जीवनदर्शन



आत्मनिरीक्षण :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर हमें सर्वश्रेष्ठ मानवयोनि प्राप्त हुई है | हम इस जीवन में जो कुछ भी करना चाहें कर सकते हैं | परंतु किसी भी कार्य में सफल होने के लिए आवश्यक है आत्मनिरीक्षण करना | इस जीवन में भौतिक , शारीरिक , बौद्धिक या आर्थिक किसी भी दृष्टि से विकास के लिए आत्मनिरीक्षण करना अनिवार्य प्रक्रिया है , ज



चरित्रनिष्ठा :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में आने के बाद मनुष्य जीवन भर विभिन्न प्रकार की संपदाओं का संचय किया करता है | यह भौतिक संपदायें मनुष्य को भौतिक सुख तो प्रदान कर सकती हैं परंतु शायद वह सम्मान ना दिला पायें जो कि इस संसार से जामे के बाद भी मिलता रहता है | यह चमत्कार तभी हो सकता है जब मनुष्य का चरित्र श्रेष्ठ होता है , क्



आत्म मूल्यांकन करना आवश्यक है :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम में आने के बाद मनुष्य स्वयं को समाज में प्रतिष्ठित करने के लिए अपने व्यक्तित्व का विकास करना प्रारंभ करता है , परंतु कभी-कभी वह दूसरों के व्यक्तित्व को देखकर उसका मूल्यांकन करने लगता है | यहीं पर वह छला जाता है | ऐसा मनुष्य इसलिए करता है क्योंकि दूसरों के जीवन में तांक - छांक करने की मनु



निर्भयता :-- आचार्य अर्जुन तिवारी :-

*मानव जीवन बहुत ही दुर्लभ है , यह जीवन जितना ही सुखी एवं संपन्न दिखाई पड़ता है उससे कहीं अधिक इस जीवन में मनुष्य अनेक प्रकार के भय एवं चिंताओं से घिरा रहता है | जैसे :- स्वास्थ्य हानि की चिंता व भय , धन समाप्ति का भय , प्रिय जनों के वियोग का भय आदि | यह सब भय मनुष्य के मस्तिष्क में नकारात्मक भाव प्र



अशान्तस्य कुतो सुखम् :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर द्वारा बनाया गया यह संसार बहुत की रहस्यमय है ` इस संसार को अनेक उपमा दी गई हैं | किसी ने इसे पुष्प के समान माना है तो किसी ने संसार को ही स्वर्ग मान लिया है | वेदांत दर्शन में संसार को स्वप्नवत् कहा गया है तो गोस्वामी तुलसीदास जी इस संसार को एक प्रपंच मानते हैं | गौतम बुद्ध जी के दृष्टिकोण से



विद्वता या अहंकार :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*जब से इस धरा धाम पर मनुष्य का सृजन हुआ है तब से लेकर आज तक अनेकों प्रकार के मनुष्य इस धरती पर आये और चले गये | वैसे तो ईश्वर ने मानव मात्र को एक जैसा शरीर दिया है परंतु मनुष्य अपनी बुद्धि विवेक के अनुसार जीवन यापन करता है | ईश्वर का बनाया हुआ यह संसार बड़ा ही अद्भुत एवं रहस्यम है | यहाँ मनुष्य के म



जिंदगी को जिओ पर संजीदगी से....

जिंदगी जिओ पर संजीदगी से…….आजकल हम सब देखते हैं कि ज्यादातर लोगों में उत्साह और जोश की कमी दिखाई देती है। जिंदगी को लेकर काफी चिंतित, हताश, निराश और नकारात्मकता से भरे हुए होते हैं। ऐसे लोंगों में जीवन इच्छा की कमी सिर्फ जीवन में एक दो बार मिली असफलता के कारण आ जाती है। फिर ये हाथ पर हाथ रखकर बैठ जा



जीवित हो अगर, तो जियो जीभरकर...

जीवित हो अगर, तो जियो जीभरकर...जीते तो सभी हैं पर सभी का जीवन जीना सार्थक नहीं है। कुछ लोग तो जिये जा रहे हैं बस यों ही… उन्हें खुद को नहीं पता है कि वे क्यों जी रहे हैं? क्या उनका जीवन जीना सही मायनें में जीवन है। आओ सबसे पहले हम जीवन को समझे और इसकी आवश्यकता को। जिससे कि हम कह सकें कि जीवित हो अगर



तनाव मुक्त जीवन ही श्रेष्ठ है……

तनाव मुक्त जीवन ही श्रेष्ठ है……आए दिन हमें लोंगों की शिकायतें सुनने को मिलती है….... लोग प्रायः दुःखी होते हैं। वे उन चीजों के लिए दुःखी होते हैं जो कभी उनकी थी ही नहीं या यूँ कहें कि जिस पर उसका अधिकार नहीं है, जो उसके वश में नहीं है। कहने का मतलब यह है कि मनुष्य की आवश्यकतायें असीम हैं….… क्योंकि



