“दोहा”

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“दोहा”

खड़ा हुआ हूँ भाव ले, बिकने को मजबूर बोलो बाबू कित चलू, दिन भर का मजदूर॥-1 इस नाके पर शोर है, रोजगार भरपूर हर हाथों में फावड़ा, पहली मे मशहूर॥-2 महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



“दोहा”

“दोहा” आया मनवा झूमते, अपने अपने धाम गंगा जल यमुना जहाँ, वहीं सत्य श्रीराम॥-1 कोई उड़ता ही रहा, ले विमान आकाश कोई कहे उचित नहीं, बादल बदले प्रकाश॥-2 अपनी अपनी व्यथा है, अपने अपने राग कहीं प्रेम परिहास है, कहीं पथ्य अनुराग॥-3 मंशा कौशल मानकी, नेकी नियती त्याग कर्म फलित होत



“दोहा”

“दोहा” भौंरा घूमे बाग में, खिलते डाली फूल कुदरत की ये वानगी, माली के अनुकूल॥ उड़ने दो इनको सखे, पलती भीतर चाह पंखुड़ियों में कैद ये, इनके मुँह कब आह॥ महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी





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