ज्ञानचर्चा

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वर्तमान को सुधारें :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*यह सृष्टि निरंतर गतिशील है , आज जो समय है कल वह भूत बन जाता है | काल गणना की सुविधा की दृष्टि से समय को तीन भागों में बांटा गया है जिसे भूतकाल वर्तमान काल एवं भविष्य काल कहा गया है | ध्यान देने वाली बात है भूत एवं भविष्य दोनों के लिए एक ही शब्द का प्रयोग किया जाता है जिसे कहा जाता है "कल" | अंतर सि



परिक्रमा :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में जितना महत्व पूजा - पाठ , साधना - उपासना का है उससे कहीं अधिक महत्त्व परिक्रमा का है | परिक्रमा करने से अनेकों जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं | हमारे शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है :- "यानि कानि च पापानि , जन्मांतर कृतानि च ! तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदिक्षण पदे पदे !! अर्थात :- अनेक



त्याग

*मनुष्य इस धरा धाम पर आने के बाद अपने जीवन में संतोष प्राप्त करना चाहता है पर मनुष्य को संतोष नहीं प्राप्त हो पाता | कोई ना कोई कमी जीवन भर उसे शूल की तरह चुभती रहती है | जीवन में यदि संतोष प्राप्त करना तो हमारे सनातन धर्म के रहस्य को समझना होगा | संतोष प्राप्त होता है त्याग से | हमारा देश भारत आदिक



दु:ख का कारण

*इस संसार में मनुष्य सुख एवं दुख के बीच जीवन यापन करता रहता है | मनुष्य को सुख एवं दुख यद्यपि उसके कर्मों के अनुसार मिलते हैं परंतु मनुष्य के दुखों के कारण पर हमारे शास्त्रों में विस्तृत चर्चा की गई है जिसके अनुसार मनुष्य के दुख के तीन मुख्य कारण बताए गए हैं :- १- अज्ञान , २- अशक्ति एवं ३- अभाव | य



मन्त्र में विघ्‍न दूर करने की शक्ति होती है!

आप यह जान लें कि मन्त्र में विघ्‍न दूर करने की शक्ति होती है। भौतिक विज्ञान के जानकार कहते हैं कि ध्वनि कुछ नहीं है मात्र विद्युत के रूपान्तरण के। जबकि अध्यात्म शास्त्री कहते हैं कि



गण्डमूल इतने अशुभ क्यों ? (भाग-2)

    पूर्व लेख में गण्डमूल इतने अशुभ क्यों के अन्तर्गत सन्धि की चर्चा के साथ-साथ यह बता चुके हैं कि सन्धि कैसी भी हो अशुभ होती है। बड़े व छोटे मूल क्या हैं। गण्डान्त मूल और उसका फल क्या है। अब इसी ज्ञान में और वृद्धि करते हैं।    अभुक्त मूल-ज्येष्ठा नक्षत्र के अन्त की 1घटी(24मिनट) तथा मूल नक्षत्र की





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