साथ



वृद्धाश्रम

वृद्धाश्रम.....पहले तो होते नहीं थे क्यूंकि पहले के वृद्ध खुद को वृद्ध समझते थे। आज के वृद्ध पहले जैसे नहीं रहे।पहले वृद्ध अपने नाती पोतों में व्यस्त होते थे।आज के बुजुर्ग फोन टीवी और लैपटॉप में।बदलाव आया है सबमें पहले के बुजुरगों को बच्चो की हर एक्टिविटी से मतलब होता था आज के बुज़ुर्ग को सिर्फ फोन



कल्पना का धीर, भाग -१

कल्पना को आज भी वह शब्द याद है। "साथी" सच इस शब्द के इर्द गिर्द उसने अपनी जिंदगी को बुनना शुरू कर दिया था। जिंदगी है क्या कभी जाना ही नहीं था। रात के अंधेरे में धीरज का मेसेज का स्करीन पर टू टू की आवाज के साथ आना। आज भी कल्पना की धडकनों में रमा है। शाम 8 बजे के बाद जब भी मेसेज की ट्यूनिंग आती। उसे व



सफल जीवन

हमे अपने जीवन में होने वाली कई घटनाएं बहुत ही अचंभित कर जाती हैं। कुछ तो आनन्द से विभोर कर देती है, ऐसी घटनाओं के बारे में हम तुरंत अपनी प्रभावकारी शख्सीयत या फिर अपनी कुशलता को कारण मान कर खुश हो लेते है या फिर किसी व्यक्ति का आभार मान लेते हैं जिसकी वजह से ये आनन्द अनुभूति होती है।



‘‘आंकड़ों’’ के ‘‘खेल’’ की ‘‘बाजीगरी’’ द्वारा ‘‘कोरोना’’ पर ‘‘राजनीति’’क्यों?

कोरोना वायरस को भारत में आए 4 महीने पूर्ण हो चुके हैं। हमारे देश में प्रथम मरीज 30 जनवरी को केरल के ‘‘त्रिशूर’’ में आया था। ‘‘कोरोना’’ (कोविड़-19) राष्ट्रीय महामारी और आपदा के रूप में, हमारे देश के लिये एक अत्यंत चिंता का विषय था। इसलिए सत्ता और विपक्ष के साथ देश की संपूर्ण जनता 30 जनवरी को एक साथ खड़



गिला नहीं

किल में टंगी गर्दन को भी आजाद होना था। रिस्क लेने, झेलने का दर्द भी बहुत हुआ, अब इसे भी खत्म करना जरूरी था। काम की दुनिया से बंधे थे, जो रिश्ते.. वो भी काम की ही दुनिया में सिमट जाएंगे। बिना हक और जरूरत के रिश्ते कब तक साथ चलेंगे? एक न एक दिन बीतते वक्त की धूल में गुम हो जाएंगे। सब भ्रम के पर्दे एक



मन भ्रम

आंखों से पर्दा और तकदीर के लेख अपने समय पर ही खुलकर सामने आते हैं। बातों के फेर और मन भ्रम के फेर एक न एक दिन टूटते जरूर हैं लेकिन जब भी टूटते हैं, सोचने के लिए सवाल और सीख देकर जाते हैं। मन का भ्रम हो या हो मन प्रेम। मन के रिश्ते हैं। मन को ही समझ आते हैं। दिमाग तो है उलझनों का पिटारा, देखते हैं, क



जीवन: आरंभ या शून्य

ज़िन्दगी मुश्किल कब होती है? क्या तब जब आप जीवन के संघर्षो से लड़ते - लड़ते थक जाते है? या तब जब सारी मुश्किलें जाले की तरह साथ में आपको फांस लेती है?या फिर तब जब जीवन में आपके साथ कोई नहीं होता और आपको अपनी लड़ाई खुद लड़नी होती है? मेरे ख्याल से नहीं; इन सारी दुविधाओं से



नागरिकता संशोधन अधिनियम का विरोध कोरी रजनीति

नागरिकता संशोधन अधिनियम का विरोध कोरी राजनीतिडॉ शोभा भारद्वाज‘अनेक बुद्धिजीवी जिनमें मुस्लिम भी शामिल हैं ’नें मुस्लिन समाज को समझाने की कोशिश की है नागरिकता संशोधन विधेयक का किसी भी भारतीय की नागरिकता से कोई सम्बन्ध नहीं है फिर भी विरोध प्रदर्शन के बहाने तोड़फोड़ हिंसा क्यों ?मुस्लिम समाज कई राजनीतिक



साथी

साथी उसे बनाओं जो सुख दुख में साथ दे.ना कि उसे जो सिर्फ तस्वीरों में आपकी शोभा बढ़ाएं.शिल्पा रोंघे



करवा चौथ के पावन पर्व की शुभकामनाएं

🌹🌷🌹🌷🌹🌷🌹🌷 *जय श्रीमन्नारायण*🌹 *श्री राधे कृपा हि सर्वस्वम* 🌷 🌛🌛🌛🌛🌛🌛🌛🌛 *आद्या शक्ति पराम्बा माँ भगवती की अंशस्वरूपा मातृ शक्तियों को करवा चौथ व्रत की हार्दिक शुभकामनाएँ*🌳☘🦜🌳🌲☘🏵💐 सभी मात्र शक्तियों को आज पावन करवा चौथ व्रत की हार्दिक शुभकामनाओं सहित मंगल कामना हम



पाकिस्तान की विदेश नीति का पराभव जम्मू कश्मीर सहित सम्पूर्ण भारत में एक विधान एक झंडा

