"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी। अकुलात जिया मन लागत का छड़ राजन काहुँ गए बहरी।

दुर्मिल सवैया ( वर्णिक )शिल्प - आठ सगण, सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा 112 112 112 112 112 112 112 112, दुर्मिल सवैया छंद लघु से शुरू होता है ।छंद मे चारों पंक्तियों में तुकांत होता है"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी।अकुलात



"मदिरा सवैया"

सवैया "मदिरा" मापनी -- 211/211/211/211/211/211/211/2"छंद मदिरा सवैया"नाचत गावत हौ गलियाँ प्रभु गाय चरावत गोकुल में।रास रचावत हौ वन में क्यों धूल उड़ावत गोधुल में।।जन्म लियो वसुदेव घरे मटकी लुढ़कावत हौ तुल में।मोहन मोह मयी मुरली मन की ममता महके मुल में।।-1आपुहिं आपु गयो तुम माधव धाम बसा कर छोड़ गए।का ग



"छंद मदिरा सवैया" वाद हुआ न विवाद हुआ, सखि गाल फुला फिरती अँगना। मादक नैन चुराय रहीं, दिखलावत तैं हँसती कँगना।।

छंद - " मदिरा सवैया " (वर्णिक ) *शिल्प विधान सात भगण+एक गुरु 211 211 211 211 211 211 211 2 भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस भा"छंद मदिरा सवैया" वाद हुआ न विवाद हुआ, सखि गाल फुला फिरती अँगना।मादक नैन चुराय रहीं, दिखलावत तैं हँसती कँगना।।नाचत गावत लाल लली, छुपि पाँव महावर का रँगना।भूलत भान बुझावत हौ



"दुर्मिल सवैया"हिलती डुलती चलती नवका ठहरे विच में डरि जा जियरा।

छंद- दुर्मिल सवैया (वर्णिक ) शिल्प - आठ सगण सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२"दुर्मिल सवैया"हिलती डुलती चलती नवका ठहरे विच में डरि जा जियरा।भरि के असवार खुले रसरी पतवार रखे जल का भँवरा ।।अरमान लिए सिमटी गठरी जब शोर मचा हंवुका उभरा।ततक



“सवैया गीत”

किरीट सवैया " वर्णिक छंद । मापनी -२११ २११ २११ २११ २११ २११ २११ २११ भगण×८ भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस“सवैया गीत”नाहक पीर बढ़ाय गई मुरली नहिं बोलति प्रेम पुकारतघायल की गति घायल जानत पायल बाजत झूमर नाचत। खूब गले मह माल विराजत मोहत हैं लखि बैरन राचतरी सखि मोहन मोह ग



“दुर्मिलसवैया”

छंद दुर्मिल सवैया (वर्णिक ) शिल्प - आठ सगण सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा, ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ माँ शैलपुत्री मंच परिवार को सुख स्वास्थ्य और सम्पदा प्रदान करें, मेरे पूरे परिवार के तरफ से शारदीय नवरात्र के प्रतिपदा पर हार्दिक बधाई, मंगल शुभकमाना, ॐ जय



“दुर्मिलसवैया”

दुर्मिल सवैया (वर्णिक ) शिल्प - आठ सगण, सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा, ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२“दुर्मिलसवैया”हिलती डुलती चलती नवका, ठहरे विच में डरि जा जियरा।भरि के असवार खुले रसरी, पतवार रखे जल का भँवरा ।अरमान लिए सिमटी गठरी, जब शोर मचा हंवुका उभरा।ततका



“सवैया-मुक्तक”

“सवैया-मुक्तक” जग जननी हे माँ जगदंबे, नमन करूँ दर्शन अभिलाषी उन्नति प्रगति विकास विराजे, राक्षस मर्दिनी माँ कैलाशी कृपा करो मो पर महतारी, भव भक्तन दुख हरने वाली शक्ती भक्ती नियती बाढ़े, बाढ़े सुत पुत घर घर काशी॥-1 उत्कर्ष उदय उत्थान करो, माँ मन में मानवता भरदो नयन नयन





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