“दोहा मुक्तक”

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“दोहा मुक्तक”

शीर्षक -- फसल/ समानार्थी (एच्छिक मापनी) “दोहा मुक्तक” जब मन में उगती फसल, तब लहराते खेत खाद खपत बीया निरत, भर जाते चित नेत हर ऋतु में पकती फसल, मीठे मीठे स्वाद अपने अपने फल लिए, अपने अपने हेत॥-1 कभी क्रुद्ध होती हवा, कभी फसल बीमार गुर्राता है नभ कभी, कृषक



“दोहा मुक्तक”

“दोहा मुक्तक” माँ माँ कहते सीखता, बच्चा ज्ञान अपार माँ की अंगुली पावनी, बचपन का आधार आँचल माँ का सर्वदा, छाया जस आकाश माँ की ममता सादगी, पोषक उच्च बिचार॥-1 माँ बिन सूना सा लगे, हर रिश्तों का प्यार थपकी में उल्लासिता, गुस्सा करे दुलार करुणा की देवी जयी, चाहत सुत





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