“मुक्तक”

“मुक्तक” हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह।

हिन्दी दिवस के सुअवसर पर आप सभी को दिल से बधाई सह शुभकामना, प्रस्तुत है मुक्तक....... ॐ जय माँ शारदा......!“मुक्तक”हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह। अपनी भाषा को मिला, संवैधानिक छाँह।चौदह तारिख खिल गया, दे दर्जा सम्मान- धूम-धाम से मन रहा, प्रिय त्यौहारी चाह॥-1बहुत बधाई आप को, देशज मीठी बोल। सगरी



“मुक्तक” तुझे छोड़ न जाऊँ री सैयां न कर लफड़ा डोली में।

शीर्षक ---भाषा/बोली/वाणी/इत्यादि समानार्थक“मुक्तक”तुझे छोड़ न जाऊँ रीसैयां न कर लफड़ा डोली में। क्या रखा है इसझोली में जो नहीं तेरी ठिठोली में। आज के दिन तूँ रोकले आँसू नैन छुपा ले नैनों से-दिल ही दिल की भाषाजाने क्या रखा है बोली में॥-1 हंस भी मोती खाएगा, फिर एक दिन ऐसा आयेगा। कागा अपने रंग मेंआकर,



“मुक्तक” (छंद - हरिगीतिका)

छंद - हरिगीतिका(मात्रिक) मुक्तक, मापनी- 2212 2212 2212 2212“मुक्तक” (छंद -हरिगीतिका)फैले हुए आकाश मेंछाई हुई है बादरी। कुछ भी नजर आतानहीं गाती अनारी साँवरी। क्यों छुप गई है ओटलेकर आज तू अपने महल- अब क्या हुआ का-जलबिना किसकी चली है नाव री॥-1क्यों उठ रही हैरूप लेकर आज मन में भाँवरी। क्यों डूबने कोहरघड़



“मुक्तक” फिंगरटच ने कर दिया, दिन जीवन आसान।

“मुक्तक” फिंगरटच ने कर दिया, दिन जीवन आसान। मोबाइल के स्क्रीनपर, दिखता सकल जहान। बिना रुकावट मान लो, खुल जाते हैं द्वार- चाहा अनचाहा सुलभ, लिखो नाम अंजान॥-1 बिकता है सब कुछयहाँ, पर न मिले ईमान। हीरा पन्ना अरु कनक, खूब बिके इंसान। बिन बाधा बाजार में, बे-शर्ती उपहार- हरि प्रणाम मुस्कानसुख, सबसे बिन पह



“मुक्तक” जिंदगी को बिन बताए कैसे मचल जाऊँगा।

“मुक्तक”मापनी- २१२२ २१२२ २२१२ २१२जिंदगी को बिन बताए कैसे मचल जाऊँगा। बंद हैं कमरे खुले बिन कैसे निकल जाऊँगा। द्वार के बाहर तेरे कोई हाथ भी दिखता नहीं- खोल दे आकर किवाड़ी कैसे फिसल जाऊँगा॥-१ मापनी- २२१२ २२१२ २२१२ २२१२जाना कहाँ रहना कहाँ कोई किता चलता नहीं। यह बाढ़ कैसी आ गई



“मुक्तक” साहस इनका देखिए झोली में पाषाण।

कहते हैं मेरा वतन बात-बात में वाण। आतंकी के देश से आया कैसे गैर- मिला मंच खैरात का नृत्य कर रहा भाण॥-१ लेकर आओ हौसला हो जाए दो हाथ। क्यों करते गुमराह तुम सबके मालिक नाथ। बच्चे सभी समान हैं तेरे मेरे लाल- उनसे छल तो मत करों खेलें खाएँ साथ॥-२शौर्य तुम्हारा देखता सीधा सकल ज



“मुक्तक”तर्क तौलते हैं सभी लिए तराजू हाथ।

“मुक्तक”तर्क तौलते हैं सभी लिए तराजू हाथ। उचित नीति कहती सदा मिलों गले प्रिय साथ। माँ शारद कहती नहीं रख जिह्वा पर झूठ- ज्ञान-ध्यान गुरुदेव चित अर्चन दीनानाथ॥-१ प्रथम न्याय सम्मान घर दूजा सकल समाज। तीजा अपने आप का चौथा हर्षित आज। धन-निर्धन सूरज धरा हो सबका बहुमान- गाय भाय बेटी-बहन माँ- ममता अधिराज॥-२



“मुक्तक”सौंप दिया माँ-बाप ने गुरु को अपना लाल।

माँ शारदे को नमन करते हुए समस्त मंच के गुणीजनों को मेरा वंदन अभिनंदन। आप सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई। “मुक्तक”सौंप दिया माँ-बाप ने गुरु को अपना लाल। विनय शारदा मातु से साधक शिक्षक भाल। शब्द-शब्द अक्षर प्रखर ज्ञानी गुरु महान- नमन शिष्य गौतम करे चरण कमलवत नाल॥-१ज्ञ



“मुक्तक” बदला हुआ मौसम बहक बरसात हो जाए।

“मुक्तक” बदला हुआ मौसम बहक बरसात हो जाए। उड़ता हुआ बादल ठहर कुछ बात हो जाए। क्यों जा रहे चंदा गगन पर किस लिए बोलो- कर दो खबर सबको पहर दिन रात हो जाए॥-१ अच्छी नहीं दूरी डगर यदि प्रात हो जाए। नैना लगाए बिन गर मुलाक़ात हो जाए। ले हवा चिलमन उडी कुछ तो शरम करो-सूखी जमी बौंछार



