स्वप्नमेरे

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एक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँ ...

मैं कई गन्जों को कंघे बेचता हूँएक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँकाटता हूँ मूछ पर दाड़ी भी रखता और माथे के तिलक तो साथ रखता नाम अल्ला का भी शंकर का हूँ लेताहै मेरा धंधा तमन्चे बेचता हूँएक सौदागर हूँ ...धर्म का व्यापार मुझसे पल रहा हैदौर अफवाहों का मुझसे चल रहा है यूँ नहीं



पल दो पल फिर आँख कहाँ खुल पाएगी ...

धूल कभी जो आँधी बन के आएगीपल दो पल फिर आँख कहाँ खुल पाएगीअक्षत मन तो स्वप्न नए सन्जोयेगाबीज नई आशा के मन में बोयेगाखींच लिए जायेंगे जब अवसर साधनसपनों की मृत्यु उस पल हो जायेगीपल दो पल फिर ...बादल बूँदा बाँदी कर उड़ जाएँगेचिप चिप कपडे जिस्मों से जुड़ जाएँगेचाट के ठेले जब



घास उगी सूखे आँगन ...

धड़ धड़ धड़ बरसा सावनभीगे, फिसले कितने तनघास उगी सूखे आँगनप्यास बुझी ओ बंजर धरती तृप्त हुईनीरस जीवन से तुलसी भी मुक्त हुई,झींगुर की गूँजे गुंजनघास उगी ...घास उगी वन औ उपवनगीले सूखे चहल पहल कुछ तेज हुईहरा बिछौना कोमल तन की सेज हुईदृश्य है क



आशा का घोड़ा ...

आशा की आहट का घोड़ासरपट दौड़ रहासुखमय जीवन-हार मिलासाँसों में महका स्पंदनमधुमय यौवन भार खिलानयनों में सागर सनेह कासपने जोड़ रहा सरपट दौड़ रहा ...खिली धूप मधुमास नयाखुले गगन में हल्की हल्कीवर्षा का आभास नयामन अकुलाया हरी घास परझटपट पौड़ रहासरपट दौड़ रहा ...सागर लहरों क



स्वप्न मेरे ...: कहानी प्रेम की? हाँ ... नहीं ...

वो एक ऐहसास था प्रेम का जिसकी कहानी है ये ... जाने किसलम्हे शुरू हो के कहाँ तक पहुंची ... क्या साँसें बाकी हैं इस कहानी में ... हाँ ... क्या क्या कहा नहीं ... तो फिर इंतज़ार क्यों ...हालांकि छंट गई है तन्हाई की धुंधसमय के साथ ताज़ा धूप भी उ



स्वप्न मेरे ...: अम्मा का दिल टूट गया ...

पुरखों का घर छूट गयाअम्मा का दिल टूट गयादरवाज़े पे दस्तक दीअन्दर आया लूट गयामिट्टी कच्ची होते हीमटका धम से फूट गयामजलूमों की किस्मत हैजो भी आया कूट गयासीमा पर गोली खानेअक्सर ही रंगरूट गयापोलिथिन आया जब सेबाज़ारों से जूट गया ...



कहीं अपने ही शब्दों में न संशोधन करो तुम ...

दबी है आत्मा उसका पुनः चेतन करो तुम नियम जो व्यर्थ हैं उनका भी मूल्यांकनकरो तुम परेशानी में हैं जो जन सभी को साथ ले कर व्यवस्था में सभी आमूल परिवर्तन करो तुमतुम्हें जो प्रेम हैं करते उन्हें ठुकरान देना समय फिर आए ना ऐसा कीआवेदन करो तुम



हो गए हैं सब सिकन्दर इन दिनों ...

उग रहे बारूद खन्जर इन दिनों हो गए हैं खेत बन्जर इन दिनोंचौकसी करती हैं मेरी कश्तियाँहद में रहता है समुन्दर इन दिनोंआस्तीनों में छुपे रहते हैं सबलोग हैं कितने धुरन्धर इन दिनोंआदतें इन्सान की बदली हुईंशहर में रहते हैं बन्दर इन दिनोंआ गए पत्थर



इंसानियत का झंडा कब से यहाँ खड़ा है ...

इंसानियत का झंडा कब से यहाँ खड़ा है ...बीठें पड़ी हुई हैं, बदरंग हो चुका है इंसानियत का झंडा, कब से यहाँ खड़ा हैसपने वो ले गए हैं, साँसें भी खींच लेंगेइस भीड़ में नपुंसक, लोगों का काफिला हैसींचा तुझे लहू से, तू



वेश वाणी भेद तज कर हो तिरंगा सर्वदा ...

सभी देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ...लक्ष्य पर दृष्टि अटल अंतस हठीला चाहिएशेष हो साहस सतत यह पथ लचीला चाहिएहों भला अवरोध चाहे राह में बाधाएं होंआत्मा एकाग्र चिंतन तन गठीला चाहिएमुक्त पंछी, मुक्त मन, हों मुक्त आशाएं सभीमुक्त हो धरती पवन आकाश नीला



मगर तकसीम हिंदुस्तान होगा ...

जहाँ बिकता हुआ ईमान होगाबगल में ही खड़ा इंसान होगाहमें मतलब है अपने आप से हीजो होगा गैर का नुक्सान होगादरिंदों की अगर सत्ता रहेगीशहर होगा मगर शमशान होगादबी सी सुगबुगाहट हो रही हैदीवारों में किसी का कान होगाबड़ों के पाँव छूता है अभी तकमेरी तहजीब की पहचान होगालड़ाई नाम पे





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