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‘‘पर्रिकर’’ ‘‘वाद’’ को ढूँढता मेरा देश। ‘व’’ ‘‘गांधीवाद’’ से चलकर ‘‘पर्रिकरवाद’’ तक पहुंचने का सुखद अहसास!

देश के प्रथम आई.आईटी शिक्षा प्राप्त (गोवा के) मुख्यमंत्री एवं पूर्व रक्षामंत्री डॉ. मनोहर गोपाल कृष्ण प्रभु पर्रिकर लम्बी बीमारी से अदम्य आत्मबल के साथ लड़ते हुये अब इस दुनिया में नहीं रहे और ‘‘स्वर्गवासी’’ हो गये। याद कीजिये! विधानसभा में बजट प्रस्तुत करते समय उनका वह चेहरा, जो चिकित्सकीय उप



'भव-सागर'

भव सागर, यह संसार है जीवन, सागर मझधार हैघोर, गहन विपदा है घेरेजीवन में है, तेेरे और मेरे झंझावत ढेरों पारावार हैलहरों से उठती, हुँकार है आशा और निराशा इसमेंजीवन की दो पतवार है निराशा से होता कहाँ ?जन-जीवन का उद्धार हैआशा से ही लगती यहाँनौका तूफानों से पार हैभव-स



“गीतिका” खेल खिलौना सुखद बिछौना नींद नहीं अधिकार की॥

“गीतिका”जाने कब धन भूख मरेगी, दौलत के संसार की शिक्षा भिक्षा दोनों पलते, अंतरमन व्यवहार कीइच्छा किसके बस में होती, क्यों बचपन बीमार है उम्र एक सी फर्क अनेका, क्या मरजी करतार की॥ भाग सरीखा नहीं सभी का, पर शैशव अंजान है खेल खिलौना सुखद बिछौना, नींद नहीं अधिकार की॥ उछल कूदना



कहाँ सुखद विश्राम मिला, मन नेह लगा ली है, गीतिका

“गीतिका”खुलकर नाचो गाओ सइयाँ, मिली खुशाली है अपने मन की तान लगाओ, खिली दिवाली है दीपक दीपक प्यार जताना, लौ बुझे न बातीचाहत का परिवार पुराना, खुली पवाली है॥कहीं कहीं बरसात हो रही, सकरे आँगन मेंहँसकर मिलना जुलना जीवन, कहाँ दलाली है॥होना नहीं निराश आस से, सुंदर अपना घर नीम छ





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