“कुंडलिया”



“कुंडलिया” आती पेन्सल हाथ जब, बनते चित्र अनेक।

“कुंडलिया”आती पेन्सल हाथ जब, बनते चित्र अनेक। रंग-विरंगी छवि लिए, बच्चे दिल के नेक॥ बच्चे दिल के नेक, प्रत्येक रेखा कुछ कहती। हर रंगों से प्यार, जताकर गंगा बहती॥ कह गौतम हरसाय, सत्य कवि रचना गाती। गुरु शिक्षक अनमोल, भाव शिक्षा ले आती॥ महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया” पढ़ना- लिखना, बोलना, विनय सिखाते आप।

शिक्षक दिवस, 05-09-2018 के ज्ञान शिरोमणि अवसर पर सर्व गुरुजनों को सादर नमन, वंदन व अभिनंदन “कुंडलिया”पढ़ना- लिखना, बोलना,विनय सिखाते आप। हर अबोध के सारथी, वीणा के पदचाप॥ वीणा के पदचाप, आप शिक्षक गुरु ज्ञानी। खड़ा किए संसार, बनाकर के विज्ञानी॥ कह गौतम कविराय, सिखाते पथपर बढ़ना। सृजन रंग परिधान, सु-सृष्ट



“कुंडलिया” मोहित कर लेता कमल, जल के ऊपर फूल।

“कुंडलिया” मोहित कर लेता कमल, जल के ऊपर फूल। भीतर डूबी नाल है, हरा पान अनुकूल॥ हरा पान अनुकूल, मूल कीचड़ सुख लेता। खिल जाता दु:ख भूल, तूल कब रंग चहेता॥ कह गौतम कविराय, दंभ मत करना रोहित। हँसता खिलकर खूब, कमल करता मन मोहित॥महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया”उगते सूरज की तरह दे प्रकाश हर ग्रंथ।

“कुंडलिया”उगते सूरज की तरह दे प्रकाश हर ग्रंथ। हो कोई भी सभ्यता सबके सुंदर पंथ॥ सबके सुंदर पंथ संत सब एक समाना। मानव ममता एक नेक भर लिया खजाना॥ कह गौतम कविराय हाय रे हम क्यों भुगते। कहाँ गई कचनार कहाँ अब मृदु फल उगते॥महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया” आगे सरका जा रहा समय बहुत ही तेज।

“कुंडलिया” आगे सरका जा रहा समय बहुत ही तेज। पीछे-पीछे भागते होकर हम निस्तेज॥ होकर हम निस्तेज कहाँ थे कहाँ पधारे। मुड़कर देखा गाँव आ गए शहर किनारे॥ कह गौतम कविराय चलो मत भागे-भागेकरो वक्त का मान न जाओ उससे आगे॥महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया”ममता माँ की पावनी छाया पिता दुलार।

“कुंडलिया”ममता माँ की पावनी छाया पिता दुलार। वंश बेल सम्यक प्रकृति चर्चित बालक प्यार॥ चर्चित बालक प्यार रार कब करते तरुवर। शिशु से है संसार स्नेह का सागर प्रियवर॥ कह गौतम कविराय हृदय की मोहक क्षमता। खेल रहा प्रिय गोद पिता मन विह्वल ममता॥ महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया”पकड़ो साथी हाथ यह हाथ-हाथ का साथ।

“कुंडलिया”पकड़ो साथी हाथ यह हाथ-हाथ का साथ। उम्मीदों की है प्रभा निकले सूरज नाथ।।निकले सूरज नाथ कट गई घोर निराशा। हुई गुफा आबाद जिलाए थी मन आशा॥ कह गौतम कविराय कुदरती महिमा जकड़ो। प्रभु के हाथ हजार मुरारी के पग पकड़ो॥-१बारिश में छाता लिए डगर सुंदरी एक। रिमझिम पवन फुहार नभ पथ



“कुंडलिया”इनका यह संसार सुख भीग रहा फल-फूल।

“कुंडलिया”इनका यह संसार सुख भीग रहा फल-फूल। क्या खरीद सकता कभी पैसा इनकी धूल॥ पैसा इनकी धूल फूल खिल रिमझिम पानी। हँसता हुआ गरीब हुआ है कितना दानी॥ कह गौतम कविराय प्याज औ लहसुन भिनका। ऐ परवर सम्मान करो मुँह तड़का इनका॥महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया”

“कुंडलिया”मम्मा ललक दुलार में नहीं कोई विवाद। तेरी छवि अनुसार मैं पा लूँ सुंदर चाँद.. पा लूँ सुंदर चाँद निडर चढ़ जाऊँ सीढ़ी। है तेरा संस्कार उगाऊँ अगली पीढ़ी॥ कह गौतम कविराय भरोषा तेरा अम्मा। रखती मन विश्वास हमारी प्यारी मम्मा॥ महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया”

