जूतों के अच्छे दिन



साहित्य का महाकुम्भ इस साल और भी बड़ा, और भी भव्य

'साहित्य आज तक' फिर लौट आया है. इसके साथ ही नवंबर के मध्य में राजधानी में फिर से सज रहा है साहित्य के सितारों का महाकुंभ. तीन दिनों के इस जलसे में हर दिन साहित्य और कलाप्रेमी देख और सुन सकेंगे शब्द, कला, कविता, संगीत, नाटक, सियासत और संस्कृति से जुड़ी उन हस्तियों को, जिन्ह



संसद के गलियारे में

✒️दान-धर्म की महिमा क्या तुम, समझ गये हो दानवीर?अगर नहीं तो आ जाओ अब, संसद के गलियारों में।रणक्षेत्रों की बात पुरानीभीष्म, द्रोण युग बीत गए हैं,रावण, राम संग लक्ष्मण भीपग-पग धरती जीत गये हैं,कलि मानस की बात सुनी क्या, कौन्तेय हे वीर कर्ण?अगर नहीं तो आ जाओ अब, संसद के गलियारों में।रथी बड़े थे, तुम द्व



गुमनाम लेखक का आक्रोश

व्यंग्य गुमनाम लेखक का आक्रोश नफे सिंह कादयान, हमारे मोहल्ले का फेस-बुकिया गुमनाम लेखक चाँद तूफानी आक्रोशित है, गहरे सदमें में है। वह आजकल गहरी सोच में बड़बड़ाता हुआ हर समय चहल-कदमी सी करता रहता है। घूंसा बना कर उसके हाथ इधर-उधर झटकने का अंदाज ऐसा होता है जैसे किसी को जान से मारना चाहता हो। उसे लगत



अपनी अपनी सुरंगों में कैद

व्यंग्य अपनी अपनी सुरंगों में कैद विवेक रंजन श्रीवास्तव थाईलैंड में थाम लुआंग गुफा की सुरंगों में फंसे बच्चे और उनका कोच सकुशल निकाल लिये गये. सारी दुनिया ने राहत की सांस ली .हम एक बार फिर अपनी विरासत पर गर्व कर सकते हैं क्योकि थाइलैंड ने विपदा की इस घड़ी में न केवल भ



दूसरों की कमाई , हमें क्यों बताते हो भाई ....!!

उस विवादास्पद अभिनेता पर बनी फिल्म की चर्चा चैनलों पर शुरू होते हीमुझे अंदाजा हो गया कि अगले दो एक - महीने हमें किसी न किसी बहाने से इसफिल्म और इससे जुड़े लोगों की घुट्टी लगातार पिलाई जाती रहेगी। हुआ भीकाफी कुछ वैसा ही। कभी खांसी के सिरप तो कभी किसी दूसरी चीज के प्रचार केसाथ फिल्म का प्रचार भी किया



सिपाही साहिबा

#slapfestआज न्यूज़ देखते समय नज़र टिकी एक न्यूज पर।बहुत ही खास थी।पढ़ा तो पता चला धौंस दिखाने के चक्कर में एक नेत्री को एक सिपाही साहिबा ने दिन में तारों की सैर करवा दी।अच्छा लगा पढ़कर और सिपाही साहिबा की भी तारीफ करने को जी चाहा -नेत्री जी अड़ गईंएक तमाचा तपाक जड़ गईंसोचा सिया



नौकरी...

उन्होंने ताकीद की,बड़े गुस्से में कहा,देखो, इतना समझो,जो मुझे चाहिए,आदमी सौ टका हो,ठोका-बजाया हो,सिखाना न पड़े,आये और चल पड़े,काम बस काम करे...समय की न सोचे,घर को भूल आये,मल्टीटास्कर तो हो ही,ओवरवर्क को सलाम करे,प्रेशर हैंडल कर सके,पीपुल-फ्रेंडली तो हो ही,डेडलाईन की समझ



जानलेवा अंध भक्तों का खतरा

आज अंध भक्त युग चल रहा है। श्रद्धा, विश्वास और आस्था का मर्दन हो चुका है। भक्त के स्थान पर अंध भक्त काबिज हो गये है। इन अंध भक्तों के सिर पर मौत का जुनून संवार है। यह किसी भी हद तक जा सकते है। कुछ भी कर सकते है। ऐसी दीवानगी आजतक इससे पहले कभी भी नही देखी गयी। अक्ल के अंधे और दिमाग से पैदल इन अंध भक्



दोनों ही पेशेवर हैं...

