विकृति

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"शून्य" 'आत्म विचारों का दैनिक संग्रह' "क्रोध"

"क्रोध" "हमारे शरीर में उत्पन्न क्षणिक विकृति मात्र है, जो आवेग के रूप में प्रस्फुटित होती है, दिशाविहीन होना इसका विशिष्ट लक्षण है जो हमारे मस्तिष्क को क्षणभर के लिए शक्तिहीन बना देती है" "एकलव्य"



कविता

बदल रहा है रूप प्रकृति का बदल रहा पैगाम. खून के प्यासे घूम रहे शठ धरती के आवाम. -----------टुकड़ों में बँट जगह-जगह पर लोग लगाते नारा. -----------अगुवा उसी को चुनते सब जो होता ठग हत्यारा. किसी को कुछ भी कहते निर्भय मुँह में नहीं लगाम. बदल रहा है रूप प्रकृति का बदल रहा प





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