“कुंडलिया”पढ़ते-पढ़ते सो गया भर आँखों में नींद। शिर पर कितना भार है लगता बालक बींद॥लगता बालक बींद उठाए पुस्तक भारी। झुकी भार से पीठ हँसाए मीठी गारी॥कह गौतम कविराय आँख के नंबर बढ़ते। अभी उम्र नादान गरज पर पोथी पढ़ते॥ महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया”

“कुंडलिया”बादल घिरा आकाश में डरा रहा है मोहिं। दिल दरवाजा खोल के जतन करूँ कस तोहिं॥ जतन करूँ कस तोहिं चाँदनी चाँद चकोरी। खिला हुआ है रूप भिगाए बूँद निगोरी॥ कह गौतम कविराय हो रहा मौसम पागल। उमड़-घुमड़ कर आज गिराता बिजली बादल॥ महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया”

“कुंडलिया”चलते- चलते राह में जब मिलती पहचान।देख अचानक प्रेम को हो जाते हैरान॥ हो जाते हैरान मौसमी आँधी उड़ती। उठ जाते हैं हाथ निगाहें जब प्रिय पड़ती॥ कह गौतम कविराय दिल लिए प्रेमी पलते। कर देते न्योछार त्याग मन लेकर चलते॥ महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया”

“कुंडलिया”पलड़ा जब समतल हुआ न्याय तराजू तोल पहले अपने आप को फिर दूजे को बोलफिर दूजे को बोल खोल रे बंद किवाड़ी उछल न जाए देख छुपी है चतुर बिलाड़ीकह गौतम कविराय झपट्टा मारे तगड़ा कर लो मनन विचार झुके न न्याय का पलड़ा॥ महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया”

“कुंडलिया”पाती प्रेम की लिख रहे चित्र शब्द ले हाथ।अति सुंदरता भर दिये हरि अनाथ के नाथ।।हरि अनाथ के नाथ साथ तरु विचरत प्राणी।सकल जगत परिवार मानते पशु बिनु वाणी।।कह गौतम कविराय सुनो जब कोयल गाती।मैना करे दुलार पपीहा लिखता पाती॥-१लचकें कोमल डालियाँ अपने अपने साख।उड़ती नभ तक प



“कुंडलिया”

“कुंडलिया”भरता नृत्य मयूर मन ललक पुलक कर बागफहराए उस पंख को जिसमें रंग व राग जिसमे रंग व राग ढ़ेल मुसुकाए तकि-तकिहो जाता है चूर नूर झकझोरत थकि-थकिकह गौतम कविराय अदाकारी सुख करता खुश हो जाता खंड दंड पावों में भरता॥ महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया”

“कुंडलिया” गागर छलके री सखी पनघट पानी प्यासआतुर पाँव धरूँ कहाँ लगी सजन से आसलगी सजन से आस पास कब उनके जाऊँ उपसे श्रम कण बिन्दु पसीना पलक दिखाऊँकह गौतम कविराय आज भर लूँगी सागर पकड़ प्यार की डोर भरूँगी अपनी गागर॥ महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया”

“कुंडलिया”टकटक की आवाज ले चलती सूई तीन मानों कहती सुन सखा समय हुआ कब दीनसमय हुआ कब दीन रात अरु दिवस प्रणेता जो करता है मान समय उसको सुख देताकह गौतम कविराय न सूरज करता बकबकचलता अपनी चाल प्रखर गति लेकर टकटक॥ महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया” नैन तुम मेरे मोती

“कुंडलिया”मोती जैसे अक्षर हैं सुंदर शब्द सुजान भाव मनोहर लिख रही कोरे पन्ने मान कोरे पन्ने मान बिहान न हो प्रिय तुम बिन सपने दिन अरु रात विरह बढ़ता है दिन दिनकह गौतम कविराय आँख असुवन झर रोती यह पाती नहिं वैन नैन तुम मेरे मोती॥ महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी



“कुंडलिया” कुल की पालनहार परम पूज्य है नारी॥

हार्दिक अभिनंदन आप बहनों का बहुत बहुत बधाई भूत भविष्य वर्तमान की परम शक्ति को सादर नमन “कुंडलिया”नारी है नारायणी आदि जगत से आजमौन मूक दर्शक रही सत्य सती शिव राजसत्य सती शिव राज काज पालन का करती युग युग नव अवतार चित्र चहक रंग भरतीकह गौतम कविराय विलक्षण चेहरा प्यारी



“कुंडलिया”

“कुंडलिया”इंद्र धनुष की यह प्रभा मन को लेती मोह हरियाली अपनी धरा लोग हुये निर्मोह लोग हुये निर्मोह मसल देते हैं कलियाँ तोड़ रहें हैं फूल फेंक देते हैं गलियाँ कह गौतम कविराय व्यथा कब पाये निंद्र नगर नगर पाषाण उगे क्यों छलिया इंद्र॥ महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



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