आध्यात्म



जीव का बन्धन क्या है ? :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर द्वारा बनाई गई चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करता हुआ जीव अपने कर्मानुसार जब मनुष्य योनि को प्राप्त करता है तो यह जीव अनेक प्रकार के बंधनों से बंध जाता है | इसी बंधन से मुक्त हो जाने पर जीव का मोक्ष माना जाता है | जीव का बंधन क्या है ? इस पर हमारे महापुरुषों के अनेकानेक विचार प्राप्त होते हैं



ईश्वरप्राप्ति का सबसे सरल साधन है भक्ति

*इस धरा धाम पर जन्म लेने के बाद मनुष्य का एक ही लक्ष्य होता है ईश्वर की प्राप्ति करना | वैसे तो ईश्वर को प्राप्त करने के अनेकों उपाय हमारे शास्त्रों में बताए गए हैं | कर्मयोग , ज्ञानयोग एवं भक्तियोग के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त करने का उपाय देखने को मिलता है , परंतु जब ईश्वर को प्राप्त करने के सबसे



बिना शांति के ज्ञान नहीं हो सकता

*इस संसार में मनुष्य येनि में जन्म लेने के बाद जीव अनेकों प्रकार के ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करता है | प्राय: लोग भौतिक ज्ञान प्राप्त करके स्वयं को विद्वान मानने लगते हैं परंतु कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आध्यात्मिक एवं आत्मिक ज्ञान (आत्मज्ञान) प्राप्त करने के लिए जीवन भर संघर्ष करते रहते हैं | आत्मज्



विषाद का कारण एवं निवारण

*मानव जीवन बड़ी ही विचित्रताओं से भरा हुआ है | ब्रह्मा जी की सृष्टि में सुख-दुख एक साथ रचे गए हैं | मनुष्य के सुख एवं दुख का कारण उसकी कामनाएं एवं एक दूसरे से अपेक्षाएं ही होती हैं | जब मनुष्य की कामना पूरी हो जाती है तब वह सुखी हो जाता है परंतु जब उसकी कामना नहीं पूरी होती तो बहुत दुखी हो जाता है |



सर्वस्व त्याग :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में आने के बाद जीव अनेकों प्रकार के बंधनों में जकड़ जाता है | गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने मानस में लिखा है " भूमि परत भा ढाबर पानी ! जिमि जीवहिं माया लपटानी !!" कहने का मतलब है कि जीव को माया चारों ओर से घेर लेती है , जिस के बंधन से जीव जीवन भर नहीं निकल पाता है | ईश्वर प्राप्ति का लक



कर्म करते जाओ फल की चिंता मत करो….

कर्म करते जाओ फल की चिंता मत करो….हम अपने आस - पास अक्सर लोंगों को बोलते हुए सुनते हैं, हर कोई आध्यात्मिक अंदाज में संदेश देते रहता है - 'कर्म करते जाओ फल की चिंता मत करो…...।' वस्तुतः ठीक भी है। एक विचार यह है कि फल की चिंता कर्म करने से पहले करना कितना उचित है अर्थात निस्वार्थ भाव से कर्म को बखूब



""दर्प"

🍁🍁।।दर्प।।🍁🍁आँखों के आगे अँधेराकिस पल कब छा जाएकुछ अपना कोई कहे पर सुन कुछ नहीं पाएहाथ पैर एवम् इंद्रियां कबअवसान- लोथ बन जाएस्मृतियों का ग्रंथागारपतंग बन भांतिउड़ गगन पार जाएअर्जित सिद्धियाँ हटात्निरस्त हो शक्तिहीन करउदास बनाएआज है सम्राट तो कहींकल भिक्षाटन् परनिकल न जाएदर्प कहाँ से आया जिवन में



मेरे शिव

ओ मेरे शिव, मैं सच में तुमसे प्यार कर बैठीसबने कहा , क्या मिलेगा मुझेउस योगी के संगजिसका कोई आवास नहींवो फिरता रहता हैबंजारों साजिसका कोई एक स्थान नहींसब अनसुना अनदेखा कर दिया मैंनेअपने मन मंदिर में तुमको स्थापित कर बैठीओ मेरे शिव, मैं सच में तुमसे प्यार कर बैठीसबने समझाया , उसका साथ है भूतो और पिशा



नामापराध :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में त्रिदेव (ब्रह्मा , विष्णु , महेश) प्रमुख देवता माने गये हैं | ब्रह्मा जी सृजन , शिव जी संहार एवं श्रीहरि विष्णु को संसार का पालन करने वाला बताया गया है | संसार का पालन करने के क्रम में सृष्टि को अनेकानेक संकटों से बचाने एवं धर्म की पुनर्स्थापना करने



प्रार्थना :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*धरा धाम पर जन्म लेने के बाद मनुष्य के द्वारा अनेकों प्रकार के कर्म संपादित होते हैं | अपने संपूर्ण जीवन काल में अपने कर्मों के अनुसार मानव महामानव बन जाता है | मानव मात्र की आकांक्षा , अभिलाषा एवं आवश्यकता आदि की पूर्ति के लिए हमारे महापुरुषों ने तीन प्रकार के साधन बताये हैं :- १- कर्म , २- चिन्तन



