अब इतना दम कहाँ

अब इतना दम कहाँ!

झुक गए हैं कंधे मेरे, अपनों का बोझ उठाते,सपनों का बोझ उठाऊं, अब इतना दम कहाँ!कण कण जोड़कर घरोंदा ये बनाया मैंने,तन-तन मोड़कर इसको सजाया मैंने।रुक गया हूँ, झुक गया हूँ, बहनों का बोझ उठाते,गहनों का बोझ उठाऊँ, अब इतना दम कहाँ!परिवार की आशाओं में खुद को पिराया मैंने,बनकर छत उनकी सदा, खुद को भिगाया मैंने।अ





1
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x