन्तानोत्पत्ति करके अपने पितृऋण से उऋण होता है | सन्तान पुत्र हो चाहे पुत्री दोनों को समान सम्मान मिलता है | यदि हमारे धर्मशास्त्रों में पुत्र की महत्ता को दर्शाते हुए "अपुत्रस्तो गतिर्नास्ति" लिखा



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