टीआरपी

टीआरपी के लिए खुद सुधर जायेगे चैनल्स

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर गौरवशाली भारतीय संस्कृति को बिगाडऩे का आरोप लगता आया है, जबकि यह सच नहीं है, संस्कृति बिगाडऩे के लिए मीडिया से ज्यादा आम जनता दोषी है. याद कीजिए कभी दूरदर्शन ने अपनी संस्कृति के अनुरूप रामायाण, महाभारत, सामाजिक व्यथा को दर्शाते हमलोग, बुनियाद धाराावाहिक शुरू किए थे. रामायाण के



भाव देने की जरूरत ही क्या है?

किसी भी बात को तभी भाव मिलता है जब उसे भाव देने वाले देते हैं. भाव नकारात्मक हो या सकारात्मक, दोनों ही स्थितियों में भाव खाने वाला अगर भाव नहीं खाएगा तो क्या करें. ऐसी स्थिति में अच्छा यह है कि भाव दिया ही न जाए. मतलब पूर्ण बहिष्कार. भला जिंदगी भी किसी के रुके से रुकी है क्या. जिंदगी को जहां तक बहना





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