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सुबह की सैर और तम्बाकू पसंद लोग

गर्मियों में बच्चों की स्कूल की छुट्टियाँ लगते ही सुबह-सुबह की खटरगी कम होती है, तो स्वास्थ्य लाभ के लिए सुबह की सैर करना आनंददायक बन जाता है। यूँ तो गर्मियों की सुबह-सुबह की हवा और उसके कारण आ रही प्यारी-प्यारी नींद के कारण बिस्तर छोड़ने में थोड़ा कष्ट जरूर होता है, लेकिन स्वास्थ्य लाभ के लिए इसका त



एक अधूरी कहानी

https://shabd.in/post/id/ ek-adhuri-kahani



लघुकथा मेरे बचपन के प्रिय मित्रसुबह का राम राम और सझौंती के सलाम

यहाँ कुशल वहाँ जगमाहीं मेरा पत्र मिला की नाहीं। जवाबी पत्र का इंतजार करते-करते आँखें पथरा गई, पोस्ट ऑफिस का डाकियाँ भी बदल गया लगता है। पुछनेपर नाराज हो जाता है, कहता है कि खुद लिखकर लाऊँ क्या? रोज-रोज आकर दरवाजे पर खड़े रहते हो, पत्र आया क्या? पत्र आया क्या?। यहाँ मनीआर्ड



“गीतिका”हर मौसम के सुबह शाम से इक मुलाक़ात रही है

समांत- अही पदांत- है मात्रा भार-२९ १६ १३ पर यति “गीतिका”हर मौसम के सुबह शाम से इक मुलाक़ात रही है सूरज अपनी चाल चले तो दिन और रात सही है भोर कभी जल्दी आ जाती तब शाम शहर सजाती रात कभी दिल दुखा बहकती वक्त की बात यही है॥हरियाली हर ऋतु को भाती जब पथ पुष्प मुसुकाते गुंजन करते



“झरोखे से झाँकती सुबह”

“झरोखे से झाँकती सुबह”अमूमन हर रात को आने का अंदेशा पूर्ववत होता ही है शायद इस रात को भी खबर है कि आज नहीं तो कल मैं भी जरूर आऊँगी पर जब आई तो भावनाओं को झंझोड़कर एक नई सुबह कर गई और याद आने लगे वे दिन जो कभी रात को रात होने ही नहीं देते थे। कितना प्रकाश था उस विशाल मन में



चलो अब चाँद से मिलने ....

चलो अब चाँद से मिलनेछत पर चाँदनी शरमा रही है ख़्वाबों के सुंदर नगर में रात पूनम की बारात यादों की ला रही है। चाँद की ज़ेबाई सुकूं-ए-दिल लाई रंग-रूप बदलकर आ गयी बैरन तन्हाई रूठने-मनाने पलकों की गली से एक शोख़



नमस्कार

नमस्कार 



श्री गणेशाय नमः (कहानी शुरू होती है.......)

अनगिनत ख्वाबों को दिल में संजोये जब वो अपने शहर से निकला था, तो उसकी आँखों में झिलमिल से सपने थे । वाबस्ता थीं उसकी हर सांसें उच्चश्रृंखल से श्वास के । दूर शहर में उसको फिर से अपने घर का शहर सजाना था । पर जिस शहर में पढ़कर कभी पलट कर न आने के बारे में सोचा था, आज फिर उसी शहर ने ही उसको दस वर्षों तक अ



सुबह की धूप

प्रेम करने के लिए गढ़ने को अपने ही वायदे और पैमाने ताकि बिना किसी के सपनों को लांघे अपने सपनों को सजाने की जगह मिल जाए । -डॉ. वीणा सिन्हा (एम्.डी.)ई-१०४/५, शिवाजी नगर, भोपाल ।



दिख रहीं किरणें सुबह की।

इस संसार में वर्तमान के निराशा के क्षण में आशा का दीपक ही सुबह की किरणें है।



बसंत

सुबह उठा तो देखा  कि बात आज क्या है ? पत्ते खनक  रहे हैं, चिड़िया चहक रहे है । सूरज की तेज से मैं पूछा कि राज क्या है ? भोर के महक का एहसास आज क्या है। अमराईयों के झुरमुट कोई बुला रहा है   बहक गया है कोयल और गीत गा रहा है  सरसों के फूल से मैं पूछा कि राज क्या है? संगीत की समां का अहसास आज क्या है । 





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