पकिस्तानी नीति का पराभव जम्मू कश्मीर सहित सम्पूर्ण भारत में एक विधान एकझंडा | डॉ शोभा भारद्वाज पकिस्तान निर्माण के साथ उनकी विदेश नीति का मूल उद्देश्य भारत विरोध ,आर्थिकदृष्टि से मजबूत पाकिस्तान एवं मुस्लिम वर्ड का लीडर बनना रहा है | लेकिन आजपाकिस्तान आर्थिक दृष्टि से एक कमजोर देश है मुस



बंधे बंधे से साथ चलें

बंधे बंधे से साथ चलें ...मैं अक्षर बन चिर युवा रहूं, मन्त्रों का द्वार बना लो तुम,हम बंधे बंधे से साथ चलें, मुझे भागीदार बना लो तुम.जीवन की सारी उपलब्धि, कैसे रखोगे एकाकी? तुमको संभाल कर मैं रखूँ, मेरे मन में जगह बना लो तुम.कोई मुक्त नहीं है दुनिया में, ईश्वर, भोगी या संन्यासी,प्रिय! कैसे मुक्



मोदी जी की पाकिस्तान के प्रति विदेश नीति में चाणक्य नीति की झलक

मोदी जी की पाकिस्तान के प्रति विदेश नीति में चाणक्य नीति की झलक डॉ शोभा भारद्वाज 2014 में मोदी जी के नेतृत्व लोकसभा का चुनाव लड़ा जा रहा था आलोचक प्रश्न उठारहे थे भाजपा की विदेश नीति क्या है ? सत्तापर आसीन होने के बाद विदेश नीति विशेषज्ञ उनको विदेश नीति समझाने उनसे मिलने भीआये | मोदी जी ने अपने श



कहां जायेंगे

जब लोगों को अपने पन से तकलीफ होने लगें, आपकी बातें उन्हें ताने लगनी लगे, तो कहां जाओगे? उन्हें कब तक अपना समझ, समझाओगे, मनाओगे? जिसके दिल की जगहें संकुचित होने लगे। प्रेम और समझ ,शक में सिमटने, सिकुड़ने लगे। समाज जंजीर बन जकड़ने लगे। आपका विश्वास (साथी)आपसे अकड़ने लगे। तो दूरी के सिवा क्या दवा है।



फिल्म निर्माता सूरज बड़जात्या के पिता राज कुमार बड़जात्या का निधन

मुम्बई में राजश्री प्रोडक्शन के राजकुमार बड़जात्या का देहांत हो गयाअधिक जानकारी के लिए: https://hindi.iwmbuzz.com/television/news/filmmaker-sooraj-barjatyas-father-raj-kumar-barjatya-passes-away-2/2019/02/21



एक नज़र इधर भी

एक नज़र इधर भी आँख से नींद बनी,पेट से खेत बना,बच्चे से प्यार बना। जीवन साथी से जीना। क्या रखा हैं इस धनदौलत मे?ये तो हैं मानव के मन को गुमराह करने का बहाना।पूज लो माँ-बाप को जीससे बनी ये काया।क्यों फिरता हैं जग मे, बंदा तू मारा-मारा?दिल, दिमाग, मन चंचल, इससे सब कोई हारा।



फिट रहने के लिए बच्चों को बनाएं अपना एक्सरसाइज पार्टनर

खुद को चुस्त व तंदरूस्त बनाए रखने के लिए एक्सरसाइज करना बेहद आवश्यक है। व्यायाम सिर्फ वजन कम करने का ही काम नहीं करता, बल्कि इससे शरीर को अन्य कई तरह के लाभ होते हैं। जैसे बाॅडी की स्टेंथ व स्टेमिना बढ़ता है और शरीर के सभी अंग सुचारू रूप से काम करते हैं। आमतौर पर देखने में आता है कि लोग शुरूआत में तो



सफर

आज मन की हलचलों ने कदमों को चलने न दिया।बहुत सोचा जाऊं या ना जाऊ । घर दूर, अपने आंखों से दूर, मौसम भी मगरूर ठंडी का है।सफर सहर में है। शाम की बातों ने मन को बोझिल कर दिया था।सब हलचलों और बोझिल शाम को समेट अपनी चारपाई पर तकिए के नीचे दबा लिया था। ठंडी की सिहरन



"गीतिका" छा रही कितनी बलाएँ क्या बताएँ साथियों द्वंद के बाजार में क्या क्या सुनाएँ साथियों

छन्द- सीता (मापनीयुक्त वर्णिक) वर्णिक मापनी - 2122 2122 2122 212 अथवा लगावली- गालगागा गालगागा गालगागा गालगा पारंपरिक सूत्र - राजभा ताराज मातारा यमाता राजभा (अर्थात र त म य र)"गीतिका" छा रही कैसी बलाएँ क्या बताएँ साथियोंद्वंद के बाजार मे



"गीतिका" साथ मन का मिला दिल रिझाएँ चलो वक्त का वक्त है पल निभाएँ चलो

मापनी--212 212 212 212, समान्त— बसाएँ (आएँ स्वर) पदांत --- चलो "गीतिका" साथ मन का मिला दिल रिझाएँ चलोवक्त का वक्त है पल निभाएँ चलोक्या पता आप को आदमी कब मिलेलो मिला आन दिन खिलखिलाएँ चलो।।जा रहे आज चौकठ औ घर छोड़ क्योंखोल खिड़की परत गुनगुनाएँ चलो।।शख्स वो मुड़ रहा देखता द्वार कोगाँव छूटा कहाँ पुर बसाएँ



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