पातर

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समझ से परे

जब मांझी नाव को बीच मझधार में छोड़, खुद साहिल पर खड़ा हो जाएं तो नाव संभलते, चोट खाते हुए बहाव में ही तो जाएंगी ना... वो पार लगे या पातर पातर होकर मिट जाये, ये उसकी किस्मत। मेहनत करें तो ठीक है, पर चालाकी मेहनत से ऊंची हो कर, दूसरे की छवि पर दाग दे जाए तो क्या ये भी ठीक है? भरोसे के मायने अपने लिए





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