लोहड़ी एवं मकर संक्रान्ति की शुभकामनाये

लोहड़ी एवंमकर संक्रांति की शुभकामनायें डॉ शोभाभारद्वाज सिंधूबार्डर पर लोहड़ी की अग्नि प्रज्वल्लित कर उसमें कृषि कानून की प्रतियाँ जलाते हुएचित्र खिचवाने की होड़ लग गयी . जबकि लोहड़ी हर्ष उल्लास का उत्सव है यह पंजाबहरियाणा हिमाचल और जम्मू दिल्ली में धूमधाम से मनाया जाता है . खेतिहरसमाज में बेटों का बहुत



“चाकूबाजी” का खूनी खेल,कौन जिम्‍मेदार?

“चाकूबाजी” का खूनी खेल,कौन जिम्‍मेदार?छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर मे चाकूबाजी की बढती घटनाएं चिंता काविषय है: एक के बाद एक हो रही चाकू मारकर हत्‍या की घटनाओं में एक बात यह भी सामनेआई कि इन घटनाओं के पीछे एक हथियारो के सौदागर का भी हाथ है: गुढियारी थाना पुलिसने हथियारों के उस सौदागर को गिरफ्तार किया ह



मैं बैरी सुग्रीव पियारा ,अवगुण कवन नाथ मोहि मारा

मैं बैरी सुग्रीव पियारा ,अवगुण कवन नाथ मोहि मारा डॉ शोभा भारद्वाज ‘श्री ब्रम्हा’ सृष्टि के निर्माता सुमेरुपर्वत पर विचरण कर रहे थे मान्यता है उनके प्रताप से धरती पर पहले बानर का जन्महुआ ब्रम्हा उसे रक्षराज के नाम से पुकारते थे वह ब्रम्हा के साथ रहता पर्वत परविचरण करता ,खेलता मनचाहे फल खाता अपने एक



“गीतिका” बनाया सजाया कहोगे नहीं

गीतिका आधार छंद- शक्ति , मापनी 122 122 122 12, समांत-ओगे, पदांत- नहीं “गीतिका”बनाया सजाया कहोगे नहीं गले से लगाया सुनोगे नहीं सुना यह गली अब पराई नहीं बुलाकर बिठाया हँसोगे नहीं॥बनाकर बिगाड़े घरौंदे बहुत महल यह सजाकर फिरोगे नहीं॥बसाये न जाते शहर में शहर नगर आज फिर से घुमोगे नहीं॥चलो शाम आई सुहानी बहु



“गज़ल” जुर्म को नजरों से छुपाता रह गया शायद

काफ़िया- आ स्वर, रदीफ़- रह गया शायद“गज़ल”जुर्म को नजरों सेछुपाता रह गया शायदव्यर्थ का आईनादिखाता रह गया शायद सहलाते रह गया कालेतिल को अपने नगीना है सबकोबताता रह गया शायद॥ धीरे-धीरे घिरती गईछाया पसरी उसकी दर्द बदन सिरखुजाता रह गया शायद॥ छोटी सी दाग जबनासूर बन गई माना मर्ज गैर मलहमलगाता रह गया शायद॥



शिक्षा के आँसू

अपनों से दो शब्द“जब अनैतिक शक्ति संस्था-प्रधान के सिंहासन में पदास्थापित हो जाती है तोव्यवस्थाएँ तो चरमराती ही हैं, नैतिक शक्ति को अवसर भी नहीं मिलता और इसकानंगा-नृत्य स



“मुक्तक” हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह।

हिन्दी दिवस के सुअवसर पर आप सभी को दिल से बधाई सह शुभकामना, प्रस्तुत है मुक्तक....... ॐ जय माँ शारदा......!“मुक्तक”हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह। अपनी भाषा को मिला, संवैधानिक छाँह।चौदह तारिख खिल गया, दे दर्जा सम्मान- धूम-धाम से मन रहा, प्रिय त्यौहारी चाह॥-1बहुत बधाई आप को, देशज मीठी बोल। सगरी



