प्रस्तूति

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होली से विप्लव तक

रंगारंग क्रांति का पंचम चहुंओर लहरायाशंखनाद् गुँजायमान्, विह्वल मन हरषायाआनंद परिवार" का सुखद् युग है आयागुलाल-अबीर का खेल, बहुव्यंजन भी बहुत हींरे! भायात्रस्त मानवता देख विद्रोही कवि क्रांतिमय गद्य ले आया🔥🔥 🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥सत् युग, द्वापर, त्रेता एवम् कलियुग ये चारों व्यक्तित्व केrefl



मोहब्बत और खुदा

मोहब्बत



"साधु और साधुता"

भगुआ वस्त्र धारण कर साधु नहीं बन कोई सकता। जीव को प्रिय है प्राण, हंता नहीं साधु बन सकताअहिंसा का पाठ तामसिक वस्त्रधारी पढ़ा नहीं सकता।सात्विक बन कर हीं कोई सच्चा साधु बन भगुआ धारण कर सकता।।डॉ. कवि कुमार निर्मल





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