विमर्श

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Kranti Ki Mashal Kavy sangrah by kavi Hansraj Bhartiya क्रान्ति की मशाल साझा कविता संग्रह की पुस्तक समीक्षा

क्रान्ति की मशाल : क्रांतिकारी परिवर्तन की अभिव्यक्तिहंसराज भारतीय हिन्दी साहित्य में एक उभरता हुआ नाम है। उनकी रचनाये निरन्तर अनेको पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। जिनमे कुछ पत्रिकाओं के नाम इस प्रकार है - अमृत पथ, डिप्रेस्ड एक्सप्रेस, राजधर्म, समय के



#MeeToo मी टू सैलाब ( वर्ण पिरामिड )

येमी टू ले आया रज़ामंदी दोगलापन बीमार ज़ेहन मंज़र-ए-आम पे !वो मर्द मासूम कैसे होगा छीनता हक़ कुचलता रूह दफ़्नकर ज़मीर !क्यों इश्क़ रोमांस बदनाम मी टू सैलाब लाया है लगाम ज़बरदस्ती को "न"न मानो सामान औरत को रूह से रूह करो महसूस है ज़ाती दिलचस्पी। है चढ़ी सभ्यता दो सीढ़ियाँ दिल ह



हाई डिमांड "बहू-बेटी जैसी"????

आकांक्षा श्रीवास्तव। .....?????"बहू बेटी जैसी चाहिए???? क्या हुआ आप भी भौचक्के रह गए न ,भइया आजकल अलग अलग तरह कि डिमांड शुरू हो गयी है। यह सुनते मेरे मन मे भी लाखों प्रश्न उमड़ते बादलों की तरह गरजने लगे कि ये कैसी डिमांड??? बहू- बेटी जैसी.???आख़िर एक स्त्री पर इतना बड़ा प्रहार क्यों???? आख़िर एक बहू को



चरखा चलाती माँ



चरखा चलाती माँ

आकांक्षा श्रीवास्तव। धागा बुनाती माँ...,बुनाती है सपनो की केसरी , समझ न पाओ मैं किसको बताऊ मैं"...बन्द कोठरी से अचानक सिसकने की दबी मध्म आवाज बाहर आने लगती हैं। कुछ छण बाद एक बार फिर मध्म आवाज बुदबुदाते हुए निकलती है..,"बेटो को देती है महल अटरिया ,बेटी को देती परदेश र



औरत होने की कैसी सजा रे ?

धुँधला धुँधला है सारा जहां रे , औरत होने की कैसी सजा रे ? दिल के सब अरमां धूं -धूं कर जलते , घूँघट के भीतर कितना धुँआ रे ! .................................. कैसी ले किस्मत दुनिया में आती , खिलने से पहले ही ये है मुरझाती , ये तो हंसकर है सब कुछ सह जाती , अपने आंसू भी खुद ही पी जाती , इसको लगी किसकी





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