प्रश्नों पर प्रतिक्रिया दीजिये

मैं ग्रुप या पेज कैसे बनाऊं.

मैंने एक पेज होम कम्पोस्टिंग के नाम से बनाया था. मैं उस पेज को वापस ढूंड ही नहीं पा रहा हूँ. मुझे यह ग्रुप बनाना है. कृपया मार्गदर्शन दें.

सादर व सधन्यवाद

वीरेन्द्र गुप्ता

मित्र बनाने के बारे में जानना चाहते हैं ?

आकाश गुप्ता

सत्य, साथ और विश्वास किसी को भी मित्र बनाने के किये आवश्यक कारक है। लेकिन मित्र बनाने में अक्सर ये प्रयास एक तरफा होते हैं। मेरे हिसाब से नाउम्मीदी इन सभी कारको में सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए। क्योंकि दोस्ती में उम्मीद और शर्ते नहीं होती। 

6:30 बज गए वो आते ही होंगे मैंने बाल ठीक किए कमर से लिपटा साडी का पल्लू खोल दिया डोरबेल बजी वो आ गए उनकी आँखों में खुद को देखना चाहती हूँ उनके होंठों पर हंमेशा मैं गुनगुनाती हूँ..! उनके दहलीज़ पर कदम रखते ही मेरा दरवाज़ा खोलना मैं देखना चाहती हूँ मेरे सत्कार से उनकी मौजूदगी से बिखेरते हुए घर में पति के स्वाभिमान को..! उनका हाय मैडम कैसी है इस घर की रानी कहकर सोफे पर पसर जाना मेरे हाथ से चाय का प्याला टेबल पर रख कर मेरी आँखों में डूब जाना उफ्फ़..! घड़ी में देखकर मेरा मुँह फुलाकर कहना पूरे दस मिनट लेट हो जनाब उन पर आधिपत्य जताकर देखना चाहती हूँ उनकी अठखेलियां मुझे अपने करीब खींचकर आँखों में आँखें डालकर सौरी बोलना..! खाने के टेबल पर अपने हाथों से पहला कौर मुझे खिलाना उनकी इस परवाह पे मेरा इतराना खाने के बाद उनका मेरे हाथों को चूमना..! शयनकक्ष में गर्माते बिस्तर पर मेरी चूड़ीयों से खेलना मेरी पलकों पर उनके लबों की सरगोशियों के जवाब में मेरा उन पर बरसना..! रात के रतजगे का कहर ढ़ोती सुबह उनकी बोझिल पलकों पर मेरे सुगंधित गीले बालों से मेरा खेलना ओर कमर से मुझे अपनी ओर खिंचना मेरे दिन की हसीन शुरुआत है..! उनके आफिस जाते वक्त कोट के बटन अपने हाथों से बंद कर के मेरा बोलना तुम मेरे हो इस दायरे से न तुम बाहर निकलना न किसीको अंदर आने की इजाज़त देना..! उनके आसपास मेरे जीवन की नैया चले कमर में पल्लू लपेटती पति के इशारों पर थिरकती मैं बस एक उनके दिल तक पहुँचने का रास्ता जानूँ..! क्या कुछ ज्यादा सोच लिया मैंने होता होगा ना एक संसार एसा भी, साथ जीने की कसमे खाने वाले दो लोगों का..! ये मेरी कल्पना में बसा संसार है मेरी भावनाओं से अंजान वो अपने आप में मशगूल एक सुस्त आम सी ज़िंदगी ढो रहे है, उनकी नज़रों में मैं घर के अन्य सामान बराबर हूँ.! कट ही रही है ज़िंदगी वो अपने जहाँ में खुश है, मैं मेरे सपनो के जहाँ में, एसी भी तो ज़िंदगी होती होगी।। भावु।

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#चाँदी सी धवल सुबह में अभिराज सा कोई आकर बंद पलकों पर सुगंधित लबों से शृंगार कर गया वो विरक्त सी मेरी मुस्कान में #रंग हज़ार भर गया वो मधुमास की पहली बेला में विरह की पीर हर गया वो आँसू के सागर भरती आँखों में #प्रेमिल पुष्प भर गया वो अमर प्रतिक्षित अंतहीन नभ में चिर मिलन की सरिता दे गया वो द्रुत पंख वाले मन में #उड़ान की परवाज़ भर गया वो पीड़ा की मधुर कसक में शीत परत संदली गूँथ गया वो प्रतिपल की झंखना को #युगों का आलिंगन दे गया वो मुझ जीवन विधुर निशा सा कुंकुम सा भर गया वो अतृप्त उर धरा की #तृष्णा मिटा गया वो भावु।।

