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मैं भटकता रहा

*गहराई की छिपी वर्जनाओं के स्वर*( "स्वयं पर स्वयं" से ) मैं भटकता रहामैं भटकता रहा; समय, यूं ही निकलता रहा; मैं भटकता रहा। उथला जीवन जीता रहा;तंग हाथ किये, जीवन जीता रहा। न किसी को, दिल खोल कर अपना सका;न किसी का, खुला दिल स्वीकार कर सका;न आपस की, दूरी मिटा सका;न सब कु



गुस्सा -- Balance Sheet दर्पण

" गुस्सा -- Balance Sheet दर्पण " हम गुस्सा, करते रहते हैं;और गुस्सा करने को, उचित भी ठहराते रहते हैं;और साथ साथ, यह भी, मानते रहते हैं;कि गुस्सा देता, सिर्फ घाटा; . . . सिर्फ हानी;और होते, कितने नुकसान हैं। . . . इस उलझन को, हम देखते हैं।।1।।. . . जब जब हमारा काम हो जाता है, गुस्सा करने से;स



"गज़ल" हाथ कोई हाथ में आ जाएगा मान लो जी साथियाँ भा जाएगा

बह्र 2122, 2122 212, काफ़िया, आ स्वर, रदीफ़- जाएगा"गज़ल" हाथ कोई हाथ में आ जाएगा मान लो जी साथियाँ भा जाएगालो लगा लो प्यार की है मेंहदी करतली में साहिबा छा जाएगा।।मत कहो की आईना देखा नहींनूर तिल का रंग बरपा जाएगा।।होठ पर कंपन उठे यदि जोर कीखिलखिला दो लालिमा भा जाएगा।।अधखुले है लब अभी तक आप केखोल दो मु



"पिरामिड"

"पिरामिड"क्याहुआसहाराबेसहाराभूख का मारालालायित आँखनिकलता पसीना।।-1हाँचोरसिपाहीसहायतापक्ष- विपक्षअपना करमबेरहम मलम।।-2महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



"गीत" चल री सजनी दीपक लेकर भर दे डगर उजास

मापनी- 2222 2222 2212 121, मुखडा समान्त- अर, पदांत- आस"गीत" चल री सजनी दीपक लेकर भर दे डगर उजासआगे-आगे दिन चलता है अवनी नजर आकाशगिन दश दिन तक राम लड़े थे रावण हुआ निढ़ालबीस दिनों के बाद अयोध्या दीपक पहर प्रकाश....चल री सजनी दीपक लेकर भर दे डगर उजासलंका जलती रही धधककर अंगद का बहुमानबानर सेना विजय पुकार



छंद पंचचामर

शिल्प विधान- ज र ज र ज ग, मापनी- 121 212 121 212 121 2 वाचिक मापनी- 12 12 12 12 12 12 12 12."छंद पंचचामर"सुकोमली सुहागिनी प्रिया पुकारती रही।अनामिका विहारिणी हिया विचारती रही।।सुगंध ले खिली हुई कली निहारती रही।दुलारती रही निशा दिशा सँवारती रही।।-1बहार बाग मोरिनी कुलांच मारती रही।मतंग मंद मालती सुगंध



"क्षणिका"

"क्षणिका"सब के सब देख रहे थेलगी हुई थी आग जलता हुआ रावण दर्शनार्थी अस्त ब्यस्तट्रेन की डरावनी चिंघाड़दौड़ती हुई उतावली रफ्तारधुँआँ उड़ा आँखों के सामनेशायद ही कोई देख रहा था।।-1जमीन से जुड़े है हममाटी दीया, अनेक प्रकारअंधकार से लड़ती दीवाली लोग खरीद रहे हैं बेंच रहे हैचहल-पहल, मंहगाई व व्यवस्थाप्रकाश पटाख



"मुक्तक"

रूप चौदस/छोटी दीपावली की सभी को हार्दिक बधाई एवं मंगल शुभकामना"मुक्तक"जलाते दीप हैं मिलकर भगाने के लिए तामस।बनाते बातियाँ हम सब जलाने के लिए तामस।सजाते दीप मालिका दिखाने के लिए ताकत-मगर अंधेर छुप जाती जिलाने के लिए तामस।।-1विजय आसान कब होती खुली तलवार चलती है।फिजाओं की तपिश लेकर गली तकरार पलती है।सु



"गीतिका" उड़ा आकाश कैसे तक चमन अहसास होता है हवावों से बहुत मिलती मदद आभास होता है

, आधार छंद--विधाता, मापनी- 1222 1222 1222 1222 समांत - आस, पदांत - होता है"गीतिका"उड़ा आकाश कैसे तक चमन अहसास होता हैहवावों से बहुत मिलती मदद आभास होता हैजहाँ भी आँधियाँ आती उड़ा जाती ठिकाने कोबता दौलत हुई किसकी फकत विश्वास होता है।।बहुत चिंघाड़ता है चमकता है औ गरजता घनबिना मौसम बरसता है छलक चौमास होता



"गज़ल" कहो जी आप से क्या वास्ता है सुनाओ क्या हुआ कुछ हादसा है

वज़्न-- 1222 1222 122 अर्कान-- मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन, क़ाफ़िया— वास्ता (आ स्वर की बंदिश) रदीफ़ - है"गज़ल" कहो जी आप से क्या वास्ता हैसुनाओ क्या हुआ कुछ हादसा हैसमझ लेकर बता देना मुझे भीहुआ क्या बंद प्रचलित रास्ता है।।चले जा चुप भली चलती डगर येमना लेना नयन दिग फरिश्ता है



