आलोक_कौशिक_की_कविता

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जय श्री राम

त्याग का पर्याय प्रतीक शौर्य का पुरुषों में उत्तम संहर्ता क्रौर्य का परहित प्रियता भ्राताओं में ज्येष्ठ कर्तव्य परायण नृप सर्वश्रेष्ठ शरणागत वत्सल हैं आश्रयदाता दशरथ नंदन भाग्य विधाता भजे मुख मेरा तेरा ही नाम जय सिया राम जय श्री राम :- आलोक कौशिक संक्षिप्त परिचय:-नाम-



साहित्य के संकट

संकट साहित्य पर है बड़ा ही घनघोर धूर्त बना प्रकाशक लेखक बना है चोर भूखे हिंदी के सेवक रचनाएं हैं प्यासी जब से बनी है हिंदी धनवानों की दासी नकल चतुराई से कर रहा कलमकार हतप्रभ और मौन है सच्चा सृजनकार प्रकाशन होता पैसों से मिलता छद्म सम्मान लेखक ही होते पाठक करते मिथ्याभिमान :- आलोक कौशिक संक्षिप्त परि



पलायन का जन्म

हमने गरीब बन कर जन्म नहीं लिया था हां, अमीरी हमें विरासत में नहीं मिली थी हमारी क्षमताओं को परखने से पूर्व ही हमें गरीब घोषित कर दिया गया किंतु फिर भी हमने इसे स्वीकार नहीं किया कुदाल उठाया, धरती का सीना चीरा और बीज बो दिया हमारी मेहनत रंग लाई, फसल लहलहा उठी प्रसन्नता नेत्रों के रास्ते हृदय में पहुं



प्रकृति

विध्वंसक धुंध से आच्छादितदिख रहा सृष्टि सर्वत्र किंतु होता नहीं मानव सचेत कभी प्रहार से पूर्वत्र सदियों तक रहकर मौन प्रकृति सहती अत्याचार करके क्षमा अपकर्मों को मानुष से करती प्यार आती जब भी पराकाष्ठा पर मनुज का अभिमान दंडित करती प्रकृति तब अपराध होता दंडमान पशु व पाद



बहन

दिखती है जिसमें मां की प्रतिच्छवि वह कोई और नहीं होती है बान्धवि जानती है पढ़ना भ्राता का अंतर्मन अंतर्यामी होती है ममतामयी बहन है जीवन धरा पर जब तक है वेगिनी उत्सवों में उल्लास भर देती है भगिनी :- आलोक कौशिक संक्षिप्त परिचय:-नाम- आलोक कौशिकशिक्षा- स्नातकोत्तर (अंग्रेजी साहित्य)पेशा- पत्रकारिता एवं



कवि सम्मेलन

स्वार्थपरायण होते आयोजक संग प्रचारप्रिय प्रायोजक भव्य मंच हो या कोई कक्ष उपस्थित होते सभी चक्ष सम्मुख रखकर अणुभाष करते केवल द्विअर्थी संभाष करता आरंभ उत्साही उद्घोषक समापन हेतु होता परितोषक करते केवल शब्दों का शोर चाहे वृद्ध हो या हो किशोर काव्य जिसकी प्रज्ञा से परे होता आनन्दित दिखते वही श्रोता करत



पिता के अश्रु

बहने लगे जब चक्षुओं से किसी पिता के अश्रु अकारण समझ लो शैल संतापों का बना है नयननीर करके रूपांतरण पुकार रहे व्याकुल होकर रो रहा तात का अंतःकरण सुन सकोगे ना श्रुतिपटों से हिय से तुम करो श्रवण अंधियारा कर रहे जीवन में जिनको समझा था किरण स्पर्श करते नहीं हृदय कभी छू रहे वो केवल चरण :- आलोक कौशिक संक्षि



क्योंकि मैं सत्य हूं

मैं कल भी अकेला थाआज भी अकेला हूं और संघर्ष पथ पर हमेशा अकेला ही रहूंगा मैं किसी धर्म का नहीं मैं किसी दल का नहीं सम्मुख आने से मेरे भयभीत होते सभी जानते हैं सब मुझको परंतु स्वीकार करना चाहते नहीं मैं तो सबका हूं किंतु कोई मेरा नहीं फिर



भारत में

*भारत में*भारत में पूर्ण सत्य कोई नहीं लिखता अगर कभी किसी ने लिख दिया तो कहीं भी उसका प्रकाशन नहीं दिखता यदि पूर्ण सत्य को प्रकाशित करने की हो गई किसी की हिम्मत तो लोगों से बर्दाश्त नहीं होता और फिर चुकानी पड़ती है लेखक को सच लिखने की कीमत भारतीयों को मिथ्या प्रशंसा अत्यंत है भाता आख़िर करें क्या





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