हास्य कविता

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हास्य कविता (कुछ नए अंदाज में मुश्किल है अपना मेल प्रिये)

मुश्किल है अपना मेल प्रिये यह प्यार नही है खेल प्रिये तुम एक पागल बंदरिया सी मैं हु जंगल का शेर प्रिये तुम कड़वी नीम की पत्ती सी मैं हु मीठा से बेर प्रिये मुश्किल है अपना मेल प्रिये यह प्यार नही है खेल प्रिये तुम हवा हवाई चप्पल सी मैं हु रिबॉक का सूज प्रिये मैं तला पकौडा बेसन का तू सड़ा हुवा बचा तेल



कैसा लगता है ?

कैसा लगता है ? जब दिन गुजरे गिनाते घड़ीयां - पल ,जब हो किसीका अंतहीन इंतज़ार ,ना वह आये और ना दे कोई सुराग ! तब कैसा लगता है ?जब लगने लगा आज आनेवाला है वह शुभ दिन,और वह ले आये मायूसी का पैगाम ,तरस रहे सुनने को हाँ पर सुनना पड़े नकार ! तब क



अनूठा हवाई अड्डा

@@@@@ अनूठा हवाई अड्डा @@@@@--------------------------------------------------एक सुनहरे सफ़र की , मैं बता रहा हूँ यह बात |ट्रेन के उस सफ़र में ,एक सुन्दरी थी मेरे साथ ||सुन्दरी ने पहन रखा था,हवाई जहाजी लॉकेट |और सामने की सीट पर , बैठा था युवक एक ||मेरी नजर तो उस प्लेन पे , सिर्फ एक बार थी पड़ी |पर दृष



22 सितम्बर 2015

नेता जी की शिकायत (हास्य कविता)- प्रवीण शुक्ला

एक कवि-सम्मेलन में'नेता जी' मुख्य अतिथि के रूप में आये हुए थे,परन्तु गुस्से के कारणअपना मुँह फुलाये हुए थे ।उपस्थित अधिकांश कविनेताओं के विरोध में कविता सुना रहे थे,इसलिए, नेता जी कोबिल्कुल भी नहीं भा रहे थे ।जब उनके भाषण का नम्बर आयातो उन्होंने यूँ फ़रमाया-इस देश मेंबिहारी और भूषण की परम्परा का कविन





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