"गीतिका" याद कर सब पुकार करते हैं जान कर कह दुलार करते है

मापनी, 2122 1212 22/112, समान्त- आर, पदांत- करते हैं"गीतिका" याद कर सब पुकार करते हैंजान कर कह दुलार करते है देखकर याद फ़िकर को आयीदूर रहकर फुहार करते है ।।गैर होकर दरद दिया होगा ख़ास बनकर सवार करते हैं।।मानते भी रहे जिगर अपनाधैर्य निस्बत निहार करते है।।लौट आने लगी हँसी मुँहपरमौन महफ़िल शुमार करते हैं।



"गज़ल" जब चाँद का फलक गुनाहों में खो गया तब रात का चलन घटाओं में खो गया

वज़्न - 221 2121 1221 212 अर्कान - मफ़ऊलु-फ़ाइलातु-मफ़ाईलु-फ़ाइलुन बह्र - बह्रे मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ मक्फूफ़ महज़ूफ़ काफ़िया - घटाओं (ओं स्वर) रदीफ़ - में खो गया"गज़ल" जब चाँद का फलक गुनाहों में खो गयातब रात का चलन घटाओं में खो गयाजज्बात को कभी मंजिलें किधर मिलतीहमसफर जो था वह विवादों में खो



"मुक्तक"

आप का दिन मंगलमय हो,"मुक्तक"चढ़ा लिए तुम बाण धनुर्धर, अभी धरा हरियाली है।इंच इंच पर उगे धुरंधर, किसने की रखवाली है।मुंड लिए माँ काली दौड़ी, शिव की महिमा न्यारी है-नित्य प्रचंड विक्षिप्त समंदर, गुफा गुफा विकराली है।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



"छंद वाचिक विमोहा"

छन्द- वाचिक विमोहा (मापनीयुक्त मात्रिक) मापनी - 212 212 अथवा - गालगा गालगा पारंपरिक सूत्र - राजभा राजभा (अर्थात र र) विशेष : विमोहा 'मापनीयुक्त वर्णिक छंद' है, जिसमें वर्णों की संख्या निश्चित होती है अर्थात किसी गुरु 2 / गागा के स्थान पर दो लघु 11 /लल प्रयोग करने की छूट नहीं होती है। ऐसे छंद को 'वर्



@हाइकु"

पावन पर्व करवा चौथ पर आप सभी को हार्दिक बधाई,चाँद ने दर्शन दिया, नमन"हाइकु"शुभ सिंदूरसाजन मगरूरनैनो का नूर।।-1टीका लिलारसिंदूर व सुहागबिंदिया चटकार।।-2नैन काजलसिंदूर व साजनकरवा चौथ।।-3होठ की लालीसुंदर घरवालीआयी दीवाली।।-4धानी चूनरओढ़ सखी हूनरसजा सिंदूर।।-5महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



"मुक्तक"

"मुक्तक"सत्य समर्पित है सदा, लेकर मानक मान।जगह कहाँ कोई बची, जहाँ नहीं गुणगान।झूठा भी चलता रहा, पाकर अपनी राह-झूठ-मूठ का सत्य कब, पाता है बहुमान।।-1सही अर्थ में देख लें, लाल रंग का खैर।झूठ सगा होता नहीं, और सगा नहीं गैर।सत्य कभी होती नहीं, आपस की तकरार-झूठ कान को भर गया, खूँट बढ़ा गया बैर।।-2महातम मि



"कुंडलिया"

मित्रों शुभ दिवस, दिल खोल कर हँसें और निरोग रहें।"कुंडलिया"बदहजमी अच्छी नहीं, भर देती है गैस।कड़वी पत्ती नीम की, चबा रही है भैंस।।चबा रही है भैंस, निरक्षर कुढ़ती रहती।बँधी पड़ी है खूँट, दूध ले घूँट तरसती।।कह गौतम कविराय, हाय रे मूर्खावज्मी।कुछ तो करो विचार, हुई क्योंकर बदहजमी।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुर



"पिरामिड"

"पिरामिड" वोलंकारावणमंदोदरीसीता हरणजंगल भ्रमणदशानन दहन।।-1वोप्रणप्रणामक्षमादानलंकेश वधआदर्श चलनमाँ जानकी रहन।।-2महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



"गीतिका" उग आई ऋतु है चाहत की मत लाना दिल में शामत की

मापनी- 22 22 22 22, समान्त- अत, पदांत- की"गीतिका"उग आई ऋतु है चाहत कीमत लाना दिल में शामत कीदेखो कितनी सुंदर गलियाँ खुश्बू देती हैं राहत की।। जब कोई लगता दीवाना तब मन होता है बसाहत की।।दो दिल का मिलना खेल नहींपढ़ना लिखना है कहावत की।।माना की दिल तो मजनू हैपर मत चल डगर गुनाहत की।।देखो कलियाँ चंचल ह



"गज़ल" थोड़ा थोड़ा प्यार दे मुझको कर्ज सही पर यार दे मुझको

मात्रा भार-17, काफ़िया- आर, रदीफ़ - दे मुझकोग़ज़ल, बह्र-22 22 22 22, काफ़िया-आर, रदीफ़ - दे मुझको....... ॐ जय माँ शारदा.......!"गज़ल"थोड़ा थोड़ा प्यार दे मुझकोकर्ज सही पर यार दे मुझकोपल आता इंतजार बिना कब कल की रात सवार दे मुझको।।बैठी नाव निरखती तुझकोदरिया पार उतार दे मुझको।



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