क़ुछ

कुछ शेर

"कुछ शेर"बहुत गुमराह करती हैं फिजाएँ जानकर जानमआसान मंजिल थी हम थे अजनवी की तरह।।तिरे आने से हवावों का रुख भी बदला शायदलोग तो कहते थे कि तुम हुए मजहबी की तरह।।समय बदला चलन बदली और तुम भी बदलेबदली क्या आँखें जो हैं ही शबनबी की तरह।।लगाए आस बैठी है इंतजार लिए नजरों मेंतुम आए तो पर जलाए किसी हबी की तरह





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