व्ययंग

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जात आदमी के

आसाँ नहीं समझना हर बात आदमी के,कि हँसने पे हो जाते वारदात आदमी के।सीने में जल रहे है अगन दफ़न दफ़न से ,बुझे हैं ना कफ़न से अलात आदमी के?ईमां नहीं है जग पे ना खुद पे है भरोसा,रुके कहाँ रुके हैं सवालात आदमी के?दिन में हैं बेचैनी और रातों को उलझन,संभले नहीं संभलते हयात आदमी के।दो गज



वकील

जो कर न सके कोई वो काम कर जाएगा,ये वकील दुनिया में नाम कर जाएगा।फेकेगा दाना , फैलाएगा जाल,सोचे कि करे कैसे मुर्गे हलाल।आये समझ में ना , शकुनी को जो भी,चाल शतरंजी तमाम चल जायेगा .ये वकील दुनिया में नाम कर जायेगा।चक्कर कटवाएगा धंधे के नाम पे,सालो लगवाएगा महीनों के काम पे।ना



प्रतिभाशाली गधे

आज दिल्ली में गर्मी आपने उफान पे थी। अपनी गाड़ी की सर्विस कराने के लिए मै ओखला सर्विस सेंटर गया था। गाड़ी छोड़ने के बाद वहां से लौटने के लिए ऑटो रिक्शा ढूंढने लगा। थोड़ी ही देर में एक ऑटो रिक्शा वाला मिल गया। मैंने उसे बदरपुर चलने को कहा। उसने कहा ठीक है साब कितना दे दो



कुत्ते और इन्सान: अजय अमिताभ सुमन

मैंने ये कविता आदमी और कुत्तों के व्यवहार को ध्यान में रखते हुए लिखी है. मैंने देखा कि ईश्वर कुत्ते को स्वतन्त्र निर्णय लेने की शक्ति से वंचित रखा हुआ है. जबकि आदमी के पास स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता ह





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