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गुप्तरत्न "भावनाओं के समन्दर मैं" मेरे सजदों की बस इतनी हिफाज़त कर लेना ए मालिक, की तेरे दर से उठे न,और कही सर रत्न का झुके

गुप्तरत्न"भावनाओं के समन्दर मैं" मेरे सजदों की बस इतनी हिफाज़त कर लेना ए मालिक, की तेरे दर से उठे न,और कही सर रत्न का झुके



पुरस्कार

पुरस्कारमेरे अच्छे कर्मों के लिए,मुझे पुरस्कार है मिला।मेरी प्यारी प्यारी बहना,उसका वाह क्या है कहना।धरती मिली है भारत जैसीजो है हमारी माँ के जैसी।ये पर्यावरण मिला है ऐसापिता जैसे सब देते वैसा।और मिले संस्कार महानजैसे प्यारा हिंदुस्तान।एक पुरस्कार और मैं चाहूं,किसी को भूखा न मैं पाऊँ।देना है तो दे द



"पद" भैया चंद्रयान ले आओ

"पद"भैया चंद्रयान ले आओमैं हूँ चंद्रमा घटता बढ़ता, आकर के मिल जाओउड़नखटोला ज्ञान भारती, ला झंडा फहराओइंतजार है बहुत दिनों से, इसरो दरस दिखाओलेकर आना सीवन साथी, आ परचम लहराओराह तुम्हारी देख रहीं हूँ, मम आँगन इतराओस्वागत करती हूँ भारत का, ऋषिवत ज्ञान खिलाओबड़े जतन से राखूंगी मैं, अपनी चाल बढ़ाओकहती रहती द



"दोहावली" नमन शहीदों को नमन, नमन हिंद के वीर। हर हालत से निपटते, आप कुशल रणधीर।।

"दोहावली"नमन शहीदों को नमन, नमन हिंद के वीर।हर हालत से निपटते, आप कुशल रणधीर।।-1नतमस्तक यह देश है, आप दिए बलिदान।गर्व युगों से आप पर, करता भारत मान।।-2रुदन करे मेरी कलम, नयन हो रहे लाल।शब्द नहीं निःशब्द हूँ, कौन वीर का काल।।-3राजनयिक जी सभा में, करते हो संग्राम।जाओ सीमा पर लड़ो, खुश होगी आवाम।।-4वोट



"गीतिका" भुला बैठे हमारे प्यार और इजहार के वो दिन नहीं अब याद आते है मुहब्बत प्यार के वो दिन

मापनी- 1222 1222 1222 1222, समांत- आर, पदांत- के वो दिन"गीतिका" भुला बैठे हमारे प्यार और इजहार के वो दिननहीं अब याद आते है मुहब्बत प्यार के वो दिनलिखा था खत तुम्हारे नाम का वो खो गया शायदकहीं पर शब्द बिखरे हैं कहीं मनुहार के वो दिन।।उठाती हूँ उन्हें जब भी फिसल कर दूर हो जातेबहारों को हँसा कर छुप गए



बून चान की याद में.

" लिखा नहीं कुछ वक्त से बून तेरी याद में, गम तेरे दुनियां से कूच का कुछ इस कदर रहा." बून चान मेरी चिड़िया का नाम है , जो पिछले साल 10 नवम्बर को एक हादसे में दुनियां से कूच कर गई. बून चान हर वक्त मेरे कम्प्यूटर पर बैठी रहती थी और मै



"चौपाई मुक्तक" वन-वन घूमे थे रघुराई, जब रावण ने सिया चुराई। रावण वधकर कोशल राई, जहँ मंदिर तहँ मस्जिद पाई।

"चौपाई मुक्तक"वन-वन घूमे थे रघुराई, जब रावण ने सिया चुराई।रावण वधकर कोशल राई, जहँ मंदिर तहँ मस्जिद पाई।आज न्याय माँगत रघुवीरा, सुनो लखन वन वृक्ष अधिरा-कैकेई ममता विसराई, अवध नगर हति कागा जाई।।-1अग्नि परीक्षा सिया हजारों, मड़ई वन श्रीराम सहारो।सुनो सपूतों राम सहारो, जस



