गज़ल

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“गीतिका/ गज़ल”

“गीतिका/ गज़ल”बैठिए सर बैठिए अब गुनगुनाना सीख ले हो सके तो एक सुर में स्वर मिलाना सीख ले कह रही बिखरी पराली हो सके तो मत जला मैं भली खलिहान में छप्पर बनाना सीख ले.. मानती हूँ बैल भी अब हो गए मुझसे बुरे चर रहें हैं खेत बछड़े हल चलाना सीख ले॥खाद देशी खो गई फसलों में फैली यूरि



गज़ल , वक्त को भी मुस्कुराना चाहिए।।

बेरुखी को भी निभाना चाहिएहो सके तो पास जाना चाहिएक्या पता वो बिन पढ़ी किताब होखर खबर उनको सुनाना चाहिए।।बाँचकर मजमून अपने आप सेबेवजह नहिं खौफ खाना चाहिए।।पूछ लो शायद वे अति अंजान होंहर शहर को घूम आना चाहिए।।यदि दिखे हँसती अमीरी दूर सेवक्त को भी मुस्कुराना चाहिए।।लोग हैं की भाप लेते दिल जिगरकोहिनूर मि



मगर तकसीम हिंदुस्तान होगा ...

जहाँ बिकता हुआ ईमान होगाबगल में ही खड़ा इंसान होगाहमें मतलब है अपने आप से हीजो होगा गैर का नुक्सान होगादरिंदों की अगर सत्ता रहेगीशहर होगा मगर शमशान होगादबी सी सुगबुगाहट हो रही हैदीवारों में किसी का कान होगाबड़ों के पाँव छूता है अभी तकमेरी तहजीब की पहचान होगालड़ाई नाम पे



गज़ल (तुमने उस तरीके से संभारा भी नहीं होगा)

 मैं , लेखनी और ज़िन्दगी : गज़ल (तुमने उस तरीके से संभारा भी नहीं होगा)





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