#तन की हकीकत नापी है तूने मेरी शब भर, मन तक पहुँच पाते तो क्या बात थी..! #तन की आबरू की बिसात अनमोल मेरी #बस तन से इश्क जोड़ा तूने मन की खिड़की से झाँकते..! #मन मंदिर सा पाक ना #दहलीज़ लाँघी तूने जिस्म का जश्न मनाते रहे..! #भय मुक्त से तुम मुझमें रहते हो लहू की रवानी में फिर भी मेरी रूह #तक का तुम्हारा #सफ़र फासलो में रहा..! #तन की पूजा से परे मेरी #ओर एक नज़र भर देखना #तुम्हारे लिए बहुत दूर की बात है ना ? #तन पिपासा त्यज कर कभी मन में #बसकर देखो जिस मंदिर #के आराध्य तुम हो मुझे #नतमस्तक सी #पूर्णतः समर्पित पाओगे..! #भोग मुक्त इश्क की परिभाषा... स्पर्श से परे स्पंदनों में #सिमटकर तुम्हारी #आगोश में भी रहूँ मैं अनछुई... भावु।

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#तन की हकीकत नापी है तूने मेरी शब भर, मन तक पहुँच पाते तो क्या बात थी..! #तन की आबरू की बिसात अनमोल मेरी #बस तन से इश्क जोड़ा तूने मन की खिड़की से झाँकते..! #मन मंदिर सा पाक ना #दहलीज़ लाँघी तूने जिस्म का जश्न मनाते रहे..! #भय मुक्त से तुम मुझमें रहते हो लहू की रवानी में फिर भी मेरी रूह #तक का तुम्हारा #सफ़र फासलो में रहा..! #तन की पूजा से परे मेरी #ओर एक नज़र भर देखना #तुम्हारे लिए बहुत दूर की बात है ना ? #तन पिपासा त्यज कर कभी मन में #बसकर देखो जिस मंदिर #के आराध्य तुम हो मुझे #नतमस्तक सी #पूर्णतः समर्पित पाओगे..! #भोग मुक्त इश्क की परिभाषा... स्पर्श से परे स्पंदनों में #सिमटकर तुम्हारी #आगोश में भी रहूँ मैं अनछुई... भावु।

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#तन की हकीकत नापी है तूने मेरी शब भर, मन तक पहुँच पाते तो क्या बात थी..! #तन की आबरू की बिसात अनमोल मेरी #बस तन से इश्क जोड़ा तूने मन की खिड़की से झाँकते..! #मन मंदिर सा पाक ना #दहलीज़ लाँघी तूने जिस्म का जश्न मनाते रहे..! #भय मुक्त से तुम मुझमें रहते हो लहू की रवानी में फिर भी मेरी रूह #तक का तुम्हारा #सफ़र फासलो में रहा..! #तन की पूजा से परे मेरी #ओर एक नज़र भर देखना #तुम्हारे लिए बहुत दूर की बात है ना ? #तन पिपासा त्यज कर कभी मन में #बसकर देखो जिस मंदिर #के आराध्य तुम हो मुझे #नतमस्तक सी #पूर्णतः समर्पित पाओगे..! #भोग मुक्त इश्क की परिभाषा... स्पर्श से परे स्पंदनों में #सिमटकर तुम्हारी #आगोश में भी रहूँ मैं अनछुई... भावु।

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शब्द नगरी संगठन

महोदय , कल मैंने बहुत प्रयास किया लेकिन मेरे पेज `` अंतर् ध्वनि ~ अपना पेज ग्रुप चुनिए के अंतर्गत नहीं आया फिर मैंने रचना सावजनिक पेज पर ही दाल दी | कृपया इस असुविधा को क्या दूर करने का प्रयास करेंगे ?

एक वृद्ध की अंतर -व्यथा ! मेरी चिंता, मेरा मरना नहीं, मेरे बाद, तुम्हारा जीना है, संबंध न होगा बाकी कोई बच्चों ने भी इसको छीना है । बदले मौसम, बदली धारा, बदले जीवन के दर्शन भी, दे दे के थपेड़े बदल दिया इस कालचक्र ने यह तन भी। बदलीं परिपाटी और रिवाज़, बदले हैंं लोग अब चिंतन से, जो कभी रहे प्रांगण-तुलसी वे आज प्रताड़ित यौवन से। सलवटें लिए पैरों पर तुम खुरदुरी धरातल पर कैसे बोलो,चल पाओगे साथी! काग़ज़ हो बवंडर मे जैसे ? जितनी मिलती, उतनी रखना साँसों को, विकलित मत करना, मुझे, सूर्य - रश्मि मे पाओगे अभिसार श्वास देकर करना। तुम नेत्र निमीलित कर लेना और छूना मुझको आसपास मै तब तक मोक्ष नहीं लूँगा जब तक ना हो तुम संग प्रवास । - प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

ॐ मनुष्य परस्थितियों का नहीं स्वयं अपनी मनोदशा का गुलाम होता है......विश्व विख्यात आत्मगुरु डॉ रमन जी

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