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‘‘फेक’’ ‘‘एनकाउंटर’’ को ‘‘वैध‘‘ बनाने के लिए ‘‘कानून‘ क्यों नहीं बना देना जाना चाहिए?

‘‘विकास दुबे एनकाउंटर’’ (मुठभेड़) पूरे देश में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चित है। यह घटना न केवल स्वयं ‘‘सवालों में सवाल’’ लिये हुये है, बल्कि उपरोक्त ‘‘शीर्षक’’ प्रश्न भी पुनः उत्पन्न करता है। लगभग हर ‘एनकाउंटर’ के बाद उस पर हमेशा प्रश्नचिन्ह अवश्य लगते रहे हैं। उक्त ‘प्रश्नचिन्ह’ क



दुनिया रंग रँगीली

नवगीत:संजीव *दुनिया रंग रँगीली बाबा दुनिया रंग रँगीली रे!*धर्म हुआ व्यापार है नेता रँगा सियार है साध्वी करती नौटंकी सेठ बना बटमार है मैया छैल-छबीलीबाबा दागी गंज-पतीली रे!* संसद में तकरार है झूठा हर इकरार है नित बढ़ते अपराध यहाँ पुलिस भ्रष्ट-लाचार हैनैतिकता है ढीली बाबा विधि-माचिस है सीली रे!* टूट रहा





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