"गज़ल" हँसा कर रुलाते बड़ी सादगी से खिलौना छुपाते बड़ी सादगी से

वज़्न---122 122 122 122✍️अर्कान-- फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन✍️ क़ाफ़िया— आते स्वर की बंदिश) ✍️रदीफ़ --- बड़ी सादगी से "गज़ल"हँसा कर रुलाते बड़ी सादगी सेखिलौना छुपाते बड़ी सादगी सेहवा में निशाना लगाते हो तुम क्यों पखेरू उड़ाते बड़ी सादगी से।।परिंदों के घर चहचहाती खुशी हैगुलिस्ताँ खिलाते बड़ी सादगी से।।शिकारी कहू



"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी। अकुलात जिया मन लागत का छड़ राजन काहुँ गए बहरी।

दुर्मिल सवैया ( वर्णिक )शिल्प - आठ सगण, सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा 112 112 112 112 112 112 112 112, दुर्मिल सवैया छंद लघु से शुरू होता है ।छंद मे चारों पंक्तियों में तुकांत होता है"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी।अकुलात



"मुक्तक"

"मुक्तक"मंदिर रहा सारथी, अर्थ लगाते लोग।क्या लिख्खा है बात में, होगा कोई ढोंग।कौन पढ़े किताब को, सबके अपने रूप-कोई कहता सार है, कोई कहता रोग।।-1मंदिर परम राम का, सब करते सम्मान।पढ़ना लिखना बाँचना, रखना सुंदर ज्ञान।मत पढ़ना मेरे सनम, पहरा स्वारथ गीत-चहरों पर आती नहीं, बे-मौसम मुस्कान।।-2महातम मिश्र, गौत



"देशज गीत" सजरिया से रूठ पिया दूर काहें गइल नजरिया के नूर सैंया दूर काहें कइल

"देशज गीत" सजरिया से रूठ पिया दूर काहें गइलनजरिया के नूर सैंया दूर काहें कइलरचिको न सोचल झुराइ जाइ लौकीकोहड़ा करैला घघाइल छान चौकीबखरिया के हूर राजा दूर काहें गइल..... सजरिया से रूठ पिया दूर काहें गइलकहतानि आजा बिहान होइ कइसेझाँके ला देवरा निदान होइ कइसेनगरिया के झूठ सैंया फूर काहें कइल..... सजरिया स



"गीतिका" अभी है आँधियों की ऋतु रुको बाहार हो जाना घुमाओ मत हवाओं को अजी किरदार हो जाना

मापनी-1222 1222 1222 1222, समान्त- आर का स्वर, पदांत- हो जाना"गीतिका"अभी है आँधियों की ऋतु रुको बाहार हो जानाघुमाओ मत हवाओं को अजी किरदार हो जानावहाँ देखों गिरे हैं ढ़ेर पर ले पर कई पंछीउठाओ तो तनिक उनको सनम खुद्दार हो जाना।।कवायत से बने है जो महल अब जा उन्हें देखोभिगाकर कौन रह पाया नजर इकरार हो जाना



"गज़ल" जिंदगी के दिन बहुत आए हँसा चलते बने थे नैन सूखे कब रहे की तुम रुला चलते बने थे

बह्र- 2122 2122 2122 2122 रदीफ़- चलते बने थे, काफ़िया- आ स्वर"गज़ल" जिंदगी के दिन बहुत आए हँसा चलते बने थेनैन सूखे कब रहे की तुम रुला चलते बने थेदिन-रात की परछाइयाँ थी घूरती घर को पलटकरदिन उगा कब रात में किस्सा सुना चलते बने थे।।मौन रहना ठीक था तो बोलने की जिद किये क्योंकाठ न था आदमी फिर क्यों बना चलते



@छंदमुक्त काव्य"

..!छंदमुक्त काव्य, बदलता मौसम तुम ही हो मेरे बदलते मौसम के गवाहमेरे सावन की सीलनमेरे मन की कुढ़न मेरी गर्मी की तपनमेरे शिशिर की छुवनमधुमास की बहार हो तुम।।तुम ही होे मेरे उम्र की पहचानमेरे चेहरे पर सेहरे की शानतुम ही बहार हो तुम ही संसार होकहो तो हटा दूँ इन फूलों की लड़ियों कोदिखा दूँ वह ढ़का हुआ चाँदम