जीवन की सार्थकता :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*भारतीय सनातन परम्परा में जीवन के बाद की भी व्यवस्था बनाई गयी है | सनातन की मान्यता के अनुसार जीवन दो प्रकार का है प्रथम तो इहलौकिक एवं दूसरा पारलोकिक | मनुष्य इस धरती पर पैदा होता है और एक जीवन जीने के बाद मरकर इसी मिट्टी में मिल जाता है | यह मनुष्य का इहलौकिक जीवन है जहां से होकर मनुष्य परलोक को ज



मोह का प्रसार :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*ईश्वर की बनाई हुई यह सृष्टि बहुत ही दिव्य एवं रोचक है इसके साथ ही इस संसार को मायामय एवं नश्वर भी कहा गया है | जिसका भी यहां पर जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है चाहे वह जड़ हो या चेतन | इस संसार में जो भी जन्म लेता है उसको एक दिन जाना ही पड़ता है यही संसार का शाश्वत सत्य है और यह सत्य प्रायः सभी



आत्मसुधार :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*संपूर्ण जीवन काल में मनुष्य अपनी जीवन शैली , रहन सहन एवं परिवेश का सुधार करता रहता है जिससे वो अमूल्य जीवन को अच्छे से अच्छे जी सके | भाँति - भाँति के साबुन आदि के कृत्रिम साधनों का उपयोग करके शरीर को चमका कर , अच्छे से अच्छा वस्त्र पहन करके , अपने घर को रंग रोगन करके मनुष्य समाज में चमकना तो चाह



जीवन के प्रगति का आधार है आध्यात्म :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मनुष्य का निर्माण प्रकृति के कई तत्वों से मिलकर हुआ है | मानव जीवन में मुख्य रूप से दो ही चीजें क्रियान्वित होती है एक तो मनुष्य का शरीर दूसरी मनुष्य की आत्मा | जहां शरीर भौतिकता का वाहक होता है वही आत्मा आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर रहती है | मनुष्य भौतिक उन्नति के लिए तो सतत प्रयत्नशील रहता है परंतु



अध्यात्म क्या है ??? :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन बहुत ही दुर्लभ है इस मानव जीवन को पा करके मनुष्य को आत्मिक विकास करने का प्रयास करना चाहिए | आत्मिक विकास कैसे होगा ? इसके लिए हमारे धर्मग्रन्थों में आध्यात्म का मार्ग बताया गया है | अध्यात्म क्या है ? इसके विषय हमारे ग्रंथों में लिखा है कि आध्यात्म शब्द का अर्थ अपनी आत्मा या जीवन का अध्



धार्मिक आस्था का मूल आध्यात्म

धार्मिक आस्था का मूल अध्यात्मसामान्य रूप से भारत में छः दर्शनप्रचलित हैं | इनमें एक वर्ग उन दर्शनों का है जो नास्तिक दर्शन कहे जाते हैं |इनमें प्रमुख है चार्वाक सिद्धान्त | यह दर्शन केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण मानता है| ईश्वर की सत्ता नहीं मानता और शरीर को ही प्रमुख मानता है | आत्मा की सत्ता कोस्वीकार



प्रकृति में है परमात्मा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ *मनुष्य माता - पिता के संयोग से इस पृथ्वी पर आता है | मानव जीवन में माता - पिता का बहुत बड़ा महत्त्व है बिना इनके इस संसार में यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त ही नहीं हो सकता | जन्म लेने के बाद मनुष्य पर



मन

क्यों ये मन कभी शांत नहीं रहता ?ये स्वयं भी भटकता है और मुझे भी भटकाता है।कभी मंदिर, कभी गॉंव, कभी नगर, तो कभी वन।कभी नदी, कभी पर्वत, कभी महासागर, तो कभी मरुस्थल।कभी तीर्थ, कभी शमशान, कभी बाजार, तो कभी समारोह।पर कहीं भी शांति नहीं मिलती इस मन को।कुछ समय के लिये ध्यान हट जाता है बस समस्याओं से।उसके



मन को कैसे बदलें :--- आचार्य अर्जुन तिनारी

!! भगवत्कृपा हि केवलम् !!मानव के जीवन में मन का निर्माण एक सतत प्रक्रिया है | मन को साधने की कला एक छोटे बच्चे से सीखना चाहिए जो एक ही बात को बार बार दोहराते हुए सतत सीखने का प्रयास करते हुए अन्तत: उसमें सफल भी हो जाता है | मन की चंचलता से प्राय: सभी परेशान हैं | सामान्य जीवन में मन की औसत स्थिति हो



मन की विचित्रता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य अपने संपूर्ण जीवन काल में अनेकों मित्र एवं शत्रु बनाता है | वैसे तो इस संसार में मनुष्य के कर्मों के अनुसार उसके अनेकों शत्रु हो जाते हैं जिनसे वह युद्ध करके जीत भी आता है , परंतु मनुष्य का एक प्रबल शत्रु है जिससे जीत पाना मनुष्य के लिए बहुत ही कठिन होता है | वह



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