व्यंग

1


रामरहीम दास

गुस्सा तो समझे ,था किसबात पे ?नाराज तो समझे ,थे किनसे ?ये आगजनी और हिंसा,किन लोगों पर ?कुछ नहीं सूझ रहा था। तो अपने सर फोड़ लेते। गुलाम, मालिक के वास्ते ,इतना तो कर सकते थे । -र र



राष्ट्र की खातिर- शिशिर मधुकर

एक मेरे मित्र हैं जो मुझसे बहुत नाराज़ हैंउनको पसंद आते ना मेरे मलमली अल्फ़ाज़ हैंराष्ट्र की खातिर वो कहते हैं की मैं रचना लिखूंएक भारत माँ के ही चरणों में नित नित झुकूंढूंढ़ता हूँ जब मगर मैं राष्ट्र जैसी चीज़ कोदेखता हूँ वृक्ष बनता चहुँ और बस विष बीज कोवोट की खातिर जहाँ अपमान मेघा का हुआना किसी नेता की



फसाद

जरा देखो कहीं कोई फसाद,हुआ हो तो वहाँ जाया जाये । नहीं हुआ हो तो जाकर कराया जाये । राजनीति में निठल्लापन ठीक नहीं । कहीं आग लगा के बुझाया जाये ।



बस एक दाल रोटी का सवाल है

बच्चे से मैं प्रौढ़ हो गया जाना जीवन जंजाल हैइंसानी फितरत में देखा बस एक दाल रोटी का सवाल है कोई भी चैनल खोलो तो बेमतलब के सुर ताल हैंपत्रकारों की भीड़ का भी बस एक दाल रोटी का सवाल है नेता नित देश की सेवा करते देश मगर बदहाल हैइसमें में भी तो आखिर उनकी बस एक दाल रोटी का



21 सितम्बर 2015

काका हाथरसी के हास्य दोहे!

हिंदी के प्रसिद्ध व्यंगकार एवं हास्य कवि, "काका हाथरसी" के दोहे:अक्लमंद से कह रहे, मिस्टर मूर्खानंद,देश-धर्म में क्या धरा, पैसे में आनंदअँग्रेजी से प्यार है, हिंदी से परहेज,ऊपर से हैं इंडियन, भीतर से अँगरेज#अंतरपट में खोजिए, छिपा हुआ है खोट,मिल जाएगी आपको, बिल्कुल सत्य रिपोट#अंदर काला हृदय है, ऊपर ग





1
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x