अध्यात्मिक

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देवाधिदेव

★★★★★देवाधिदेव ★★★★★"परम पुरुष" के बाहर कुछ भी नहीं।वे हीं देव हैं जो ब्रह्माण्डीय कार्यकीके कारण हैं। ब्रह्म रंध्र वा विश्व नाभिसे उत्सर्जित अभिव्यक्त महापँचभूत तरंगें हीं देवता हैं जो देव स्वरूपपरम पुरुष की सृष्टि नियंत्रित करते हैं।यहीं महाशक्ति ब्रह्माण्ड के अनवरतताण्डव का कारण है जिसक



गणपति बप्पा मोरिया

कथा गणपति बप्पा मोरिया की🕉️ 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️गणपति-बप्पा-मोरिया की प्रतिमायें सुशोभित हैं।गणेश कथा सुन, भक्त आह्लादित प्रफुल्लित हैं।।आएं आज- 'पंद्रह हजार वर्ष' पुर्व हम चलते हैं।पर्वतों पर बसे ऋषियों की चर्चा आज करते हैं।।"ऋषि कुल" को ऋग्वेद में "गोष्ठी" कहा करते थे।'"गोष्ठी" के श्रेष्टतम्



पिता

💖💖💖पिता💖💖💖एषणाओं के भंवरजाल मेंउलझ व्यर्थ हीं,व्यथित हो इहजगत् कोन बँधु झुठलाओ।तुममें है हुनर एवम्है अदम्य सामर्थ्य,अजपाजप गह'सबका मालिक एककह नित महोत्सव मनाओ।।हर साल "फादर्स डे" मना एक दिन३६४ भूल जाते आखिर क्यों (?) तुम!"पित्रि यज्ञ महामंत्र" नित्य उचर कर,आशीर्वाद भरपूर बटोर करसदगति रे मन पा



प्रेम

भगवान् "प्रेम" का हीं दुजा नाम है।न वो मूरत में या फिर मकान में है।।उसे चाहते हो बँधु गर तुम पाना,प्रेम का रास्ता बहुत हीं आसान है।अंतरजगत में तीर्थाटन जो करता,वही साघक सिद्ध और महान है।।🙏 🙏 🙏निर्मल🙏 🙏 🙏🙏👣ह👣रि👣प👣द👣🙏



शुद्ध स्वर

बांस की डाल चुन गुहा बनाईसात छिद्र कर होठों से लगाईसा-रे-ग-म-प-ध-नी★ सुर से हटी तन्हाईप्रिय बाँसुरिया तक राधा के हाथों में थमाईतंत्र साधना की जटिल गुत्थी सहज सुलझाईपर राधा थी कि बस कृष्ण नाम की रट लगाईनिर्मल★संगीत के सात शुद्धस्वर:---षड्ज (सा)ऋषभ (रे)गंधार (ग)मध्यम (म)पंचम (प)धैवत (ध)निषाद (नी)स्वर



महाशिवरात्रि

★★★★★शिवरात्रि के शुभ अवसर पर★★★★★★शिव का रहस्यमयी एवम् गौरवमयी इतिहास★2020 ई. में 21 फरवरी को यह शुभ दिन आ रहा है।ऋग्वेद लगभग 15 (पंद्रह) हजार वर्ष पूर्व रचित होना प्रारम्भ हुआ था। अनुमानतः सात हजार वर्ष पूर्व प्रथम महासंभुति तारक ब्रह्म भगवान शिव इस धरा धाम पर मानव के रूप में अवतरित हुए थे।वह समय



मेरा अपना

सुबह हो या फिर शाम होलबों पे बस तेरा नाम होहर काम में हम साथ होसपनों के तुम राजदार होलोगबाग तुझे भले महाकौल कहें,तुम बस एक मेरे श्याम होडॉ. कवि कुमार निर्मल



शंखनाद्

शंखनाद्शुभदिन आज भी आह्लादित कर जाएगापरम अराध्य का सामिप्य मन पा जाएगाप्रचण्ठ तृष्णा- सानिध्य की एषणा गहराई,सद्गुरु कृपा से सांजुज्य पा यह भक्त तर जाएगामैली चादर मन की धुल, आभा से भर जाएगाडॉ. कवि कुमार निर्मल



