जीवनदर्शन



वर्तमान शिक्षापद्धति को सुधारने की आवश्यकता :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*पूर्वकाल में हमारे देश भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था , सोने की चिड़िया कहे जाने का तात्पर्य यह था कि यहां अकूत धन का भंडार तो था ही साथ ही आध्यात्मिकता एवं विद्या का केंद्र भी हमारा देश भारत था | हमारी शिक्षा पद्धति इतनी दिव्य थी उसी के बल पर समस्त विश्व में भारत की कीर्ति पताका फहराई थी और



प्रकृति पूजा का रहस्य :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से इस धरा धाम पर सनातन धर्म की स्थापना मानी जाती है | सनातन धर्म ने सदैव देव पूजा के साथ-साथ प्रकृति पूजा को भी महत्व दिया है | पृथ्वी पर जन्म लेकर के मनुष्य बड़ा होता है , इसीलिए पृथ्वी को माता की संज्ञा दी गई है , उसी की गोद में मनुष्य का बचपन व्यतीत होता है | इसके अतिरिक्त पहाड़ों , नदिय



सिन्दूर का महत्त्व :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार मानव जीवन को चार भागों में विभक्त करके उन्हें आश्रमों का नाम दिया गया है | इन चारों आश्रमों में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं मुख्य है गृहस्थाश्रम क्योंकि बिना गृहस्थ धर्म के पालन के सृष्टि की निरन्तरता बाधित हो जायेगी | परमात्मा द्वारा सृजित इस मैथुनी सृष्टि में गृहस्थाश्



परमात्मा से मिलने का सरल मार्ग :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर जन्म लेकर मनुष्य परमपिता परमेश्वर को प्राप्त करने के लिए अनेकों प्रकार के उपाय करता है यहां तक कि कभी-कभी वह संसार से विरक्त होकर के अकेले में बैठ कर परमात्मा का ध्यान तो करता ही रहता है साथ ही वह भावावेश में रोने भी लगता है और मन में विचार करता है कि हमको परमात्मा ने इस संसार में क्यो



ईश्वर को समर्पित कर्म ही पूजा है :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर द्वारा बनाई गयी सृष्टि बहुत ही देदीप्यमान एवं सुंदर है | मनुष्य के जन्म के पहले ही उसे सारी सुख - सुविधायें प्राप्त रहती हैं | जन्म लेने के बाद मनुष्य परिवार में प्रगति एवं विकास करते हुए पारिवारिक संस्कृति को स्वयं में समाहित करने लगता है | मनुष्य का जीवन ऐसा है कि एक क्षण भी कर्म किये बिना



सन्त - असन्त :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर की बनायी यह सृष्टि बहुत ही विचित्र है , यहां एक ही भाँति दिखने वाले मनुष्यों के क्रियाकलाप भिन्न - भिन्न होते हैं | मनुष्य के आचरण एवं उसके क्रियाकलापों के द्वारा ही उनकी श्रेणियां निर्धारित हो जाती है | वैसे तो मनुष्य की अनेक श्रेणियां हैं परंतु मुख्यतः दो श्रेणियों में मनुष्य बंटा हुआ है |



अन्न साक्षात परब्रह्म :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य कथा - प्रवचन / सतसंग के माध्यम से सद्गुरुओं के मुखारविन्द से प्राय: सुना करता है कि "ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या" अर्थात :- ब्रह्म ही सत्य है शेष सारा संसार छूठा है | दूसरा शब्द सुनने को मिलता है कि "एको ब्रह्म द्विती



बुद्धि बल से ही श्रेष्ठ है मनुष्य :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार परमात्मा ने अनेकानेक जीवो का सृजन किया | पशु - पक्षी ,कीड़े - मकोड़े और जलीय जंतुओं का सृजन करने के साथ ही मनुष्य का भी सृजन परमात्मा ने किया | सभी जीवो में समान रूप से आंख , मुख , नाक , कान एवं हाथ - पैर दिखाई देते हैं परंतु इन सब में मनुष्य को उस परमात्मा



बुद्धि बल से श्रेष्ठ है मानव :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

❌ *इस संसार परमात्मा ने अनेकानेक जीवो का सृजन किया | पशु - पक्षी ,कीड़े - मकोड़े और जलीय जंतुओं का सृजन करने के साथ ही मनुष्य का भी सृजन परमात्मा ने किया | सभी जीवो में समान रूप से आंख , मुख , नाक , कान एवं हाथ - पैर दिखाई देते हैं परंतु इन सब में मनुष्य को उस परमात्मा ने एक अमोघ शक्ति के रूप में बु



सत्पात्र बनें :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर ने सृष्टि में सबके लिए समान अवसर प्रदान किये हैं , एक समान वायु , अन्न , जल का सेवन करने वाला मनुष्य भिन्न - भिन्न मानसिकता एवं भिन्न विचारों वाला हो जाता है | किसी विद्यालय की कक्षा में अनेक विद्यार्थी होते हैं परन्तु उन्हीं में से कोई सफलता के उच्चशिखर को छू लेता है तो कोई पतित हो जाता है |



