सरिता

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लहरों जैसे बह जाना

लहरों जैसे बह जाना✒️मुझको भी सिखला दो सरिता, लहरों जैसे बह जानाबहते - बहते अनुरागरहित, रत्नाकर में रह जाना।बड़े पराये लगते हैंस्पर्श अँधेरी रातों मेंघुटनयुक्त आभासित होलहराती सी बातों मेंजब तरंग की बलखातीशोभित, शील उमंगों कोक्रूर किनारे छूते हैंकोमल, श्वेत तमंगों कोबंद करो अब और दिखावे, तटबंधों का ढह



संस्कृति का सच और अश्लीलता पर हल्ला

(जो देश चांदतारों, मंगल पर पहुंच कर इठला रहे हैं,विज्ञान के नए-नए आविष्कार कर देश के लिए खुशियां समेट रहे हैं,उन की तुलना में हम कहां हैं ? पढ़ कर आप कीआंखें खुली की खुली रह जाएंगी ।)अधिकतरभारतीय जानते ही नहीं कि, संस्कृति है क्या ? जिसे वे अपनी संस्कृति बता रहेहैं, क



कुण्डलिया

कहते सब  सरिता मुझे, बढती हूँ निष्काम जीवन के पथ हैं कठिन, चलते रहना काम चलते रहना काम, नहीं रोके रुक पाती  शत्रु सामने देख, सहज  दुर्गा बन जाती मेरा शील स्वभाव, भाव  हैं  मुझमें बहते   मैं जीवन  का स्रोत, मुझे  सब  सरिता कहते ||





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