“मुक्तक” शांति का प्रतीक लिए उड़ता रहता हूँ।

“मुक्तक” शांति का प्रतीक लिए उड़ता रहता हूँ। कबूतर हूँ न इसी लिए कुढ़ता रहता हूँ। कितने आए-गए सर के ऊपर से मेरे- गुटरगूं कर-करके दाना चुँगता रहता हूँ॥-१ संदेश वाहक थे पूर्वज मेरे सुनता रहता हूँ। इस मुंडेर से उस मुंडेर भटकता रहता हूँ। कभी खत लटक जाते गले कभी मैं तार से- रास



“मुक्तक” हर पन्ने लिख गए वसीयत जो।

मापनी- २१२ २१२ १२२२ “मुक्तक” हर पन्ने लिख गए वसीयत जो। पढ़ उसे फिर बता हकीकत जो। देख स्याही कलम भरी है क्या- क्या लिखे रख गए जरूरत जो॥-१ गाँव अपना दुराव अपनों से। छाँव खोकर लगाव सपनों से। किस कदर छा रही बिरानी अब- तंग गलियाँ रसाव नपनों से



“मुक्तक”

“मुक्तक”अस्त-व्यस्त गिरने लगी पहली बारिश बूँद। मानों कहना चाहती मत सो आँखें मूँद। अभी वक्त है जाग जा मेरे चतुर सुजान- जेठ असाढ़ी सावनी भादों जमे फफूँद॥-१याद रखना हर घड़ी उस यार का। जिसने दिया जीवन तुम्हें है प्यार का। हर घड़ी आँखें बिछाए तकती रहती- है माँ बहन बेटी न भार्या



“मुक्तक” जब गीत मीत गाए मन काग बोल भाए।

छंद–दिग्पाल (मापनी युक्त) मापनी -२२१ २१२२ २२१ २१२२ “मुक्तक” जब गीत मीत गाए मन काग बोल भाए। विरहन बनी हूँ सखियाँ जीय मोर डोल जाए। साजन कहाँ छुपे हो ले फाग रंग अबिरा- ऋतुराज बौर महके मधुमास घोल जाए॥-१ आओ न सजन मेरे कोयल कसक रही है। पीत सरसो फुलाए फलियाँ लटक रही है। महुवा



“मुक्तक”

“मुक्तक” पड़ जाती हैं आ गले द्वंद- फंद व्यवहार। उठते सोते जागते लिपटे रहते प्यार। कहती प्रेम पहेलियाँ मुझसे लिपटो मीत-उत्कंठित प्रिय भावना कत प्रपंच प्रतिकार॥-१ अब तो शीतलम न रही बहती नदी समीर। कचरा कहता मैं जहाँ कैसे वहाँ जमीर। पंख नहीं म



“मुक्तक”

“दोहा मुक्तक”परिणय की बेला मधुर मधुर गीत संवाद। शोभा वरमाला मधुर मधुर मेंहदी हाथ। सप्तपदी सुर साधना फेरा जीवन चार- नवदंपति लाली मधुर मधुर नगारा नाद॥-१“मुक्तक” छंद मधुमालती मापनी अहसान चित करते रहो। पहचान बिन तरते रहो। कोई पुकारे सड़क महीं-



“मुक्तक”मुक्तक तेरे चार गुण कहन-शमन मन भाव।

“मुक्तक”मुक्तक तेरे चार गुण कहन-शमन मन भाव। चाहत माफक मापनी मानव मान सुभाव। चित प्रकृति शोभा अयन वदन केश शृंगार-समतुक हर पद साथ में तीजा कदम दुराव॥-१ यति गति पद निर्वाह कर छंद-अछन्द विधान। अतिशय मारक घाव भरि मलहम मलत निदान। वर्तन-नर्तन चिन्ह लय कंठ सुकोमल राग- करुण-दरुण द



“मुक्तक”

“मुक्तक” सुधबुध वापस आय करो कुछ मनन निराला। जीत गई है हार भार किसके शिर डाला। मीठी लगती खीर उबल चावल पक जाता-रहा दूध का दूध सत्य शिव विजय विशाला॥-१हम बचपन के साथी क्या डगर चाहना है। अभी क्या उमर है क्या जिगर भावना है। खेलते तो हैं खग मृग मिल लड़ाते हैं पंजे- क्या पता कि



“मुक्तक”

“मुक्तक”तुझे छोड़ न जाऊँ री सैयां न कर लफड़ा डोली में। क्या रखा है इस झोली में जो नहीं तेरी ठिठोली में। आज के दिन तूँ रोक ले आँसू नैन छुपा ले नैनों से- दिल ही दिल की भाषा जाने क्या रखा है बोली में॥-१ “मुक्तक” २१२२ २१२२ २१२२ २१२२दर किनारे हो गए जब तुम किनारे खो गए थे उस समय



“मुक्तक”

“मुक्तक”सम्मानित है किर्ति कहीं भी कैसी भी हो मंदिर मंदिर राम मूर्ति सीता जैसी हो मर्यादा बहुमान दिलाये वन में मन मेंशासक पालक नेक बाग मधुबन ऐसी हो॥-१ धोखा दे अपकीर्ति अचानक आँधी आए सुख सुविधा अरु आन मान माटी मिल जाएसोचो समझो यार रार मत पालों मन में सुलभ शुद्ध संगीत राग क



“मुक्तक” लब सूखे खिलती न लाली जिस जगह कुभाव हो

“मुक्तक”पग बढ़ा करते नहीं जब दिल के अंदर घाव हो। उठ के रुक जाते नयन जब हौसला आभाव हो। बज के रुक जाती तनिक शहनाइयाँ बारात में-लब सूखे खिलती न लाली जिस जगह कुभाव हो॥-१ कब सजा काजल वहाँ जह आँख ही तलवार हो। म्यान की क्या है जरूरत जब दिली तकरार हो। पल मुहूरत देखकर रण भूमि कब आ



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