जो हो, उसे न देख पाना,जो न हो, उसे देख पाना,दोनों ही मर्ज हैं मिजाज के,दोनों ही पहलू हैं यथार्थ के,एक को मूर्खता समझते हैं,दूजे को गर्व से विद्वता कहते हैं,नफा-नुकसान दोनों में बराबर है,नाजो-अंदाज में दोनों ही पेशेवर हैं,जरूरत दोनों की ही है समाज को,नशा अजीज है दोनों ही मिजाज कोदोनों जो एक-दूजे से उ



आयशा को डर नहीं लगता -----? अरविंद पथिक

हम जहाँ रहते हैं वह 288 फ्लैट वाली छोटी सी कालोनी है जिसके सेक्रेटरी रहने का फख्र हमे भी हासिल है .हमारी कालोनी यही कोई 17-18 पहले बसी थी .यहाँ रहने वाले ज्यादातर लोग नौकरी पेशा और छोटे मोटे बिजनेस करने वाले अपनी दुनिया में व्यस्त और



रायता प्रसाद

रायता प्रसाद का असली नाम तो मंच के हास्य-व्यंग्य कवियों के असली नाम की तरह ही विस्मृत हो चुका था ,पर रायता फ़ैलाने की अपनी अकूत क्षमता के कारण वे साहित्य जगत में रायता प्रसाद के नाम से ख्याति प्राप्त कर चुके थे . रायता प्रसाद को गोस्वामी तुलसीदास जी तरह ही लोक मानस की गहरी समझ थी .वे जानते थे कि



प्रेम और साहित्य का फेसबुक काल

हिंदी साहित्य में नायिका का बड़ा महत्व है .श्रंगार को रस राज कहा गया है . श्रंगार का उद्दीपन और आलम्बन सभी कुछ तो नायिका है .रीतिकालीन साहित्य से निकल कर ,छायावाद और आधुनिक काल से होती हुयी नायिका अब साहित्य के फेसबुक काल में प्रवेश कर चुकी है .पुराने ज़माने में य



शादी का कार्ड

विनयभारत का हास्य व्यंग्य : मेरी शादी का कार्ड बुलाता हूँ मैं उन गणपति जी को, जो करते हैं सभी का कल्‍याण! आयें गणपति हमारी इस शादी में, सभी देवों के साथ! सभी को दर्शन दे जायें गणपति, आकर के इस बार! हमारी शादी का तो हो जाये बह



खुला ख़त, आपकी (ज़ीरो बटे सन्नाटा) इण्टरनेट स्पीड के नाम

नमस्कार!!! खुला ख़तपिछले कुछ समय से ट्रेंड पर चल रहा है। मुख्यतः ये ख़त किसी (गैर) ज़िम्मेदार संस्थाको उससे त्रस्त एक अस्तित्त्वहीन(मान लो) मानुस के बीच संवाद स्थापित करने का साधनहोता है, जिसको (गैर) ज़िम्मेदार संस्था को छोड़कर बाकी सब पढ़ लेते हैं। आज अपनी ज़िन्दगीसे त्रस्त होकर मैंने भी एक ख



हत्या मेरी कार की (व्यंग्य)

हत्या मेरी कार की कमलानाथ कई दशक पहले जब मैंपहली बार अमरीका गया तो विश्वविद्यालय की तरफ़ से वहाँ का एक रिसर्च स्नातक मुझेएयरपोर्ट पर लेने आया। उसके हाथ में मेरे नाम की एक पट



नेताओ की बद से बदतर होती जुबान ...

चुनाव के मोसम हो या नेताओ की सभा या संसद या विधान सभा लगता नहीं, कि हमें बोलने की कुछ ज्यादा ही आजादी मिल गयी है। ख़ासकर इस चुनावी माहौल में तो हर हद पार कर दी गयी है। हर मर्यादा तोड़ दी गयी है। नहीं किसी की उम्र का लिहाज बचा है नाहीं किसी प



भैंस-चक्र ( व्यंग्य )

भैंस-चक्रकमलानाथ राज्य में कल अचानक आपातकालीन स्थिति उत्पन्न होगई। वहाँ अनौपचारिक राजकीय शोक मन रहा था। अनौपचारिक इसलिए, क्योंकि इसकी औपचारिक घोषणा सरकारी राजपत्र में नहीं हुई थी, हालाँकि राष्ट्रीय दुर्घटना बन गई इस की अखबारी ख़बर से सा



बातें कुछ अनकही सी...........: रेलवे टिकट

बीते दिन थे कईजब से होकर आया मैं घर छुट्टी हुई थी कॉलेज मेंमैं भागे-भागे पहुँचा रेलवे टिकट-घर भीड़ बरी थी टिकेट-घर में आठ में से खिड़कियाँ खुली थी केवल छह पीछे मुड़ा था मैं क्यूँकि वहाँ लिखा था भारत माता की जय ट्रेन एक घंटे में थी लाइनें लम



गरीबी

गरीबी इस कदर मेरे देश मे है यारों,कि जिन्दगी मोहताज़ है दो वक्त की रोटी के लिए...



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