ईश्वरीय अनुदान को समझें :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार का सृजन करने वाले परमपिता परमात्मा ने मनुष्य को सब कुछ दिया है , ईश्वर समदर्शी है उसने न किसी को कम दिया है और न किसी को ज्यादा | इस सृष्टि में मनुष्य के पास जो भी है ईश्वर का ही प्रदान किया हुआ है , भले ही लोग यह कहते हो कि हमारे पास जो संपत्ति है उसका हमने अपने श्रम और बुद्धि से प्राप्त



बोलने की कला :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*चौरासी लाख योनियों में मानव जीवन को दुर्लभ कहां गया है क्योंकि यह मानव शरीर अनेक जन्मों तक कठोर तपस्या करने के बाद प्राप्त होता है | इस शरीर को पा करके मनुष्य अपने क्रियाकलाप एवं व्यवहार के द्वारा लोगों में प्रिय तो बनता ही है साथ ही मोक्ष भी प्राप्त कर सकता है | अपने संपूर्ण जीवन काल में प्रत्येक



विचारों की शक्ति असीम है :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में विचारों का बड़ा महत्व है | विचारों की शक्ति असीम होती है | यहां व्यक्ति जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है क्योंकि उसके द्वारा हृदय में जैसे विचार किए जाते हैं उसी प्रकार कर्म भी संपादित होने लगते हैं क्योंकि विचार ही कर्म के बीज हैं , व्यवहार के प्रेरक हैं | जब मनुष्य व्यस्त होता है तो



सम्बन्धों को सहेजना भी एक कला है :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है , किसी परिवार में जन्म लेकर मनुष्य समाज में स्थापित होता है | इस जीवन क्रम में परिवार से लेकर समाज तक मनुष्य अनेको संबंध स्थापित करता है इन संबंधों का पालन बहुत ही कुशलता पूर्वक करना चाहिए | जिस प्रकार किसी भी विषय में सफलता के उच्च शिखर को प्राप्त कर लेने की अपेक्षा उस



जिज्ञासा :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर मनुष्य मनुष्य कहे जाने के योग्य तब होता है जब हमें मनुष्यता होती है | मनुष्य में मनुष्यता का जागरण तब होता है जब वह स्वयं के विषय में संसार के विषय में जानने लगता है | मनुष्य किसी भी विषय में तब कुछ जान पाता है जब उसमें जिज्ञासा होती है | मानव जीवन जिज्ञासा का होना बहुत आवश्यक है क्य



परिवर्तन को स्वीकारें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि परिवर्तनशील है या यूँ कहें कि परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है | यहां एक जैसा कभी कुछ नहीं रह पाता है | सुबह सूर्य निकलता है शाम को ढल जाता है , सृष्टि के जितने भी सहयोगी हैं निरंतर गतिशील है | यदि गतिशीलता को जीवन एवं विराम को मृत्यु कहा जाय तो गलत नहीं है | जो रुक गया समझ ल



संस्कृति एवं सभ्यता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस जीवन में हम प्राय: संस्कृति एवं सभ्यता की बात किया करते हैं | इतिहास पढ़ने से यह पता चलता है कि हमारी भारतीय संस्कृति और सभ्यता बहुत ही दिव्य रही है | भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्धि संस्कृति है , जहां अन्य देशों की संस्कृतियां समय-समय पर नष्ट होती रही है वहीं भारतीय संस्कृ



अहंकार से बचने का उपाय :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य के अनेकों मित्र एवं शत्रु बनते देखे गए हैं , परंतु मनुष्य अपने सबसे बड़े शत्रु को पहचान नहीं पाता है | मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कहीं बाहर नहीं बल्कि उसके स्वयं के भीतर उत्पन्न होने वाला अहंकार है | इसी अहंकार के कारण मनुष्य जीवन भर अनेक सुविधाएं होने के बाद भी



जीवन का अद्भुत सत्य :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म के धर्म ग्रंथों में वर्णित एक एक शब्द मानव मात्र को दिव्य संदेश देता है | कोई भी साहित्य उठा कर देख लिया जाय तो उसने मानव मात्र के कल्याण की भावना निहित है | आदिभाषा संस्कृत में ऐसे - ऐसे दिव्य श्लोक प्राप्त होते हैं जिनके गूढ़ार्थ बहुत ही दिव्य होते हैं | ऐसा ही एक श्लोक देखते हैं कि ई



मर्यादा का रखें ध्यान :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संपूर्ण सृष्टि में परमात्मा ने एक से बढ़कर एक सुंदर रचनाएं की हैं | प्रकृति की छटा देखते ही बनती है , ऊंचे - ऊंचे पहाड़ , गहरे - गहरे समुद्र , अनेकों प्रकार की औषधियां , फूल - पौधे एवं अनेक प्रकार के रंग बिरंगी जीवो की रचना परमात्मा ने किया है जिन्हें देखकर बरबस ही मन मुग्ध हो जाता है और मन यही



युवा समझें अपने कर्तव्य :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*किसी भी राष्ट्र के निर्माण में युवाओं की मुख्य भूमिका होती है | जहां अपनी संस्कृति , सभ्यता एवं संस्कारों का पोषण करने का कार्य बुजुर्गों के द्वारा किया जाता है वहीं उनका विस्तार एवं संरक्षण का भार युवाओं के कंधों पर होता है | किसी भी राष्ट्र के निर्माण में युवाओं का



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