क़िस्साअनुभव

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मेहंदी

शाम का समय था। अंधेरा ढलना शुरु हो चुका था। एक जलती-बुझती स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठा मोची अपना काम बढ़ाने की तैयारी में था। पास रखी किराये की लाईट में वो अपने पैसे गिन रहा था। मैं भी उस समय बस पकड़ने के लिए तेजी से बस स्टैण्ड की तरफ भागा जा रहा था। उसे देखकर आज फिर से मुझे अपने जूते की उधड़ी हुई सिलाई य





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