हिंदीकविता

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हासिल

शीर्षक :- हासिलकभी – कभी बिन माँगें बहुत कुछ मिल जाता हैऔर कभी माँगा हुआ दरवाज़े पे दस्तक दे लौट जाता हैशायद इसी को ज़िन्दगी कहते हैंसब्र का दामन थाम कर यहाँ हर कोई यूं ही जिये जाता है …मिले न मिले ये मुकद्दर उसकाफिर भी कोशिश करना फ़र्ज़ है सबकाआगे उसकी रज़ा कि किसको क्या हासिल हो पाता है …कभी – कभी सब्र



मस्त हवाओं का ये झोंका....

मस्त हवाओं का ये झोंका, बेमौसम ही प्यार करे…प्रियतम पास नहीं हैं फिर भी मिलन को बेकरार करेजीवन में बहार नहीं फिर भी प्रणय गीत स्वर नाद करेसजना की कोई खबर नहीं फिर जीना क्यों दुस्वार करेबिन तेरे सजना जीना मुश्किल रग - रग में है ज्वार उठे तेरे ही नाम से मेरी सुबह हुई है तेरे ही नाम से शाम ढले।मस्त हवा



सागर की लहरें....

सागर की लहरें...सागर की लहरें किनारे से बार-बार टकरातीचीखती उफान मारती रह-रहकर इतरातीमन की बेचैनी विह्वलता साफ झलकतीसदियों से जीवन की व्यथा रही छिपाती पर किनारे पहुँचते ही शांत सी हो जातीवह अनकही बात बिना कहे लौट जातीअपने स्पर्श से मन आल्हादित कर जातीसंग खेलने के लिए उत्साहित हो उकसातीजैसे ही हाथ बढ़



मैं सड़क....

मैं सड़क …अरे साहबकोरोना महामारी के कारणफुर्सत मिलीआपबीती सुनाने कामौका मिला।सदियों से सेवाव्रतीदिन-रात सजग तैनातसीनें पर सरपट दौड़ती गाड़ियों का अत्याचार।हाँ साहब.. 'अत्याचार'तेजगति से बेतहाशाचीखती - चिल्लातीभागती गाड़ियाँ..।क्षमता से अधिकबोझ लादे…आवश्यकता से अधिकरफ़्तार में भागती गाड़ियाँ...।मेरे चिथड़े



अजी ये क्या हुआ....?

अजी ये क्या हुआ…?होली रास नहीं आयाकोरोना काल जो आयामहामारी साथ वो लायाअपना भी हुआ परायाबीपी धक धक धड़कायाछींक जो जोर से आया…तापमान तन का बढ़ायाऐंठन बदन में लायाथरथर काँपे पूरी कायाछूटे लोभ मोह मायादुश्मन लागे पूरा भायापूरा विश्व थरथराया……नाम दिया महामारीजिससे डरे दुनिया सारीचीन की चाल सभी पे भारीबौखला



Hindi poetry on childhood life - अजूबी  बचपन ; अर्चना की रचना

बचपन की यादों आधारित हिंदी कविता अजूबी बचपन आज दिल फिर बच्चा होना चाहता है बचपन की अजूबी कहानियों में खोना चाहता है जीनी जो अलादिन की हर ख्वाहिश मिनटों में पूरी कर देता था,उसे फिर क्या हुक्म मेरे आका कहते देखना चाहता है आज दिल फिर बच्चा होना चाहता हैमोगली जो जंगल में बघ



Hindi Inspirational poetry on life - मृत  टहनियाँ ; अर्चना की रचना

जीवन पर प्रेरक हिंदी कविता मृत टहनियाँवो टहनियाँ जो हरे भरे पेड़ोंसे लगे हो कर भीसूखी रह जाती है जिनपे न बौर आती है न पात आती है आज उन मृत टहनियों को उस पेड़ सेअलग कर दिया मैंने… हरे पेड़ से लिपटे हो कर भी वो सूखे जा रही थी और इसी कुंठा में उस पेड़ को ही कीट बन खाए जा रही



Hindi poetry on women empowerment - आज की नारी ; अर्चना की रचना

महिला सशक्तिकरण पर हिंदी कविता आज की नारी मैं आज की नारी हूँ न अबला न बेचारी हूँ कोई विशिष्ठ स्थानन मिले चलता है फिर भी आत्म सम्मान बना रहा ये कामना दिल रखता है न ही खेला कभी women कार्ड मुश्किलें आयी हो चाहे हज़ार फिर भी कोई मेरी आवाज़ में आवाज़ मिलाये तो अच्छा लगता है



Hindi poetry on patriotism and love - शूरवीर ; अर्चना की रचना

देशभक्ति प्रेम पर हिंदी कविता शूरवीर आज फिर गूँज उठा कश्मीर सुन कर ये खबरदिल सहम गया और घबरा कर हाथ रिमोट पर गया खबर ऐसी थी की दिल गया चीर हैडलाइन थी आज फिर गूँज उठा कश्मीर फ़ोन उठा कर देखा तो उनको भेजा आखिरी मेसेज अब तक unread था न ही पहले के मेसेज पर blue tick था ऑनला



कवि द्विविधा

कलम शोर मचाती नहींशब्द गुनगुनाते नहींकिताबें पड़ी हैं मगर,किसी से पढ़ी जाती नहीं।लेखक हो मशहूरखर्चा पाते नहींलिखावट से इबादत कीमहक अब आती नहीं।कलम दुनिया बदल देंऐसा अब होता नहींप्रेमचंद लिए नए जूतेइसीलिए रोता नहीं।' सत्य ' स्वयं गुरूर मेंकलम चुभोता नहींअंतः कविता पेश हैकवि का भरोसा नहीं।



Hindi poetry on life - मैं कुछ भूलता नहीं ; अर्चना की रचना

जीवन पर आधारित हिंदी कविता मैं कुछ भूलता नहीं मैं कुछ भूलता नहीं ,मुझे सब याद रहता है अजी, अपनों से मिला गम, कहाँ भरता हैसुना है, वख्त हर ज़ख़्म का इलाज है पर कभी-२ कम्बख्त वख्त भी कहाँ गुज़रता है मैं अब बेख़ौफ़ गैरों पे भरोसा कर लेता हूँ जिसने सहा हो अपनों का वार सीने पे , वो



A Hindi poetry on International women day - क्यों ; अर्चना की रचना

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर हिंदी कविता क्यों क्यों एक बेटी की विदाई तक ही एक पिता उसका जवाबदार है ?क्यों किस्मत के सहारे छोड़ कर उसको कोई न ज़िम्मेदार है?क्यों घर बैठे एक निकम्मे लड़के पर वंश का दामोदर है ?क्यों भीड़ चीरती अपना आप खुद लिखती ए



Hindi poetry on friends of benefits - मतलब की धूल; अर्चना की रचना

मतलबी दोस्ती पर आधारित हिंदी कविता मतलब की धूलवख्त की तेज़ धूप ने सब ज़ाहिर कर दिया है खरे सोने पर ऐसी बिखरी की उसकी चमक को काफ़ूर कर दिया है जब तक दाना डालते रहे चिड़िया उन्हें चुगती रही हुए जब हाथ खाली तो उसकी चोंच ने ज़ख़्मी कर दिया हैजब तक मेज़बान थे घर में रौनक लगी रही शाम



जय हिंद, जय हिंदी

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मेरा गाँव, मेरा देश

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