मेरी जिद्द

"मेरी जिद्द"जिद्द है- मन बनाया है- तुझे पाउँगादिल के एक कोने में छुपा- बिठाउँगागुफ़्तगू में लम्बी रातें- मैं बिताउँगासिकवा-शिकायत रोज सुलझाउँगाखासमखास बन- मयपन मिटाउँगातुझसे आया- तुझमें समा जाउँगाजिद्द है- मन बनाया है- तुझे पाउँगादिल के एक कोने में छुपा- बिठाउँगाडॉ. कवि कुमार निर्मल



धनतेरस की धनवंतरी जयंती!

धनवंतरी आयुर्वेदाचार्य मृत्युंजीवि औषधि आजीवन बाँटे।आज हम भौतिकता मे लिपट24 कैरेट का खालिस सोना चाटें।।मृत्युदेव तन की हर कोषिका-उतक में शांत छुपा सोया है।मन जीर्ण तन से ऊब कर देखोनूतन भ्रूण खोज रहा है।।लक्ष्मी अँधेरी रात्रि देख आदीपकों की माला सजवाती है।गरीब के झोपड़ में चुल्हे मेंलकड़ी भी नहीं जल प



अध्यात्म

स्वप्न की गहराई में देखा कितुम मेरे बारे में सोच रहे हो!🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️ओ’ मेरे परम प्रिय,ओ’ परम पुरुष! तुम्हारी कृपा सेमैंने अपनी प्रगाढ़ निद्रा की गहराई में देखा कितुम मेरे बारे में सोच रहे हो!हे मेरे परम अराध्य!तुम सचमुच कितने कृपालु हो!! अब तक मैं तुम्हारीप्राप्ति हेतु तरस रहा था!अपने आप को तुम



ब्रह्म

ब्रह्म पूर्ण है!यह जगत् भी पूर्ण है,पूर्ण जगत् की उत्पत्तिपूर्ण ब्रह्म से हुई है!पूर्ण ब्रह्म सेपूर्ण जगत् कीउत्पत्ति होने पर भीब्रह्म की पूर्णता मेंकोई न्यूनता नहींआती!वह शेष रूप में भीपूर्ण ही रहता है,यही सनातन सत्य है!जो तत्व सदा, सर्वदा,निर्लेप, निरंजन,निर्विकार और सदैवस्वरूप में स्थित रहताहै उस



राम रावण युद्ध

रावण हर साल जल कर राख से जी उठता हैराम का तरकश खाली हो फिर भरता रहता हैयह राम रावण का युद्ध अनवरत मन में चलता हैखूँटे से बँधा स्वतंत्र हो लक्ष्मी संग विचरण करता हैसुर्य अस्त हो नित्य आभा बिखेर आलोकित करता हैअष्ट-पाश सट्-ऋपुओं के समन हेतु हमें यज्ञ करना हैसाघना-सेवा-त्याग से दग्ध मानवता को त्राण देना



भक्ति

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺मनुष्य के अंदर सब कुछ जाननेवाला जो बैठा है वही है भगवान्।ओत-प्रोत योग से वे हर क्षण हमारे साथ हैं।याने, हम अकेले कदापि नहीं।जब अनंत शक्तिशाली हमारे साथ हैंतो हम असहाय कैसे हो सकते हैं?डर की भावना कभी नहीं रहनी चाहिए--जैसे एक परमाणु है जिसमें एकनाभि है तथा एलेक्ट्रोन्स अपनीधूरि पर



राम और रावण युद्ध

युद्ध देव दानव का युगों से चलता आया है"कुरुक्षेत्र" बार - बार रक्तिम होता आया हैसंधर्ष यह "मन" का है, ग्रंथों में बाँचा जाता हैमृत्यु काल में मन में वही भाव समक्ष आता हैमन खोज अनुकूल देह भ्रूण में समा जाता हैसंस्कार क्षय कर पूर्ण- दिव्यात्मा कहलाता हैनाशवान इह जगत् से मुक्त हो 'मोक्ष' पाता हैराम





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