अपना सोंचा कुछ नहीं होता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर परमपिता परमात्मा ने जलचर , थलचर नभचर आदि योनियों की उत्पत्ति की | कुल मिलाकर चौरासी लाख योनियाँ इस पृथ्वी पर विचरण करती हैं , इन सब में सर्वश्रेष्ठ योनि मनुष्य को कहा गया है क्योंकि जहां अन्य जीव एक निश्चित कर्म करते रहते हैं वही मनुष्य को ईश्वर ने विवेक दिया है , कोई भी कार्य करने के



विवाह संस्कार की दिव्यता :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में सोलह संस्कारों का वर्णन मिलता है इन संस्कारों में एक महत्वपूर्ण संस्कार है विवाह संस्कार | मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद वैवाहिक संस्कार महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि सनातन धर्म में बताए गए चार आश्रम में सबसे महत्वपूर्ण है गृहस्थाश्रम | गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए विवाह संस



विवाह के विधान :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमात्मा के द्वारा मैथुनी सृष्टि का विस्तार करके इसे गतिशील किया गया | मानव जीवन में बताये गये सोलह संस्कारों में प्रमुख है विवाह संस्कार | विवाह संस्कार सम्पन्न होने के बाद पति - पत्नी एक नया जीवन प्रारम्भ करके सृष्टि में अपना योगदान करते हैं | सनातन धर्ण के सभी संस्कार स्वयं में अद्भुत व दिव्य रह



परमात्मा की प्रतिनिधि हैं "माँ" :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*उत्पत्ति - पालन और प्रलय ही सृष्टि की गतिशीलता का उदाहरण है | जो भी प्राणी इस संसार में जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है | इस धरा धाम पर जन्म लेने के बाद प्राणी विशेषकर मनुष्य अपने जीवन काल में अनेकों प्रकार के लोगों से मिलता है , अनेकों प्रकार की भाषा बोलना सीखता है और अनेकों कृत्य करता है परंतु इस



साधना एक संग्राम है :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में आध्यात्म का बहुत बड़ा महत्व है | अध्यात्म की पहली सीढ़ी साधना को बताया गया है | किसी भी लक्ष्य की साधना करना बहुत ही दुष्कर कार्य है , जिस प्रकार कोई पर्वतारोही नीचे से ऊपर की ओर चढ़ने का प्रयास करता है उसी प्रकार साधना आध्यात्मिक सुमेरु की ओर चढ़ने का प्रयास है | साधना करना सरल नही



माँ के दूध का महत्त्व :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में वैसे तो मनुष्य से भी अधिक बलवान जीव पाये जाते हैं परंतु मनुष्य ने अपने बुद्धि - विवेक , बल - कौशल से सब पर ही विजय प्राप्त की है | मनुष्य जन्म लेने के बाद इस धराधाम पर जो पहला आहार लेता है वह है "माँ का दूध" | जिस प्रकार संसार में जल के अनेक स्रोत होने के बाद भी गंगाजल को ही सर्वश्रेष्



कल्पनाशक्ति :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में एक से बढ़कर एक बलवान होते रहे हैं जिनकी तुलना नहीं की जा सकती है | यदि कोई भी बलवान हुआ है तो उसका आधार उस मनुष्य का मन ही कहा जा सकता है , क्योंकि संसार में सबसे बलवान मनुष्य का मन की कहा जाता है | सबसे बड़ी शक्ति कल्पना शक्ति के बल पर मनुष्य पृथ्वी पर रहते हुए तीनों लोगों का भ्रमण कि



जगायें आत्मविश्वास :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर जन्म लेने के बाद मनुष्य को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है | हमारा आत्मविश्वास ही हमारा मार्गदर्शन करते हुए सत्पथ पर चलने की प्रेरणा देता है | जीवन के रहस्य को समझने के लिए मनुष्य को आत्मविश्वास का सहारा लेना ही पड़ता है क्योंकि जी



सकारात्मक दृष्टिकोण :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में मनुष्य में बुद्धि - विवेक विशेष रूप से परमात्मा द्वारा प्रदान किया गया है | मनुष्य अपने विवेक के द्वारा अनेकों कार्य सम्पन्न करता रहता है | इन सबमें सबसे महत्त्वपूर्ण है मनुष्य का दृष्टिकोण , क्योंकि मनुष्य का दृष्टिकोण ही उसके जीवन की दिशाधारा को तय करता है | एक ही घटना को अनेक मनुष्य



शिक्षा :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में शिक्षा का बहुत बड़ा महत्व है | शिक्षा प्राप्त किए बिना मनुष्य जीवन के अंधेरों में भटकता रहता है | मानव जीवन की नींव विद्यार्थी जीवन को कहा जा सकता है | यदि उचित शिक्षा ना प्राप्त हो तो मनुष्य को समाज में पिछड़ कर रहना और उपहास , तिरस्कार आदि का भाजन बनना पड़ता है | यदि शिक्षा समय रहत



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