“छंद मुक्त काव्य“ (मैं इक किसान हूँ)

“छंद मुक्त काव्य“(मैं इक किसान हूँ) किस बिना पै कह दूँकि मैं इक किसान हूँजोतता हूँ खेत, पलीत करता हूँ मिट्टी छिड़कता हूँ जहरीलेरसायन घास पर जीव-जंतुओं का जीनाहराम करता हूँ गाय का दूध पीताहूँ गोबर से परहेज है गैस को जलाता हूँपर ईधन बचाता हूँ अन्न उपजाता हूँगीत नया गाता हूँ आत्महत्या के लिएहैवान बन जा



“गीतिका” प्यार खोना मीत पाना

मापनी- 2122 2122 , पदांत- पाना,समांत- जीत, ईत स्वर“गीतिका”प्यार खोना मीतपाना युद्ध को हर जीतपाना हो सका संभव नहींजग पार कर हद हीतपाना॥दिल कभी भी छल करेक्या प्रीत पावन चीतपाना॥ (चित्त)जिंदगी कड़वी दवा हैस्वाद मिर्चा तीतपाना॥ (तीखा) राग वीणा की मधुरहै तार जुड़ संगीतपाना॥दो किनारों की नदीबन क्यों भला ज



“मुक्तक” तुझे छोड़ न जाऊँ री सैयां न कर लफड़ा डोली में।

शीर्षक ---भाषा/बोली/वाणी/इत्यादि समानार्थक“मुक्तक”तुझे छोड़ न जाऊँ रीसैयां न कर लफड़ा डोली में। क्या रखा है इसझोली में जो नहीं तेरी ठिठोली में। आज के दिन तूँ रोकले आँसू नैन छुपा ले नैनों से-दिल ही दिल की भाषाजाने क्या रखा है बोली में॥-1 हंस भी मोती खाएगा, फिर एक दिन ऐसा आयेगा। कागा अपने रंग मेंआकर,



“कुंडलिया” आती पेन्सल हाथ जब, बनते चित्र अनेक।

“कुंडलिया”आती पेन्सल हाथ जब, बनते चित्र अनेक। रंग-विरंगी छवि लिए, बच्चे दिल के नेक॥ बच्चे दिल के नेक, प्रत्येक रेखा कुछ कहती। हर रंगों से प्यार, जताकर गंगा बहती॥ कह गौतम हरसाय, सत्य कवि रचना गाती। गुरु शिक्षक अनमोल, भाव शिक्षा ले आती॥ महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया” पढ़ना- लिखना, बोलना, विनय सिखाते आप।

शिक्षक दिवस, 05-09-2018 के ज्ञान शिरोमणि अवसर पर सर्व गुरुजनों को सादर नमन, वंदन व अभिनंदन “कुंडलिया”पढ़ना- लिखना, बोलना,विनय सिखाते आप। हर अबोध के सारथी, वीणा के पदचाप॥ वीणा के पदचाप, आप शिक्षक गुरु ज्ञानी। खड़ा किए संसार, बनाकर के विज्ञानी॥ कह गौतम कविराय, सिखाते पथपर बढ़ना। सृजन रंग परिधान, सु-सृष्ट



“छन्द मुक्त काव्य” “शहादत की जयकार हो”

“छन्द मुक्त काव्य”“शहादत की जयकारहो”जब युद्ध की टंकारहो सीमा पर हुंकार हो माँ मत गिराना आँखआँसू माँ मत दुखाना दिलहुलासूजब रणभेरी की पुकारहो शहादत की जयकारहो।। जब गोलियों कीबौछार होजब सीमा पर त्यौहारहो माँ भेज देना बहनकी राखी अपने सीने कीबैसाखी वीरों की कलाईगुलजार हो शहादत की जयकार हो॥जब चलना दुश्वार