"भोजपुरी गीत" साँझे कोइलरिया बिहाने बोले चिरई जाओ जनि छोड़ी के बखरिया झूले तिरई....... साँझे कोइलरिया बिहाने बोले चिरई

भोजपुरी गीत, मात्रा भार-24, मुखड़ा समान्त- ए चिरई, अंतरा समान्त- क्रमशः खटिया,जनाना, जवानी,"भोजपुरी गीत"साँझे कोइलरिया बिहाने बोले चिरईजाओ जनि छोड़ी के बखरिया झूले तिरई....... साँझे कोइलरिया बिहाने बोले चिरईदेख जुम्मन चाचा के अझुराइल खटियाहोत भिनसारे ऊ उठाई लिहले लठियागैया तुराइल जान हेराइ गईल बछवाखो



"गज़ल" पास आती न हसरत बिखरते रहे चाहतों के लिए शोर करते रहे

वज़्न--212 212 212 212, अर्कान-- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन, बह्रे- मुतदारिक मुसम्मन सालिम, क़ाफ़िया— करते, (अते की बंदिश) रदीफ़ --- रहे"गज़ल" पास आती न हसरत बिखरते रहेचाहतों के लिए शोर करते रहेकारवाँ अपनी मंजिल गया की रुकाकुछ सरकते रहे कुछ फिसलते रहे।।चंद लम्हों की खातिर मिले थे कभीकुछ भटकते रहे कु



"मुक्तक" देखिए तो कैसे वो हालात बने हैं। क्या पटरियों पै सिर रख आघात बने हैं।

"मुक्तक" देखिए तो कैसे वो हालात बने हैं।क्या पटरियों पै सिर रख आघात बने हैं।रावण का जलाना भी नासूर बन गया-दृश्य आँखों में जख़्म जल प्रपात बने हैं।।-1देखन आए जो रावण सन्निपात बने हैं।कुलदीपक थे घर के अब रात बने हैं।त्योहारों में ये मातम सा क्यूँ हो गया-क्या रावण के मन के सौगात बने हैं।।-2महातम मिश्र,



"छंदमुक्त काव्य" कूप में धूप मौसम का रूप

"छंदमुक्त काव्य"कूप में धूपमौसम का रूप चिलमिलाती सुबहठिठुरती शाम है सिकुड़ते खेत, भटकती नौकरीकर्ज, कुर्सी, माफ़ी एक नया सरजाम हैसिर चढ़े पानी का यह कैसा पैगाम है।।तलाश है बाली कीझुके धान डाली कीसूखता किसान रोजगुजरती हुई शाम है कुर्सी के इर्द गिर्द छाया किसान हैखेत खाद बीज का भ्रामक अंजाम हैसिर चढ़े पानी



"गीतिका" छा रही कितनी बलाएँ क्या बताएँ साथियों द्वंद के बाजार में क्या क्या सुनाएँ साथियों

छन्द- सीता (मापनीयुक्त वर्णिक) वर्णिक मापनी - 2122 2122 2122 212 अथवा लगावली- गालगागा गालगागा गालगागा गालगा पारंपरिक सूत्र - राजभा ताराज मातारा यमाता राजभा (अर्थात र त म य र)"गीतिका" छा रही कैसी बलाएँ क्या बताएँ साथियोंद्वंद के बाजार मे



"गज़ल" अजी यह इस डगर का दायरा है सहज होता नहीं यह रास्ता है

वज़्न - 1222 1222 122 , अर्कान - मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फऊलुन बह्र - बह्रे हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़, काफ़िया - डूबता(आ स्वर) रदीफ़- है"गज़ल"अजी यह इस डगर का दायरा है सहज होता नहीं यह रास्ता है कभी खाते कदम बल चल जमीं परहक़ीकत से हुआ जब फासला है।।उठाकर पाँव चलती है गरजबहुत जाना पिछाना फैसला ह



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