“भोजपुरी गीत” कइसे जईबू गोरी छलकत गगरिया, डगरिया में शोर हो गइल

“भोजपुरी गीत”कइसे जईबू गोरीछलकत गगरिया, डगरिया में शोर हो गइलकहीं बैठल होइहेंछुपि के साँवरिया, नजरिया में चोर हो गइल...... बरसी गजरा तुहार, भीगी अँचरा लिलार मति कर मन शृंगार, रार कजरा के धारपायल खनकी तेहोइहें गुलजार गोरिया मनन कर घर बार, जनि कर तूँ विहार,कइसे विसरी धनापलखत पहरिया, शहरिया अंजोर हो गइ



“कजरी का धीरज” (लघुकथा)

लीलाधारी प्रभुकृष्ण जन्माष्टमी के परम पावन पुनीत अवसर पर आप सभी महानुभावों को हार्दिक बधाई!“कजरी का धीरज” (लघुकथा)कजरी की शादी बड़ीधूम-धाम से हुई पर कुछ आपसी अनिच्छ्नीय विवादों में रिश्तों का तनाव इतना बढ़ा किउसके ससुराल वालों ने आवागमन के सारे संबंध ही तोड़ लिए और कजरी अपनी ससुराल कीचाहरदीवारों में सि



“मुक्तक” (छंद - हरिगीतिका)

छंद - हरिगीतिका(मात्रिक) मुक्तक, मापनी- 2212 2212 2212 2212“मुक्तक” (छंद -हरिगीतिका)फैले हुए आकाश मेंछाई हुई है बादरी। कुछ भी नजर आतानहीं गाती अनारी साँवरी। क्यों छुप गई है ओटलेकर आज तू अपने महल- अब क्या हुआ का-जलबिना किसकी चली है नाव री॥-1क्यों उठ रही हैरूप लेकर आज मन में भाँवरी। क्यों डूबने कोहरघड़



“मुक्तक” फिंगरटच ने कर दिया, दिन जीवन आसान।

“मुक्तक” फिंगरटच ने कर दिया, दिन जीवन आसान। मोबाइल के स्क्रीनपर, दिखता सकल जहान। बिना रुकावट मान लो, खुल जाते हैं द्वार- चाहा अनचाहा सुलभ, लिखो नाम अंजान॥-1 बिकता है सब कुछयहाँ, पर न मिले ईमान। हीरा पन्ना अरु कनक, खूब बिके इंसान। बिन बाधा बाजार में, बे-शर्ती उपहार- हरि प्रणाम मुस्कानसुख, सबसे बिन पह



“कुंडलिया” मोहित कर लेता कमल, जल के ऊपर फूल।

“कुंडलिया” मोहित कर लेता कमल, जल के ऊपर फूल। भीतर डूबी नाल है, हरा पान अनुकूल॥ हरा पान अनुकूल, मूल कीचड़ सुख लेता। खिल जाता दु:ख भूल, तूल कब रंग चहेता॥ कह गौतम कविराय, दंभ मत करना रोहित। हँसता खिलकर खूब, कमल करता मन मोहित॥महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



“हाइकु” सजी बाजर

“हाइकु” सजी बाजर राखी रक्षा त्यौहार रंग बिरंगी॥-1 रंग अनेक कच्चे पतले धागेराखी वन्धन॥-2 पावनी राखी रिश्ता ऋतु बैसाखी सुंदर पल॥-3 ओस छाई रीवर्षा ऋतु आई रीझूलती नारी॥-4 विहग उड़ेपग सिहर पड़ेडरती नारी॥ -5 आ रे बसंततूँ ही दिग-दिगंतसुंदर नारी॥-6 महतम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



“गीतिका” आप के दरबार में आ शांति ठहरी नहीं

पदांत- नहीं, समांत-अहरी,मापनी-2122 2122 2122 12“गीतिका” आप के दरबार में आशांति ठहरी नहीं दिख रहा है ढंग कापल प्रखर प्रहरी नहींझूलती हैं देख कैसेद्वार तेरे मकड़ियाँ रोशनी आने न देतीझिल्लियाँ गहरी नहीं॥ वो रहा फ़ानूष लटकाझूलता बे-बंद का लग रहा शृंगार सेभी रेशमा लहरी नहीं॥गुंबजों का रंगउतरा जा रहा बरसात



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